लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प से तीन साल पहले डोकलाम में भी दोनों देश एक दूसरे के आमने-सामने आ चुके थे। भारत-चीन सीमा विवाद का दायरा लद्दाख, डोकलाम, नाथूला से होते हुए अरुणाचल प्रदेश की तवांग घाटी तक जाता है। अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके पर चीन की निगाहें हमेशा से रही हैं। वो तवांग को तिब्बत का हिस्सा मानता है और कहता है कि तवांग और तिब्बत में काफी ज्यादा सांस्कृतिक समानता है। तवांग बौद्धों का प्रमुख धर्मस्थल भी है।
आखिर चीन के कब्जे में तिब्बत कब और कैसे आया? हैरान करने वाली है कहानी
तिब्बत का इतिहास
मुख्यतः बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के इस सुदूर इलाके को 'संसार की छत' के नाम से भी जाना जाता है। चीन में तिब्बत का दर्जा एक स्वायत्तशासी क्षेत्र के तौर पर है। चीन का कहना है कि इस इलाके पर सदियों से उसकी संप्रभुता रही है जबकि बहुत से तिब्बती लोग अपनी वफादारी अपने निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के प्रति रखते हैं। दलाई लामा को उनके अनुयायी एक जीवित ईश्वर के तौर पर देखते हैं तो चीन उन्हें एक अलगाववादी खतरा मानता है।
तिब्बत का इतिहास बेहद उथल-पुथल भरा रहा है। कभी वो एक खुदमुख्तार इलाके के तौर पर रहा तो कभी मंगोलिया और चीन के ताकतवर राजवंशों ने उस पर हुकूमत की, लेकिन साल 1950 में चीन ने इस इलाके पर अपना झंडा लहराने के लिए हजारों की संख्या में सैनिक भेज दिए। तिब्बत के कुछ इलाकों को स्वायत्तशासी क्षेत्र में बदल दिया गया और बाकी इलाकों को इससे लगने वाले चीनी प्रांतों में मिला दिया गया।
लेकिन साल 1959 में चीन के खिलाफ हुए एक नाकाम विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी, जहां उन्होंने निर्वासित सरकार का गठन किया। साठ और सत्तर के दशक में चीन की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान तिब्बत के ज्यादातर बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया गया। माना जाता है कि दमन और सैनिक शासन के दौरान हजारों तिब्बतियों की जाने गई थीं।
चीन तिब्बत विवाद कब शुरू हुआ?
चीन और तिब्बत के बीच विवाद, तिब्बत की कानूनी स्थिति को लेकर है। चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी के मध्य से चीन का हिस्सा रहा है, लेकिन तिब्बतियों का कहना है कि तिब्बत कई शताब्दियों तक एक स्वतंत्र राज्य था और चीन का उसपर निरंतर अधिकार नहीं रहा। मंगोल राजा कुबलई खान ने युआन राजवंश की स्थापना की थी और तिब्बत ही नहीं बल्कि चीन, वियतनाम और कोरिया तक अपने राज्य का विस्तार किया था।
फिर सत्रहवीं शताब्दी में चीन के चिंग राजवंश के तिब्बत के साथ संबंध बने। 260 साल के रिश्तों के बाद चिंग सेना ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया, लेकिन तीन साल के भीतर ही उसे तिब्बतियों ने खदेड़ दिया और 1912 में तेरहवें दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतंत्रता की घोषणा की। फिर 1951 में चीनी सेना ने एक बार फिर तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया और तिब्बत के एक शिष्टमंडल से एक संधि पर हस्ताक्षर करा लिए जिसके अधीन तिब्बत की प्रभुसत्ता चीन को सौंप दी गई। दलाई लामा भारत भाग आए और तभी से वे तिब्बत की स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ल्हासा: एक प्रतिबंधित शहर
जब 1949 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो उसे बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया। तिब्बत में चीनी सेना तैनात कर दी गई, राजनीतिक शासन में दखल किया गया, जिसकी वजह से तिब्बत के नेता दलाई लामा को भाग कर भारत में शरण लेनी पड़ी। फिर तिब्बत का चीनीकरण शुरू हुआ और तिब्बत की भाषा, संस्कृति, धर्म और परंपरा सबको निशाना बनाया गया।
किसी बाहरी व्यक्ति को तिब्बत और उसकी राजधानी ल्हासा जाने की अनुमति नहीं थी, इसीलिए उसे प्रतिबंधित शहर कहा जाता है। विदेशी लोगों के तिब्बत आने पर ये पाबंदी 1963 में लगाई गई थी। हालांकि 1971 में तिब्बत के दरवाजे विदेशी लोगों के लिए खोल दिए गए थे।
दलाई लामा की भूमिका
चीन और दलाई लामा का इतिहास ही चीन और तिब्बत का इतिहास है। सन 1409 में जे सिखांपा ने जेलग स्कूल की स्थापना की थी। इस स्कूल के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रचार किया जाता था। यह जगह भारत और चीन के बीच थी, जिसे तिब्बत नाम से जाना जाता है। इसी स्कूल के सबसे चर्चित छात्र थे गेंदुन द्रुप। गेंदुन आगे चलकर पहले दलाई लामा बने। बौद्ध धर्म के अनुयायी दलाई लामा को एक रूपक की तरह देखते हैं। इन्हें करुणा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
दूसरी तरफ इनके समर्थक अपने नेता के रूप में भी देखते हैं। दलाई लामा को मुख्य रूप से शिक्षक के तौर पर देखा जाता है। लामा का मतलब गुरु होता है। लामा अपने लोगों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म के नेता दुनिया भर के सभी बौद्धों का मार्गदर्शन करते हैं।