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Sri Lanka Crisis: श्रीलंका में ऑर्गेनिक खेती को स्थायी नुकसान पहुंचा गए गोतबाया राजपक्षे! जानें पूरा मामला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Sun, 07 May 2023 06:45 PM IST
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सार
कई आलोचकों की राय है कि राजपक्षे को पर्यावरण की चिंता नही थी, बल्कि उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए रासायनिक खादों का आयात रोका था। मगर उनका यह मकसद भी नाकाम रहा।
श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे
- फोटो : ANI
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विस्तार
श्रीलंका के किसानों के बीच ऑर्गेनिक खेती शब्द बेहद अलोकप्रिय हो चुका है। आम तौर पर किसान भविष्य में कभी ऑर्गेनिक खेती ना करने का इरादा जताते नजर आते हैं। रासायनिक खादों के विकल्प के तौर पर स्थानीय स्तरों पर कुछ छोटे प्रयोग आज भी हो रहे हैं, लेकिन 2021 में जिस तरह ऑर्गेनिक खेती को अनिवार्य बनाया गया था, उससे इसको लेकर किसानों के मन में संदेह बैठ चुका है।
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पूर्व राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे ने 2021 के मध्य में अचानक रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर पूरी रोक लगा दी थी। उन्होंने किसानों के लिए ऑर्गेनिक खेती करना अनिवार्य बना दिया। श्रीलंका में घोर आर्थिक पैदा करने में राजपक्षे के इस फैसले को भी एक महत्त्वपूर्ण कारण माना गया था। विशेषज्ञों की राय है कि फैसले के बाद श्रीलंका इस बात के अध्ययन की एक मिसाल बन गया कि ऑर्गेनिक खेती को किस तरह प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।
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ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने श्रीलंका के उस अनुभव पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की है। उसके मुताबिक राजपक्षे के उस अचानक फैसले ने किसानों के साथ-साथ कृषि विभाग के अधिकारियों को भी चौंका दिया था। उचित विकल्प उपलब्ध ना होने के कारण उस फैसले के परिणास्वरूप कृषि उपज में भारी गिरावट आई। चावल और अन्य फसलों की खेती कई जगहों पर पूरी तरह ठप हो गई। नतीजा अनाज की कमी के रूप में सामने आया, जिसके आयात की कोशिश में सरकार विदेशी मुद्रा के संकट में फंस गई और आखिरकार उसे डिफॉल्ट करना (कर्ज चुकाने में अक्षम होना) पड़ा।
हालांकि छह महीनों के बाद राजपक्षे ने अपना यह फैसला पलट दिया, लेकिन तब से आज तक देश में उर्वरकों की सप्लाई सामान्य नहीं हो सकी है। जाफना यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री अहिलन काडिरगमर ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि एक समय एक बोरी यूरिया की कीमत 1,500 श्रीलंकाई रुपये से बढ़ कर 40 हजार रुपये हो गई थी। अब भी सब्सिडी के बावजूद किसानों को यूरिया लगभग 10 हजार रुपए प्रति बोरी मिल रहा है।
राजपक्षे ने रासायनिक खादों पर प्रतिबंध लगाने के साथ ऑर्गेनिक खाद के उत्पादन के लिए चार सहकारिताएं बनाई थीं। ये सहकारिताएं सूखे पत्तों और गोबर से खाद बना रही हैं, लेकिन इसकी उत्पादन मात्रा बहुत कम है। एग्रीकल्चर एंड एनवायरनमेंट प्रोफेशनल्स कॉ-ऑपरेटिव सोसायटी के अध्यक्ष शमिला रत्नसूरिया के मुताबिक राजपक्षे की पहल ऑर्गेनिक खेती के पैरोकारों के लिए बहुत हानिकारक साबित हुई। उन्होंने कहा कि सरकार के पास अच्छी योजना नहीं थी, ना ही उसके पास इसे लागू करने का इन्फ्रास्ट्रक्चर था। रत्नसूरिया ने कहा कि किसानों को मालूम ही नहीं था कि ऑर्गेनिक खेती कैसे की जाती है।
कई आलोचकों की राय है कि राजपक्षे को पर्यावरण की चिंता नही थी, बल्कि उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए रासायनिक खादों का आयात रोका था। मगर उनका यह मकसद भी नाकाम रहा। देश आखिरकार दिवालिया होने तक पहुंच गया। इस बीच किसानों का तर्जुबा इतना खराब रहा कि अब वे ऑर्गेनिक खेती की बात भी नहीं सुनना चाहते। विशेषज्ञों के मुताबिक राजपक्षे का मकसद चाहे जो रहा हो, लेकिन उनकी पहल से श्रीलंका में ऑर्गेनिक खेती के विचार को ऐसा नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई दशकों तक संभव नहीं हो पाएगी।
