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तेल महंगा, फिर भी रुपया मजबूत: आखिर कैसे रिजर्व बैंक और पूंजी प्रवाह ने संभाली कमान? नहीं बिगड़ने दिए हालात
Sun, 02 Aug 2026 04:53 PM IST
प्रशांत तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sun, 02 Aug 2026 04:53 PM IST
सार
जुलाई में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में 20% से अधिक उछाल आया, लेकिन मजबूत विदेशी पूंजी प्रवाह, अमेरिकी डॉलर की कमजोरी और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सक्रिय हस्तक्षेप की बदौलत भारतीय रुपया केवल 0.8% ही कमजोर हुआ।
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भारतीय रुपया
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते जुलाई के दौरान वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में 20 प्रतिशत से अधिक की तेज बढ़ोतरी हुई। इसके बावजूद भारतीय रुपया केवल 0.8 प्रतिशत ही कमजोर हुआ। बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी डॉलर की कमजोरी, विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सक्रिय हस्तक्षेप ने रुपये को बड़ी गिरावट से बचाए रखा।
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विदेशी निवेश और RBI के कदमों ने कैसे दी मजबूती?
रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का प्रवाह 22 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इसमें सबसे बड़ी भूमिका इक्विटी निवेश की रही, जबकि डेट मार्केट में भी निवेश बढ़ा। इसके अलावा RBI के विशेष उपायों के जरिए 40.8 अरब अमेरिकी डॉलर का पूंजी प्रवाह आकर्षित हुआ। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि केंद्रीय बैंक ने रुपये को स्थिर बनाए रखने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप किया।
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डॉलर इंडेक्स में गिरावट से रुपये को कितना फायदा मिला?
बैंक ऑफ बड़ौदा के अनुसार, जुलाई के दौरान अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) में 1.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे रुपये को अतिरिक्त सहारा मिला। हालांकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का दबाव बना रहा, लेकिन मजबूत पूंजी प्रवाह के कारण इसका असर काफी हद तक सीमित रहा। जुलाई में एफपीआई के जरिए 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश आया, जिसमें सबसे अधिक योगदान इक्विटी निवेश का रहा। वहीं, डेट सेगमेंट में भी निवेश में सुधार दर्ज किया गया।
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क्या भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति अभी भी मजबूत बनी हुई है?
रिपोर्ट के अनुसार, व्यापार घाटा बढ़ने के बावजूद भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति फिलहाल मजबूत बनी हुई है। इसका प्रमुख कारण प्रवासी भारतीयों से मिलने वाला मजबूत प्रेषण (रेमिटेंस), सेवा क्षेत्र से बढ़ता अधिशेष और विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत स्तर है। 24 जुलाई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 682.4 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया, जो लगभग 10 महीने के आयात के लिए पर्याप्त माना जाता है।
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आने वाले समय में रुपये की चाल कैसी रह सकती है?
बैंक ऑफ बड़ौदा का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। हालांकि, लगातार विदेशी पूंजी प्रवाह और RBI की नीतिगत पहल रुपये को अधिक कमजोर होने से बचाने में अहम भूमिका निभाएंगी। रिपोर्ट के अनुसार, निकट भविष्य में भारतीय रुपया 95.25 से 95.75 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर के दायरे में कारोबार कर सकता है।