टाटा ट्रस्ट्स: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रस्टी ढांचे को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने की दी मंजूरी, जानें सबकुछ
टाटा ट्रस्ट्स मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट से जुड़ी बड़ी खबर। सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी ढांचे को चुनौती देने वाली याचिका वापस ली गई। टाटा संस में हिस्सेदारी और नए नियमों का पूरा विवाद समझने के लिए पढ़ें हमारी यह खास रिपोर्ट।
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) के आजीवन (लाइफ) ट्रस्टी ढांचे को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी है। यह याचिका सुरेश तुलसीराम पाटिलखेड़े द्वारा दायर की गई थी। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के पास इस मामले को दायर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। इस फैसले से ट्रस्ट के खिलाफ चल रही मौजूदा कानूनी अड़चन समाप्त हो गई है।
याचिका खारिज होने का मुख्य आधार
जस्टिस अद्वैत सेठना और जस्टिस संदेश दादासाहेब पाटिल की खंडपीठ ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए यह पाया कि याचिकाकर्ता मूल शिकायतकर्ता नहीं था। अदालत के अनुसार, चैरिटी कमिश्नर के समक्ष चल रहे अंतर्निहित मामले के मूल शिकायतकर्ता का जिक्र भी याचिका में नहीं किया गया था। इससे पहले, टाटा ट्रस्ट और अन्य प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और जनक द्वारकादास ने भी अदालत में यही तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता के पास इस मामले में याचिका दायर करने का कोई आधार नहीं है। इससे पहले 7 मई को भी अदालत ने याचिकाकर्ता को कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।
क्या था ट्रस्टी ढांचे से जुड़ा विवाद?
याचिकाकर्ता सुरेश तुलसीराम पाटिलखेड़े ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया था कि सर रतन टाटा ट्रस्ट के मौजूदा बोर्ड का गठन महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2025 द्वारा तय की गई वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करता है। महाराष्ट्र सरकार ने नए अध्यादेश के तहत ट्रस्ट कानूनों में धारा 30A(2) जोड़ी है। इस नियम के अनुसार, यदि ट्रस्ट डीड में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो आजीवन ट्रस्टियों की संख्या ट्रस्ट की कुल क्षमता के एक-चौथाई (25 प्रतिशत) से अधिक नहीं हो सकती। यह नियम 1 सितंबर 2025 से लागू हुआ था।
याचिका के मुताबिक, वर्तमान में सर रतन टाटा ट्रस्ट में छह ट्रस्टी हैं, जिनमें से तीन (जिमी नवल टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और नोएल नवल टाटा) आजीवन ट्रस्टी के रूप में कार्यरत हैं। यह संख्या बोर्ड का 50 प्रतिशत बैठती है, जो कि 25 प्रतिशत की वैधानिक सीमा से दोगुनी है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि 1 सितंबर 2025 के बाद ट्रस्ट द्वारा लिए गए सभी फैसलों को अमान्य घोषित किया जाए।
टाटा संस में हिस्सेदारी और आगामी बैठक का महत्व
इस कानूनी विवाद का सीधा प्रभाव टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' के प्रबंधन पर भी पड़ सकता था। सर रतन टाटा ट्रस्ट की टाटा संस में 23.56 प्रतिशत की इक्विटी हिस्सेदारी है, जबकि सभी टाटा ट्रस्ट्स मिलकर टाटा संस का 66 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करते हैं। याचिकाकर्ता ने 16 मई को होने वाली सर रतन टाटा ट्रस्ट की प्रस्तावित बैठक पर रोक लगाने की मांग की थी। इस बैठक के एजेंडे में टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के प्रतिनिधित्व पर पुनर्विचार करना शामिल है। वर्तमान में, टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट के नामित सदस्य के रूप में टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा और उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन शामिल हैं।
याचिका वापस लिए जाने के बाद, 16 मई को होने वाली सर रतन टाटा ट्रस्ट की अहम बैठक अब बिना किसी कानूनी रोक के आयोजित की जा सकेगी। इस मामले ने यह साफ कर दिया है कि न्यायालय कॉरपोरेट और ट्रस्ट से जुड़े विवादों में याचिकाकर्ता के कानूनी अधिकार को गहराई से जांचते हैं। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए राज्य कानूनों के अनुपालन को लेकर ट्रस्ट प्रबंधन के लिए लंबी अवधि में क्या रणनीतिक कदम उठाते हैं।