कैसे साफ होगी दिल्ली-NCR की हवा?: बजट 2026 में फंड कटौती की खबर, कितना खर्च करेगी सरकार?
केंद्रीय बजट 2026-27 में प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवंटन घटाकर 1,091 करोड़ रुपये कर दिया गया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर और इंडो-गंगा क्षेत्र में गंभीर वायु प्रदूषण के बीच यह कटौती एक बड़े स्वास्थ्य संकट से निपटने का मौका चूकने जैसी है।
विस्तार
केंद्रीय बजट 2026-27 को लेकर पर्यावरणविदों ने निराशा जताई है। उनका कहना है कि यह बजट देश में बढ़ते वायु प्रदूषण और उससे पैदा हो रहे गंभीर स्वास्थ्य संकट से निपटने का एक अहम मौका चूक गया है।
बजट में प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवंटन घटा दिया गया है, जबकि दिल्ली-एनसीआर और इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों में जहरीली हवा लगातार खतरे की घंटी बजा रही है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्रदूषण नियंत्रण मद में केंद्र सरकार ने 1,091 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जो कि 2025-26 के संशोधित अनुमान 1,300 करोड़ रुपये से 209 करोड़ रुपये कम है।
पिछले साल के क्या रहे आंकड़े?
गौरतलब है कि 2025-26 में पहले प्रदूषण नियंत्रण के लिए 853.9 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसे बाद में बढ़ाया गया, लेकिन वास्तविक खर्च महज ₹16 करोड़ रह गया। इससे न केवल प्राथमिकताओं पर, बल्कि जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े होते हैं।
यह कटौती ऐसे समय में आई है जब भारत भीषण गर्मी, शहरी बाढ़, तेज चक्रवात और लंबे समय तक खतरनाक वायु गुणवत्ता जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसके बावजूद पर्यावरण संरक्षण और जलवायु कार्रवाई पर सरकारी जोर सीमित नजर आता है।
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पर्यावरण मंत्रालय का बजट बढ़ा, लेकिन आधार कमजोर
2026-27 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को ₹3,759.46 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के बजट अनुमान ₹3,481.61 करोड़ से करीब ₹278 करोड़ (लगभग 8%) अधिक है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ोतरी प्रतिशत के लिहाज से ठीक दिखती है, लेकिन जलवायु जोखिम, पारिस्थितिक क्षरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को देखते हुए कुल राशि नाकाफी है।
खर्च का पैटर्न और क्रियान्वयन की चुनौती
पूंजीगत खर्च ₹174.39 करोड़ से बढ़कर ₹222.80 करोड़ हो गया है, जिससे शोध ढांचे और पर्यावरण निगरानी प्रणालियों को मजबूती मिल सकती है। लेकिन राजस्व खर्च में मामूली बढ़ोतरी ही हुई है, जो मुख्य रूप से मौजूदा संस्थानों और योजनाओं को चलाए रखने तक सीमित है।
कुछ संस्थागत मजबूती जरूर दिखती है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जैसी इकाइयों को अधिक आवंटन मिला है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को भी अतिरिक्त फंड दिया गया है, जो बढ़ते पर्यावरणीय मुकदमों और राज्यों पर बढ़ते प्रवर्तन बोझ को दर्शाता है।
वायु प्रदूषण पर सबसे ज्यादा चिंता
सबसे बड़ी चिंता वायु प्रदूषण को लेकर है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के लिए रखा गया ₹1,091 करोड़ का प्रावधान ऐसे समय में कम माना जा रहा है, जब कई शहरों में वायु गुणवत्ता अक्सर गंभीर श्रेणी में पहुंच जाती है। राज्यों के लिए स्वच्छ वायु कार्ययोजनाओं को लागू करना पहले ही मुश्किल है; ऐसे में केंद्र से कम संसाधन मिलने का मतलब कमजोर निगरानी और धीमी कार्रवाई हो सकता है।
इस कटौती पर जलवायु कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रदूषण नियंत्रण में कटौती एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की अनदेखी है, जिससे संकट और गहराएगा।
सरकार ने क्या पक्ष रखा?
सरकार का कहना है कि प्रदूषण उसके लिए प्राथमिकता बना हुआ है। आर्थिक कार्य विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने कहा कि केंद्र सरकार वायु और जल प्रदूषण से निपटने के लिए कई माध्यमों से फंडिंग कर रही है।
उनके मुताबिक, सीवेज और ड्रेनेज से जुड़े कार्यों पर भी बड़ा खर्च हो रहा है और वित्त आयोग के अनुदानों का बड़ा हिस्सा स्वच्छता और जल संबंधी परिणामों से जुड़ा हुआ है।
विपक्ष की क्या है मांग?
विपक्ष इस तर्क से संतुष्ट नहीं है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने वायु प्रदूषण पर संसद में विस्तृत बहस की मांग की है और बजट में आवंटन बढ़ाने पर जोर दिया है। एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा कि प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर, पर्याप्त धन के साथ गंभीर योजना बनाने की जरूरत है।
