FTA: ईयू के साथ एफटीए में टैरिफ के अलावे भी बाधाएं, क्या निर्यात होगा कमजोर? जानें GTRI का क्या है अनुमान
GTRI के मुताबिक भारत को ईयू के साथ एफटीए में कृषि और फार्मा पर लगी नॉन-टैरिफ बाधाएं हटाने पर जोर देना चाहिए, क्योंकि ये टैरिफ कटौती से मिलने वाले निर्यात लाभ को कमजोर कर देती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत में भारत को कृषि और फार्मा जैसे अहम क्षेत्रों में अपने उत्पादों पर लगने वाली नॉन-टैरिफ बाधाओं को हटाने पर सख्ती से जोर देना चाहिए। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, ये गैर-शुल्क प्रतिबंध अक्सर टैरिफ में दी गई राहत के असर को काफी हद तक कमजोर कर देते हैं।
भारत-ईयू एफटीए वार्ताओं के 27 जनवरी को औपचारिक रूप से पूरी होने की घोषणा होने की संभावना है। यह समझौता करीब 18 साल बाद अंतिम चरण में पहुंचा है। बातचीत की शुरुआत 2007 में हुई थी। इसी दौरान यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 25-27 जनवरी के बीच भारत के राजकीय दौरे पर रहेंगी और 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगी।
ये भी पढ़ें: Report: क्या भारत 2030 तक उच्च-मध्यम आय वर्ग वाला देश बनेगा? प्रति व्यक्ति आय ₹3.6 लाख तक पहुंचने का अनुमान
किन बाधाओं से जूझते हैं भारतीय उत्पाद?
जीटीआरआई के मुताबिक, ईयू में भारतीय निर्यातकों को कई तरह की गैर-टैरिफ दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
- फार्मा सेक्टर में दवाओं की मंजूरी में देरी
- कृषि और खाद्य उत्पादों पर सख्त सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी नियम
- भैंस के मांस, बासमती चावल, मसाले और चाय जैसे उत्पादों पर कीटनाशक अवशेष सीमा बेहद कम होना
- समुद्री उत्पादों पर एंटीबायोटिक को लेकर ज्यादा सैंपलिंग
- मैन्युफैक्चरिंग में REACH जैसे केमिकल नियम और नए जलवायु-संबंधी मानक, जिससे खासकर एमएसएमई की लागत बढ़ती है।
जीटीआरआई का कहना है कि भले ही इन नियमों को उपभोक्ता सुरक्षा या पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लागू किया जाता है, लेकिन इनका सामूहिक असर एक व्यावहारिक व्यापार बाधा जैसा हो जाता है।
सिर्फ टैरिफ कटौती काफी नहीं
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि जब तक टैरिफ में कटौती के साथ-साथ रेगुलेटरी सहयोग, तेज मंजूरी और आपसी मान्यता नहीं होगी, तब तक ईयू के साथ किसी भी व्यापार समझौते से निर्यात में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होगी।
सीबीएएम और कार्बन टैक्स बड़ी चिंता
थिंक टैंक ने कहा कि भारत को ईयू के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) पर भी समाधान निकालना चाहिए। यह 1 जनवरी से लागू हो चुका है और स्टील, एल्युमिनियम जैसे उच्च कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादों पर असर डालता है।
GTRI के मुताबिक, ईयू पहले ही अमेरिका को इसमें छूट देने के संकेत दे चुका है और भारत को भी इसी तरह की राहत मांगनी चाहिए। बिना छूट के यह व्यवस्था खासतौर पर एमएसएमई के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
सेवाओं और डेटा पर भी मतभेद
- सेवा क्षेत्र में EU की शर्तों को लेकर भी भारत की आपत्ति है।
- भारतीय IT कंपनियों से स्थानीय कार्यालय खोलने की शर्त
- भारतीय पेशेवरों के लिए ऊंची न्यूनतम सैलरी सीमा
- डिजिटल सेवाओं के क्रॉस-बॉर्डर डिलीवरी पर रोक
भारत ईयू से GDPR के तहत ‘डेटा-सिक्योर’ देश का दर्जा भी चाहता है, ताकि डेटा ट्रांसफर आसान हो सके। ईयू चाहता है कि भारत अपने नियमों को GDPR के और करीब लाए, जबकि भारत का कहना है कि उसका डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 पर्याप्त सुरक्षा देता है।
सरकारी खरीद और GI पर भी खींचतान
ईयू भारत के करीब 600 अरब डॉलर के सरकारी खरीद बाजार तक पहुंच चाहता है, जबकि भारत सीमित पहुंच देने के पक्ष में है। भौगोलिक संकेतक (GI) को लेकर भी मतभेद हैं EU शैंपेन, रोकेफोर्ट जैसे उत्पादों के लिए स्वतः मान्यता चाहता है, जबकि भारत मानक रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पर जोर दे रहा है।
निवेश संरक्षण भी अहम मुद्दा
ईयू भारत में बड़े निवेशकों में शामिल है और 2024 तक उसका कुल निवेश 100 अरब यूरो से ज्यादा रहा है। 2016 में भारत द्वारा पुराने निवेश समझौते खत्म किए जाने के बाद निवेश संरक्षण अध्याय बेहद अहम हो गया है। ईयू मजबूत निवेश सुरक्षा चाहता है, जबकि भारत अपने मॉडल बीआईटी के तहत नियामक स्वतंत्रता बनाए रखने के पक्ष में है।