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न्यूक्लियर इमरजेंसी से बचाएगा चंडीगढ़ का कैप्सूल: बहरीन ने एक करोड़ कैप्सूल की सप्लाई के लिए किया संपर्क

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Thu, 12 Mar 2026 08:21 AM IST
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सार

चंडीगढ़ की कंपनी द्वारा बनाए गए प्रुशियन ब्लू कैप्सूल डीआरडीओ तकनीक पर बने हैं और ये दवा रेडियोएक्टिव तत्वों का असर घटाती है।  

Chandigarh capsule will protect against nuclear emergencies Bahrain contacted for 10 million capsules
कैप्सूल - फोटो : freepik.com
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विस्तार

इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच खाड़ी देशों ने संभावित परमाणु हमले के दुष्प्रभाव से नागरिकों को बचाने की तैयारी शुरू कर दी है। 
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इसी कड़ी में बहरीन के एक एजेंट ने चंडीगढ़ की एक दवा कंपनी से संपर्क कर न्यूक्लियर इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाली दवा प्रुशियन ब्लू के कैप्सूल की जानकारी मांगी है। बातचीत सफल होने पर चंडीगढ़ से करीब एक करोड़ कैप्सूल की सप्लाई खाड़ी देशों को की जा सकती है।

कंपनी द्वारा तैयार किए गए प्रुशियन ब्लू कैप्सूल शरीर में पहुंचने वाले रेडियोएक्टिव तत्व सीजियम-137 और थैलियम के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं। यह कैप्सूल आंतों में इन तत्वों से बाइंड होकर उन्हें मल के जरिये शरीर से बाहर निकाल देता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण दवाओं की सूची में शामिल किया है। पहले यह दवा अमेरिका और यूरोप में बनती थी जबकि भारत में इसका व्यावसायिक उत्पादन दो साल पहले शुरू हुआ।
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महिलाओं-पुरुषों के लिए अलग डोज की जानकारी मांगी

जानकारी के अनुसार बहरीन के एक फार्मा संपर्क अधिकारी ने कंपनी से यह भी पूछा है कि क्या वह एक करोड़ कैप्सूल तैयार कर सप्लाई करने की क्षमता रखती है। साथ ही महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के लिए अलग-अलग डोज की जानकारी भी मांगी गई है। कंपनी का मुख्यालय चंडीगढ़ में है, जबकि इसकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हिमाचल प्रदेश के बद्दी में स्थित है। इससे पहले जून 2025 में भी इस्राइल-ईरान संघर्ष के दौरान ऐसी ही मांग सामने आई थी, लेकिन युद्ध जल्दी खत्म होने से बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी थी।

डीआरडीओ तकनीक पर आधारित दवा

प्रुशियन ब्लू कैप्सूल डीआरडीओ की तकनीक पर आधारित है। इसे दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलाइड साइंसेस में विकसित किया गया है। कंपनी की निदेशक डॉ. वैशाली अग्रवाल ने बताया कि एजेंट अपने देश के स्वास्थ्य मंत्रालय से चर्चा कर रहा है। यदि समझौता होता है तो दवाओं की खेप बहरीन के अलावा कुवैत, कतर और जॉर्डन को भी भेजी जा सकती है।

पोटेशियम आयोडाइड की भी बड़ी मांग

बहरीन एजेंट ने पोटेशियम आयोडाइड (केआई) की करीब 1.2 करोड़ टैबलेट की मांग भी जताई है। केआई का उपयोग न्यूक्लियर इमरजेंसी में थायराइड ग्रंथि को रेडिएशन से बचाने, हाइपरथायरायडिज्म के इलाज और फेफड़ों में जमे बलगम को ढीला करने के लिए किया जाता है।
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