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Chandigarh News: बेटियां बनीं विरासत की सारथी, जिम्नास्टिक छोड़ थामा मल्लखंभ
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चंडीगढ़। देश की प्राचीन धरोहर और पारंपरिक खेलों को नई दिशा देने में बेटियां लड़कों से दो कदम आगे हैं। हवा में उड़ने और लकड़ी के खंभे पर हैरतअंगेज करतब दिखाने वाले बेहद रोमांचक खेल मल्लखंभ में चंडीगढ़ की तीन बेटियों ने अपनी धाक जमाई है। सिमरन नेगी, मुस्कान और रिंकी कनौजिया पिछले चार साल से इस खेल में न सिर्फ शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, बल्कि लगातार मेडल जीतकर शहर का नाम रोशन कर रही हैं।
देहरादून की रहने वाली सिमरन नेगी ने नौवीं कक्षा से मल्लखंभ की शुरुआत की थी। स्टेट चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने के बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी में एक गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीता। सिमरन बताती हैं कि पहले जिम्नास्टिक करती थीं। फिर मल्लखंभ करने लगीं। वह रोजाना लगातार 3 घंटे कड़ा अभ्यास। सिमरन ने कहा कि इस खेल में मजबूत ग्रिप (पकड़) की जरूरत होती है। पहले हम जिमनास्टिक करते थे, जिससे काफी मदद मिली।
मुस्कान ने भी अपने खेल करियर की शुरुआत जिम्नास्टिक से की थी। लेकिन बाद में मल्लखंभ को अपना लिया।मुस्कान ने स्टेट प्रतियोगिताओं में 3 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल जीते हैं। वह बताती हैं कि सुबह 2 घंटे और शाम को 3 घंटे का कड़ा फिटनेस रूटीन हैं। उन्होंने कहा कि लकड़ी के पोल पर खुद को बैलेंस करना काफी मुश्किल होता है, लेकिन लगातार प्रैक्टिस से यह मुमकिन हो जाता है।
हाल ही में 12वीं की परीक्षा देने वाली रिंकी कनौजिया मल्लखंभ के दांव-पेंच में पूरी तरह माहिर हो चुकी हैं। साल 2024 स्टेट चैंपियनशिप में 2 गोल्ड जीते और नेशनल में सिल्वर व ब्रॉन्ज मेडल जीता। यूनिवर्सिटी लेवल पर 1 गोल्ड और 2 सिल्वर जीत चुकी हैं। उनकी महारत रोप पर पैरों की ग्रिप से बैलेंस बनाने में गजब की है। वह कहती हैं कि यह खेल पहले छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक सीमित था अब स्कूलों और नेशनल गेम्स का हिस्सा बन चुका है। अपनी प्राचीन विरासत को आगे बढ़ाना बेहद गर्व की बात है।
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देहरादून की रहने वाली सिमरन नेगी ने नौवीं कक्षा से मल्लखंभ की शुरुआत की थी। स्टेट चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने के बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी में एक गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीता। सिमरन बताती हैं कि पहले जिम्नास्टिक करती थीं। फिर मल्लखंभ करने लगीं। वह रोजाना लगातार 3 घंटे कड़ा अभ्यास। सिमरन ने कहा कि इस खेल में मजबूत ग्रिप (पकड़) की जरूरत होती है। पहले हम जिमनास्टिक करते थे, जिससे काफी मदद मिली।
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मुस्कान ने भी अपने खेल करियर की शुरुआत जिम्नास्टिक से की थी। लेकिन बाद में मल्लखंभ को अपना लिया।मुस्कान ने स्टेट प्रतियोगिताओं में 3 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल जीते हैं। वह बताती हैं कि सुबह 2 घंटे और शाम को 3 घंटे का कड़ा फिटनेस रूटीन हैं। उन्होंने कहा कि लकड़ी के पोल पर खुद को बैलेंस करना काफी मुश्किल होता है, लेकिन लगातार प्रैक्टिस से यह मुमकिन हो जाता है।
हाल ही में 12वीं की परीक्षा देने वाली रिंकी कनौजिया मल्लखंभ के दांव-पेंच में पूरी तरह माहिर हो चुकी हैं। साल 2024 स्टेट चैंपियनशिप में 2 गोल्ड जीते और नेशनल में सिल्वर व ब्रॉन्ज मेडल जीता। यूनिवर्सिटी लेवल पर 1 गोल्ड और 2 सिल्वर जीत चुकी हैं। उनकी महारत रोप पर पैरों की ग्रिप से बैलेंस बनाने में गजब की है। वह कहती हैं कि यह खेल पहले छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक सीमित था अब स्कूलों और नेशनल गेम्स का हिस्सा बन चुका है। अपनी प्राचीन विरासत को आगे बढ़ाना बेहद गर्व की बात है।
