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इच्छा मृत्यु: चंडीगढ़ PGI ने 2009 में बनाई थी विशेषज्ञ कमेटी, हरीश राणा मामले के बाद फिर आई चर्चा में

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Thu, 12 Mar 2026 07:56 AM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने जिस युवक हरीश राणा के मामले में हाल ही में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी है, वह 2013 में चंडीगढ़ के सेक्टर-15 की एक पीजी में हादसे के बाद पीजीआई में भर्ती रहा था और लंबे समय तक गंभीर हालत में उसका इलाज चला था।

Euthanasia chandigarh PGI formed an expert committee in 2009 with clear procedure for patients ventilators
हरीश राणा की फाइल फोटो - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद पीजीआई में वर्ष 2009-10 में बनाई गई विशेषज्ञ कमेटी और उसकी गाइडलाइन एक बार फिर चर्चा में आ गई है। 

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करीब डेढ़ दशक पहले संस्थान ने ऐसे मामलों में निर्णय लेने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तय की थी ताकि लंबे समय से वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट पर पड़े मरीजों के मामलों में चिकित्सकीय और नैतिक आधार पर फैसला लिया जा सके।
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सुप्रीम कोर्ट ने जिस युवक हरीश राणा के मामले में हाल ही में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी है, वह 2013 में चंडीगढ़ के सेक्टर-15 की एक पीजी में हादसे के बाद पीजीआई में भर्ती रहा था और लंबे समय तक गंभीर हालत में उसका इलाज चला था। उस समय संस्थान के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख रहे डॉ. सुरेंद्र जिंदल ने बताया कि पीजीआई ने 2009-10 में ही विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित कर ऐसे मामलों के लिए गाइडलाइन तैयार कर ली थी।

डॉ. जिंदल ने कहा कि कई बार मरीज लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रहता है और परिवार बेहद कठिन मानसिक स्थिति से गुजर रहा होता है। ऐसे मामलों में यदि परिजन इच्छा मृत्यु की मांग करते हैं तो बिना तय प्रक्रिया के निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। इसी को देखते हुए संस्थान ने पहले से ही एक व्यवस्थित प्रणाली विकसित की थी ताकि निर्णय पूरी तरह चिकित्सकीय तथ्यों और नैतिक मानकों के आधार पर लिया जा सके। 

दो नजदीकी परिजनों की सहमति आवश्यक

गाइडलाइन के मुताबिक यदि किसी मरीज के परिजन इच्छा मृत्यु की मांग करते हैं तो सबसे पहले परिवार के कम से कम दो नजदीकी सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है। इसके बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम मरीज की क्लीनिकल स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करती है। डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज की स्थिति स्थायी रूप से अपरिवर्तनीय है और उसके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।

इस प्रक्रिया में अलग-अलग विभागों के विशेषज्ञ शामिल होते हैं और सामूहिक रूप से निर्णय लिया जाता है। सभी चिकित्सकीय और नैतिक पहलुओं पर विचार करने के बाद ही लाइफ सपोर्ट हटाने, यानी विथड्रॉल ऑफ लाइफ सपोर्ट, की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है।

चंडीगढ़ के मामले में भी हुई थी चर्चा

पीजीआई के एक पूर्व विभागाध्यक्ष के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने जिस युवक के मामले में फैसला दिया है, उसके साथ हुए गंभीर हादसे के बाद उसे पीजीआई में भर्ती कराया गया था। वह लंबे समय तक गंभीर अवस्था में रहा और विशेषज्ञ स्तर पर उसकी स्थिति को देखते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने के विकल्प पर चर्चा भी हुई थी। हालांकि उस समय परिवार इसके लिए सहमत नहीं हुआ और उपचार जारी रखा गया।विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद इच्छा मृत्यु और गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है। ऐसे में पीजीआई जैसी संस्थाओं की ओर से पहले से तैयार की गई स्पष्ट गाइडलाइन डॉक्टरों और मरीज के परिवारों के लिए ऐसे जटिल मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

पीजी की चौथी मंजिल से गिरा था हरीश राणा 

पीयू के छात्र हरीश राणा के साथ साल 2013 में हुआ एक हादसा उनकी पूरी जिंदगी बदल गया। सेक्टर-15 के एक पेइंग गेस्ट (पीजी) आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस घटना के बाद वह लंबे समय तक बेहोशी और गंभीर चिकित्सकीय अवस्था में रहे। 

वर्षों बाद उनका मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी। बताया जाता है कि अगस्त 2013 में गाजियाबाद निवासी हरीश राणा चंडीगढ़ में रहकर बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे और सेक्टर-15 के एक पीजी में रहते थे। देर रात अचानक तेज आवाज सुनकर पीजी में रहने वाले छात्र और आसपास के लोग नीचे पहुंचे तो हरीश राणा जमीन पर गंभीर रूप से घायल पड़े मिले। लोगों ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया। बाद में हालत ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें जीएमसीएच-32 में भर्ती कराया गया।

डॉक्टरों के अनुसार गिरने के कारण हरीश राणा के सिर में गंभीर चोट आई थी और उन्हें आईसीयू में रखकर इलाज शुरू किया गया। उस समय चिकित्सकों ने उनकी हालत बेहद नाजुक बताई थी। हादसे का असर इतना गहरा था कि वह सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सके और लंबे समय तक वेजिटेटिव अवस्था में रहे। हरीश राणा अपने कॉलेज में फिटनेस और जोश के लिए जाने जाते थे। वह जिम में नियमित अभ्यास करते थे और प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते थे। पढ़ाई में भी वह अच्छे छात्र माने जाते थे और भविष्य को लेकर बड़े सपने देखते थे। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच की थी और पीजी में रहने वाले छात्रों व मकान मालिक से पूछताछ की थी। प्रारंभिक जांच में इसे चौथी मंजिल से गिरने का हादसा माना गया। कई वर्षों तक गंभीर अवस्था में रहने के बाद परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और जीवन रक्षक उपचार समाप्त करने की अनुमति मांगी। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसके बाद यह पुराना हादसा एक बार फिर चर्चा में आ गया।

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