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हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: परंपरा के आधार पर विधवा को संपत्ति के अधिकार से वंचित करना असांविधानिक

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 28 Jan 2026 02:20 PM IST
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सार

1982 में दायर मुकदमे में पति के रिश्तेदारों ने दावा किया था कि विधवा को केवल पति के जीवनकाल के दौरान संपत्ति पर अधिकार है और वह इसके बाद संपत्ति नहीं बेच सकती। उसी वर्ष विधवा ने जमीन की बिक्री की थी।

High Court Depriving widow of her property rights based on tradition is unconstitutional
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने लैंगिक समानता के सिद्धांत को सुदृढ़ करते हुए 44 वर्ष पुराने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिनमें एक विधवा के गैर-पैतृक (नॉन-एन्सेस्ट्रल) संपत्ति को बेचने के अधिकार को सीमित किया गया था।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल महिला होने या वैवाहिक स्थिति के आधार पर संपत्ति अधिकारों को सीमित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत असांविधानिक है।
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मामला एक ऐसी सेल डीड से जुड़ा था जो एक विधवा महिला ने अपने पति के रिश्तेदारों की सहमति के बिना की थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि गुरुग्राम जिले के रिवाज-ए-आम के अनुसार विधवा को केवल पति के जीवनकाल तक संपत्ति पर अधिकार है और वह अपने पति के रिश्तेदारों की अनुमति के बिना संपत्ति नहीं बेच सकती। यह नियम विशेष रूप से मेव समुदाय की प्रचलित परंपराओं पर आधारित था।

हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को सीमित करने वाली कोई भी परंपरा, जो केवल लिंग या वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करती है संविधान में निहित समानता के अधिकार की कसौटी पर टिक नहीं सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि संपत्ति गैर-पैतृक है और बिक्री वैध आवश्यकता के लिए की गई है, तो पति के रिश्तेदारों की सहमति के अभाव में लेन-देन को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। महिला को पति से विरासत में मिली गैर-पैतृक संपत्ति को बेचने का पूर्ण अधिकार है। किसी भी समुदाय की ऐसी परंपरा जो महिला के संपत्ति अधिकारों को सीमित करती है, कानूनी रूप से अस्थिर और असंवैधानिक है।

1982 में दायर मुकदमे में पति के रिश्तेदारों ने दावा किया था कि विधवा को केवल पति के जीवनकाल के दौरान संपत्ति पर अधिकार है और वह इसके बाद संपत्ति नहीं बेच सकती। उसी वर्ष विधवा ने जमीन की बिक्री की थी। कार्यवाही के दौरान 1984 में विधवा की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी बेटी को कानूनी उत्तराधिकारी बनाया गया। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने पहले रिश्तेदारों के पक्ष में फैसला दिया था और गुरुग्राम के रिवाज-ए-आम पर भरोसा किया था लेकिन हाईकोर्ट ने इन आदेशों को पलटते हुए महिला के सांविधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी।
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