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Highcourt: शहीद की पत्नी को हक के लिए भटकना पड़ा, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण; आठ हफ्ते में लाभ देने के आदेश
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Mon, 16 Mar 2026 11:01 AM IST
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सार
अदालत ने टिप्पणी की कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की सेवा करते हुए शहीद हुए सैनिक की पत्नी को अपने अधिकार के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर जसविंदर कौर को पेंशन का लाभ दिया जाए।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले सेना अधिकारी की पत्नी को उदारीकृत पारिवारिक पेंशन देने के आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी।
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अदालत ने टिप्पणी की कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की सेवा करते हुए शहीद हुए सैनिक की पत्नी को अपने अधिकार के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर जसविंदर कौर को पेंशन का लाभ दिया जाए। यदि तय समय में लाभ नहीं दिया गया तो बकाया राशि पर ब्याज देना होगा और आदेश का पालन न करने पर अवमानना की कार्रवाई भी की जा सकती है।
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जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी), चंडीगढ़ के 22 अप्रैल 2022 के आदेश को सही ठहराते हुए केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सैनिक ने देश की सेवा करते हुए अपनी जान गंवाई है, इसलिए उनके परिवार के साथ संवेदनशीलता और सम्मान का व्यवहार होना चाहिए, न कि उन्हें मुकदमेबाजी में उलझाया जाए।
मामले में जसविंदर कौर के पति सेना में अधिकारी थे। एक अप्रैल 2018 को बाबीना फील्ड फायरिंग रेंज में टैंक बायथलॉन प्रतियोगिता के ट्रायल के दौरान उन्हें सिर में गंभीर चोट लग गई थी। अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई थी। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण ने मामले की सुनवाई के बाद माना था कि यह घटना सैन्य प्रशिक्षण के दौरान लाइव गोला-बारूद के साथ हो रहे अभ्यास के समय हुई थी। इसलिए मृतक अधिकारी की पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन के बजाय उदारीकृत पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए।
चार साल पहले जारी हुए आदेश को दी अब चुनाैती
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायाधिकरण का आदेश लगभग चार साल पहले पारित हो चुका है, लेकिन इसे अब चुनौती दी गई है। इसके अलावा आदेश के बावजूद लाभ भी लागू नहीं किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।