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पीजीआई शोध: एआई से घर-घर जांच में बढ़ी भागीदारी, 40 फीसदी से ज्यादा मरीज अस्पताल जाने को नहीं तैयार

वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 19 Jan 2026 11:44 AM IST
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सार

शोध मोहाली जिले के बूथगढ़ ब्लॉक के 30 गांवों में किया गया। करीब 1.2 लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में 600 डायबिटीज मरीजों को अध्ययन में शामिल किया गया।

PGI research AI based home testing increases participation
Eye Test - फोटो : istock
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विस्तार
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डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में आंखों की गंभीर बीमारी डायबिटिक रेटिनोपैथी धीरे-धीरे अंधेपन की ओर ले जाती है लेकिन इसके शुरुआती लक्षण नजर नहीं आते। ऐसे में समय पर जांच ही बचाव का एकमात्र रास्ता है।
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इसी चुनौती को समझने के लिए पीजीआई के एडवांस आई सेंटर ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक अहम शोध किया है जिसने स्वास्थ्य सेवाओं के पारंपरिक अस्पताल-आधारित मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन में सामने आया कि बड़ी संख्या में मरीज अस्पताल जाने से बचते हैं, जबकि घर पर जांच की सुविधा मिलने पर वे खुलकर आगे आते हैं। यह शोध इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थोमोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।
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यह शोध मोहाली जिले के बूथगढ़ ब्लॉक के 30 गांवों में किया गया। करीब 1.2 लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में 600 डायबिटीज मरीजों को अध्ययन में शामिल किया गया। मरीजों को आंखों की जांच और परामर्श के लिए तीन अलग-अलग मॉडल अपनाए गए ताकि यह परखा जा सके कि ग्रामीण इलाकों में कौन-सा तरीका ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य है।

हेल्थ सेंटर मॉडल में कमजोर भागीदारी

शोध में पाया गया कि जब मरीजों को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर पर बुलाकर जांच की गई तो 40 प्रतिशत से अधिक मरीज वहां पहुंचे ही नहीं। दूरी, परिवहन की कमी, बुजुर्गों की शारीरिक कमजोरी और आंखों में कोई शिकायत न होने जैसी सोच इसकी बड़ी वजह रही। सिर्फ रेफरल देने से भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, क्योंकि कई मरीज सलाह मिलने के बावजूद अस्पताल नहीं पहुंचे।

घर पहुंची तकनीक, बढ़ा भरोसा

इसके उलट जब पीजीआई की टीम एआई आधारित पोर्टेबल तकनीक के साथ सीधे मरीजों के घर पहुंची तो भागीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। मोबाइल फंडस कैमरे से ली गई आंखों की तस्वीरों का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए तुरंत विश्लेषण किया गया। इस मॉडल में केवल 13 प्रतिशत मरीजों ने जांच से इन्कार किया। खास बात यह रही कि बुजुर्गों और महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा रही, जो आमतौर पर अस्पताल जाने से हिचकते हैं।

सिर्फ रेफरल काफी नहीं

तीसरे मॉडल में मरीजों को सीधे अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन इसमें भी बड़ी संख्या में लोग जांच के लिए नहीं पहुंचे। इससे यह साफ हुआ कि सिर्फ सलाह या रेफरल देना पर्याप्त नहीं है बल्कि सेवाओं को मरीज के दरवाजे तक पहुंचाना जरूरी है।

जागरूकता की कमी बड़ी वजह

इस बहु-विषयक शोध टीम में पीजीआई के डॉ. अंशुल चौहान, डॉ. ल्यूक वेले, डॉ. अंकिता कांकरिया, डॉ. विशाली गुप्ता, डॉ. मनदीप सिंह, डॉ. गगनदीप कौर सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे। उनका कहना है कि ग्रामीण भारत में डायबिटिक रेटिनोपैथी अंधेपन की बड़ी वजह है लेकिन जागरूकता और सुविधाओं की कमी के कारण मरीज समय पर जांच नहीं करा पाते। एआई आधारित घर-घर स्क्रीनिंग इस खाई को पाट सकती है।

गांव-गांव पहुंची तकनीक

फील्ड स्टडी के दौरान बिजली कटौती, रोशनी की कमी और तकनीकी चुनौतियां सामने आईं लेकिन स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों के सहयोग से इन्हें दूर किया गया। इससे ग्रामीणों में भरोसा बढ़ा और लोग जांच के लिए आगे आए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंधेपन की रोकथाम को गंभीरता से लेना है, तो अस्पताल की चहारदीवारी से बाहर निकलकर तकनीक को गांव और घर तक पहुंचाना होगा।
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