पीजीआई शोध: आप ठीक हो जाएंगे, ये भरोसा भी है इलाज; कैप्सूल में दवा नहीं थी तब भी आया आराम
जोड़ों के दर्द से परेशान मरीज जब रोज डॉक्टर की दी हुई गोली लेता है, तो वह सिर्फ दवा नहीं खाता, बल्कि ठीक होने की उम्मीद भी अपने साथ लेता है। कई बार यही उम्मीद दर्द को कुछ कम महसूस करा देती है। इस बात को अब पीजीआई की रिसर्च ने साबित किया है।
विस्तार
मरीज जब डॉक्टर के पास पहुंचता है तो उसकी पहली दवा अक्सर पर्ची पर नहीं बल्कि डॉक्टर के शब्दों में होती है-आप ठीक हो जाएंगे। यही भरोसा कई बार असहनीय दर्द से लड़ने की ताकत बन जाता है।
पीजीआई चंडीगढ़ में हुए एक शोध ने साबित किया है कि इलाज में दवा जितनी जरूरी है, उतनी ही अहम भूमिका डॉक्टर की बात और मरीज की उम्मीद निभाती है। जोड़ों के लंबे और असहनीय दर्द से जूझ रहे मरीज जब रोज दवा लेते हैं, तो वह केवल गोली नहीं खा रहे होते, बल्कि उसके साथ ठीक होने की उम्मीद भी संजोते हैं।
इंटरनल मेडिसिन विभाग के रूमेटोलॉजी डिवीजन में किए शोध में इसी मानवीय अनुभव को वैज्ञानिक रूप से परखा गया। नतीजे चौंकाने वाले रहे—जहां असली दवा नहीं दी गई, वहां भी मरीजों ने उतनी ही राहत महसूस की, जितनी दवा लेने से होती।
डबल-ब्लाइंड रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल पद्धति से शोध
शोध इंडियन जर्नल ऑफ रुमेटोलॉजी में प्रकाशित हुआ। इसे डबल-ब्लाइंड रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल पद्धति से किया गया, ताकि न डॉक्टर की सोच और न ही मरीज की उम्मीद परिणाम को प्रभावित कर सके। अगस्त 2021 से सितंबर 2023 तक 224 मरीजों की जांच में से 94 मरीजों को शोध में शामिल किया गया। शोध में पाया गया कि प्लेसीबो लेने वाले मरीजों ने भी दर्द में राहत महसूस की। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक स्थिति, भरोसा और उम्मीद भी उपचार की अहम कड़ी हैं।
एक को दवा दिया और दूसरे को डमी टेबलेट
इन मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को ओरल स्टेरॉयड दवा दी गई, जबकि दूसरे समूह को बिल्कुल वैसी ही दिखने वाली डमी टेबलेट (प्लेसिबो) दी गई, जिसमें कोई सक्रिय दवा नहीं थी। खास बात यह रही कि मरीजों को यह नहीं बताया गया कि वे असली दवा ले रहे हैं या डमी गोली। इलाज कर रहे डॉक्टर भी इससे अनजान रहे, ताकि इलाज के असर का निष्पक्ष आकलन हो सके। शुरुआती कुछ हफ्तों में दोनों ही समूहों के कई मरीजों ने बताया कि उन्हें दर्द और जकड़न में राहत महसूस हो रही है। कुछ ने सूजन कम होने की बात कही। इस स्तर पर यह साफ दिखा कि सिर्फ इलाज शुरू होने का भरोसा भी मरीज के अनुभव को बदल सकता है।
टेस्ट के परिणाम खास
लेकिन जब 12 और फिर 24 हफ्तों पर मरीजों की विस्तृत जांच की गई और जोड़ों की सूजन, दर्द की तीव्रता तथा खून की जांच के आंकड़ों को देखा गया, तो तस्वीर साफ हो गई। स्टेरॉयड लेने वाले मरीजों में सुधार, डमी टेबलेट लेने वालों से बेहतर साबित नहीं हुआ। यानी जिस राहत की उम्मीद स्टेरॉयड से की जा रही थी, वह वैज्ञानिक आंकड़ों में स्पष्ट नहीं दिखी। असली फर्क तब सामने आया जब साइड इफेक्ट्स का विश्लेषण किया गया।
डमी टेबलेट लेने वाले मरीजों में कोई गंभीर दुष्प्रभाव दर्ज नहीं हुआ, जबकि स्टेरॉयड लेने वाले मरीजों में ब्लड शुगर बढ़ने, नया हाई ब्लड प्रेशर विकसित होने और एक मरीज में स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थिति सामने आई। इससे यह साफ हो गया कि भरोसे से महसूस हुई राहत सुरक्षित रही, लेकिन दवा से जुड़ा जोखिम वास्तविक था।
रिसर्च से जुड़े डॉक्टरों के अनुसार, यह अध्ययन बताता है कि स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस जैसी दीर्घकालिक बीमारी में मरीज को शुरुआती राहत कई बार मनोवैज्ञानिक कारणों से महसूस हो सकती है, लेकिन इलाज की वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन लंबे समय और ठोस मेडिकल आंकड़ों से ही किया जाना चाहिए। मौजूदा नतीजे यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि बिना पुख्ता वैज्ञानिक सबूत के स्टेरॉयड का नियमित इस्तेमाल मरीजों को फायदा कम और नुकसान ज्यादा पहुंचा सकता है।
