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Chandigarh News: रुपये में गिरावट से एमएसएमई और उद्योग पर गहरा संकट

Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 25 Jan 2026 09:29 PM IST
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The fall in the value of the rupee poses a serious crisis for MSMEs and the industry.
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राजीव शर्मा
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लुधियाना। भारतीय अर्थव्यवस्था और खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए बीते एक वर्ष में मुद्रा के मोर्चे पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वर्ल्ड एमएसएमई फोरम ने चेतावनी दी है कि रुपये को वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले प्रभावी रूप से 22 प्रतिशत से अधिक अवमूल्यन का सामना करना पड़ा है जिसने उद्योग और निर्यातकों की कमर तोड़ दी है। उद्यमियों के अनुसार यह संकट दोहरी मुद्रा मार के कारण पैदा हुआ है। एक ओर जहां वर्ष 2025 से शुरुआती 2026 के बीच अमेरिकी डॉलर प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले 9 से 11 प्रतिशत तक कमजोर हुआ, वहीं दूसरी ओर भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 82 रुपये से गिरकर करीब 91.67 रुपये तक पहुंच गया जो लगभग 11.8 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है। इन दोनों प्रभावों को मिलाकर देखा जाए तो भारतीय उद्योग को एक ही साल में 22 प्रतिशत से अधिक मुद्रा क्षरण झेलना पड़ा है।
फोरम के प्रधान बदीश जिंदल का कहना है कि यह भारतीय एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक छिपा हुआ लेकिन बेहद घातक झटका है। उत्पादकता, दक्षता या कीमत तय करने की क्षमता में कोई बदलाव न होने के बावजूद उद्योग ने 22 प्रतिशत से ज्यादा का मुद्रा नुकसान सह लिया है।
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उद्योग और अर्थव्यवस्था पर असर
-एमएसएमई को कच्चे माल, मशीनरी, ऊर्जा और आयातित इनपुट की लागत में तेज बढ़ोतरी झेलनी पड़ रही है, जिससे मुनाफा घटा और कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ा।
-आम धारणा के विपरीत, निर्यातक भी लाभ में नहीं हैं, क्योंकि बढ़ती लागत और मुद्रा अस्थिरता से लंबे समय के निर्यात अनुबंध प्रभावित हुए हैं।
-इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे आयात-निर्भर क्षेत्रों में लागत बढ़ने से घरेलू महंगाई पर भी दबाव बढ़ा है।
-कुल मिलाकर, आयातित महंगाई, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमी और व्यापार घाटे पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल रहा है।
चीन से तुलना में भारत पिछड़ा
जिंदल ने बताया कि इसी अवधि में चीनी युआन 7.31 से मजबूत होकर 6.97 प्रति डॉलर पर पहुंच गया, यानी करीब 5 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई। इसके विपरीत भारतीय मुद्रा को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि चीन एक नियंत्रित और प्रबंधित मुद्रा व्यवस्था अपनाता है, जिसमें मुद्रा को सीमित दायरे में रखा जाता है। इससे वहां के निर्यातकों और उद्योगों को कीमतों में स्थिरता और लंबी अवधि की योजना बनाने का भरोसा मिलता है।
सरकार से प्रमुख मांगें
-वर्ल्ड एमएसएमई फोरम ने केंद्र सरकार से मांग की है कि निर्यातकों और आयातकों के लिए प्रबंधित या आंशिक रूप से स्थिर विनिमय दर तंत्र लागू किया जाए। रुपये को संकीर्ण दायरे में स्थिर रखा जाए, चीन की तर्ज पर एमएसएमई के लिए विशेष मुद्रा हेजिंग और स्थिरता समर्थन उपलब्ध कराया जाए। अत्यधिक मुद्रा उतार-चढ़ाव को केवल बाजार की घटना न मानकर उद्योग के लिए संरचनात्मक खतरा माना जाए। गैर-जरूरी आयात पर उच्च शुल्क लगाकर आयात में कटौती की जाए। जिंदल ने कहा कि स्थिर मुद्रा कोई सब्सिडी नहीं, बल्कि आर्थिक ढांचे की बुनियाद है। अगर भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात का केंद्र बनना है, तो एमएसएमई के लिए मुद्रा स्थिरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना ही होगा।
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