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Dhamtari: बीमार युवा हाथी का सफल इलाज, हाथी मित्र दल और डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई, अपने झुंड में वापस लौटा

Sat, 01 Aug 2026 09:00 AM IST
धमतरी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धमतरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धमतरी Published by: धमतरी ब्यूरो Updated Sat, 01 Aug 2026 09:00 AM IST
सार

कई महीनों तक अकेले भटकने से बीमार पड़े एक युवा हाथी के लिए वन विभाग और पशु चिकित्सक मसीहा बनकर सामने आए। लगातार इलाज और निगरानी के बाद हाथी न केवल स्वस्थ हुआ, बल्कि अपने झुंड में भी वापस लौट गया।

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Dhamtari News: Young Elephant Returns to Herd After Successful Treatment by Forest Team and Veterinarians
इलाज के बाद झुंड में लौटा बीमार हाथी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन विभाग, हाथी मित्र दल और पशु चिकित्सकों के संयुक्त प्रयास से एक युवा हाथी की जान बचाने में सफलता मिली है। करीब 6-7 वर्ष का एक नर हाथी अपने झुंड से बिछड़ गया था, जिसके बाद उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। समय पर उपचार और निगरानी के बाद न केवल उसकी जान बचाई गई, बल्कि वह दोबारा अपने झुंड से भी जा मिला।

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उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप संचालक वरुण जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि हाथी मित्र दल कुल्हाड़ीघाट परिक्षेत्र में हाथियों की नियमित निगरानी कर रहा था। इसी दौरान टीम को पता चला कि करीब 6-7 वर्ष का एक नर हाथी नवंबर 2025 में ओडिशा से छत्तीसगढ़ पहुंचे सिकासार हाथी दल से बिछड़ गया है।
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लंबे समय तक अकेले भटकने के कारण हाथी का स्वास्थ्य लगातार खराब होने लगा। वनकर्मियों ने देखा कि वह सामान्य व्यवहार नहीं कर रहा था। उसे कई दिनों से मल त्याग करने और भोजन निगलने में भी कठिनाई हो रही थी। धीरे-धीरे उसकी शारीरिक स्थिति कमजोर होती गई। इस दौरान हाथी कुल्हाड़ीघाट से धवलपुर वनमंडल होते हुए उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के अर्सिकन्हार परिक्षेत्र तक सैकड़ों किलोमीटर तक भटकता रहा।
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चिकित्सकों ने किया लगातार इलाज
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उप संचालक वरुण जैन के निर्देश पर विशेष चिकित्सा दल गठित किया गया। वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. पी.के. चंदन और डॉ. राकेश वर्मा मौके पर पहुंचे और वन अमले के सहयोग से हाथी की विस्तृत जांच की।




अर्सिकन्हार क्षेत्र में हाथी की उल्टी के नमूने एकत्र कर कृमि संक्रमण और अन्य संभावित कारणों की जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए। इसके बाद तौरेंगा परिक्षेत्र में करीब एक सप्ताह तक हाथी का लगातार उपचार किया गया। वन कर्मचारियों ने 24 घंटे उसकी गतिविधियों पर नजर रखी, जबकि चिकित्सकों ने नियमित दवाएं और उपचार जारी रखा। लगातार इलाज का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। करीब 10 से 15 दिनों के भीतर हाथी ने नरम मक्का और अन्य खाद्य सामग्री खाना शुरू कर दिया। इसके बाद उसकी ताकत वापस लौटने लगी और वह सामान्य रूप से जंगल में विचरण करने लगा।

फिर अपने झुंड से मिला हाथी
वन अधिकारियों के अनुसार सबसे बड़ी राहत तब मिली, जब सिकासार हाथी दल ने इस युवा हाथी को दोबारा अपने झुंड में स्वीकार कर लिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय पर हाथी का उपचार नहीं किया जाता, तो वह भोजन की तलाश में बार-बार गांवों की ओर जा सकता था। इससे फसलों को नुकसान, ग्रामीणों में दहशत और मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका थी। वन विभाग की समय पर की गई पहल से न केवल एक दुर्लभ वन्यजीव की जान बची, बल्कि संभावित मानव-हाथी संघर्ष को भी टाला जा सका।

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