ग्लास्गो के कॉमनवेल्थ गेम्स में जब रेफरी ने मुकाबला खत्म होने का संकेत दिया तो भारत के 23 वर्षीय जूडोका हर्ष सिंह ने राहत की लंबी सांस ली। कुछ ही सेकंड बाद तिरंगा उनके कंधों पर था और इतिहास उनके नाम। पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग का स्वर्ण पदक जीतने के साथ हर्ष सिंह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो के पुरुष वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय बन गए।
Who is Harsh Singh: मैट पर बरसों का पसीना रंग लाया, 23 साल के हर्ष ने भारत को दिलाया जूडो का पहला पुरुष स्वर्ण
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 23 वर्षीय हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो के पुरुष वर्ग में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बने। घरेलू मैट से विश्व मंच तक का उनका सफर संघर्ष, अनुशासन और धैर्य की प्रेरक मिसाल है।
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छोटे मैट से शुरू हुआ बड़ा सपना
करीब 2003 में जन्मे हर्ष सिंह ने बचपन से ही जूडो को अपनी जिंदगी बना लिया था। जब दूसरे बच्चे छुट्टियों में खेलते थे, तब हर्ष घंटों मैट पर अभ्यास करते थे। उनके लिए हर दिन का लक्ष्य सिर्फ एक था—कल से बेहतर बनना। घरेलू प्रतियोगिताओं में उन्होंने लगातार अपनी छाप छोड़ी। उम्र में बड़े और अनुभवी खिलाड़ियों को हराकर उन्होंने यह संकेत दे दिया था कि भारतीय जूडो को एक नया सितारा मिल चुका है।
राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय टीम के चयनकर्ताओं की नजर में ला दिया और जल्द ही उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में जगह मिल गई। यहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय सफर की असली शुरुआत हुई।
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बीच बनाई पहचान
भारत में सफल होना एक बात थी, लेकिन दुनिया के सबसे कठिन जूडो सर्किट में खुद को साबित करना बिल्कुल अलग चुनौती थी। हर्ष ने इंटरनेशनल जूडो फेडरेशन (IJF) वर्ल्ड टूर में लगातार हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने टोक्यो ग्रैंड स्लैम 2025, ताशकंद ग्रैंड स्लैम 2026 और सीनियर एशियन चैंपियनशिप जैसे बड़े टूर्नामेंटों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
इन प्रतियोगिताओं में हर मुकाबला आसान नहीं था। कई बार हार मिली, कई बार अनुभवी खिलाड़ियों के सामने अनुभव कम पड़ गया, लेकिन हर हार उन्हें पहले से ज्यादा मजबूत बनाती चली गई। लगातार मेहनत का ही नतीजा था कि वह दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी 60 किलोग्राम वर्ग में टॉप-100 खिलाड़ियों में जगह बनाने में सफल रहे। कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले कजाकिस्तान बैरिसी ग्रैंड स्लैम 2026 में सातवां स्थान हासिल कर उन्होंने संकेत दे दिया था कि अब वह बड़े मंच पर कुछ बड़ा करने के लिए तैयार हैं।
ग्लास्गो में एक-एक मुकाबले के साथ बढ़ता गया आत्मविश्वास
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में हर्ष का अभियान किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। उन्होंने शुरुआती मुकाबले में मलावी के चिकोंडी काथेवेरा को इप्पोन से हराकर शानदार शुरुआत की। क्वार्टर फाइनल में वानुआतु के एलन मोंथोएल को मात देकर पदक की दौड़ में जगह बनाई। सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के पेड्रो कार्लोस एंटुन नेटो के खिलाफ मुकाबला बेहद कड़ा रहा, लेकिन हर्ष ने वाजा-आरी के दम पर जीत दर्ज कर फाइनल का टिकट हासिल कर लिया।
फाइनल... सामने था टॉप सीड खिलाड़ी
स्वर्ण पदक मुकाबले में उनके सामने ऑस्ट्रेलिया के शीर्ष वरीयता प्राप्त जोशुआ काट्ज थे। कागज पर अनुभव और रैंकिंग दोनों ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी के पक्ष में थे। लेकिन बड़े मुकाबले अक्सर रैंकिंग नहीं, हौसले जीतते हैं। मुकाबले के अंतिम मिनट में हर्ष ने शानदार लो ताई-ओतोशी तकनीक का इस्तेमाल किया।
एक बेहतरीन मूव और पूरा मुकाबला पलट गया। वाजा-आरी के साथ उन्होंने निर्णायक बढ़त बनाई और 10-0 से मुकाबला जीतकर भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिला दिया। मैट पर गिरा प्रतिद्वंद्वी और आसमान की ओर देखते हुए मुस्कुराते हर्ष... यही पल भारतीय जूडो के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।