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Hindi News ›   Sports ›   Who is Yash Vir Singh who Scripted India's Commonwealth Games Glory, One Final Throw, One Historic Medal

Who is Yash Vir Singh: आखिरी थ्रो ने बदली किस्मत, यशवीर ने भारत को दिलाया ऐतिहासिक कांस्य; पिता की सीख रंग लाई

Sat, 01 Aug 2026 02:56 AM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, ग्लास्गो
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, ग्लास्गो Published by: स्वप्निल शशांक Updated Sat, 01 Aug 2026 02:56 AM IST
सार

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में यशवीर सिंह ने आखिरी थ्रो में 85.41 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर कांस्य पदक जीत लिया। हरियाणा के भिवानी से निकलकर पिता की देखरेख में तैयार हुए यशवीर ने अंतिम प्रयास में इतिहास रचते हुए भारत को भाला फेंक में रजत-कांस्य का डबल पोडियम दिलाया।

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Who is Yash Vir Singh who Scripted India's Commonwealth Games Glory, One Final Throw, One Historic Medal
यशवीर सिंह - फोटो : Twitter

विस्तार

ग्लास्गो के स्टेडियम में भाला हवा को चीरता हुआ लगातार आगे बढ़ रहा था। कुछ सेकंड के लिए पूरा स्टेडियम खामोश था। जैसे ही दूरी 85.41 मीटर दर्ज हुई, यशवीर सिंह ने दोनों हाथ हवा में उठा दिए। यह सिर्फ उनका सर्वश्रेष्ठ थ्रो नहीं था, बल्कि वह थ्रो था जिसने उन्हें सीधे पोडियम पर पहुंचा दिया।

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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के पुरुषों के भाला फेंक फाइनल में आखिरी प्रयास में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए यशवीर सिंह ने कांस्य पदक जीत लिया। इस एक थ्रो ने न केवल उनकी वर्षों की मेहनत का इनाम दिया, बल्कि भारत को नीरज चोपड़ा के रजत और यशवीर के कांस्य के रूप में ऐतिहासिक डबल पोडियम भी दिला दिया। जिस समय यशवीर आखिरी प्रयास के लिए रन-अप ले रहे थे, तब पदक उनसे दूर दिखाई दे रहा था। लेकिन बड़े खिलाड़ी वही होते हैं, जो सबसे ज्यादा दबाव में अपना सर्वश्रेष्ठ निकालते हैं।
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भिवानी की मिट्टी से निकला एक और भाला फेंक खिलाड़ी
 

  • 22 अक्तूबर 2001 को हरियाणा के भिवानी जिले के देवसर गांव में जन्मे यशवीर सिंह के लिए भाला फेंक कोई नया खेल नहीं था।
  • उनके पिता राय सिंह खुद राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रोअर रह चुके हैं। उन्होंने रेलवे के लिए खेला, कई खिताब जीते और बाद में रेलवे में कोच भी बने।
  • उन्होंने अपने खेल जीवन में अच्छी प्रतिभा होने के बावजूद एक कमी हमेशा महसूस की, उन्हें शुरुआती दिनों में सही तकनीकी मार्गदर्शन नहीं मिल पाया।
  • यही अधूरा सपना उन्होंने अपने बेटे के जरिए पूरा करने का फैसला किया।

Who is Yash Vir Singh who Scripted India's Commonwealth Games Glory, One Final Throw, One Historic Medal
यशवीर सिंह - फोटो : Twitter
14 साल की उम्र से शुरू हुई तैयारी
साल 2015 में जब यशवीर सिर्फ 14 साल के थे, तब उनके पिता ने उन्हें खुद जैवलिन थ्रो की बारीकियां सिखानी शुरू कर दीं। हर रन-अप, हर कदम, हर रिलीज और हर तकनीक पर घंटों मेहनत होती थी। पिता चाहते थे कि बेटा वही गलतियां कभी न दोहराए, जिनकी कीमत उन्हें अपने करियर में चुकानी पड़ी थी। इस मेहनत का असर जल्द ही दिखाई देने लगा।

जूनियर स्तर पर बनने लगे चैंपियन
यशवीर ने लगातार दो बार अंडर-18 राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद जूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर उन्होंने साफ कर दिया कि भारतीय जैवलिन को एक नया सितारा मिल चुका है। लेकिन असली पहचान तब मिली, जब उन्होंने भारतीय अंडर-20 फेडरेशन कप में नीरज चोपड़ा का पुराना मीट रिकॉर्ड तोड़ दिया। यह उपलब्धि किसी भी युवा भारतीय जैवलिन थ्रोअर के लिए बड़ी बात थी।

80 मीटर क्लब में एंट्री और अंतरराष्ट्रीय पहचान
2022 में यशवीर पहली बार 80 मीटर का आंकड़ा पार करने में सफल रहे। इसके बाद उनका आत्मविश्वास लगातार बढ़ता गया। 2025 में उन्होंने एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 82.57 मीटर के साथ पांचवां स्थान हासिल किया। उज्बेकिस्तान में आयोजित जी. अर्जुमानोव मेमोरियल मीट में स्वर्ण पदक जीता और फिर विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। जून 2026 में 83.72 मीटर का थ्रो कर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए अपनी जगह लगभग पक्की कर ली।

ग्लास्गो में सामने थे दुनिया के सबसे बड़े नाम
कॉमनवेल्थ गेम्स का फाइनल आसान नहीं था। एक तरफ भारत के नीरज चोपड़ा थे, दूसरी ओर पाकिस्तान के ओलंपिक चैंपियन अरशद नदीम, ग्रेनाडा के विश्व चैंपियन एंडरसन पीटर्स और श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिराजे जैसे बड़े खिलाड़ी। शुरुआत में श्रीलंका के थरंगा ने 89.75 मीटर का शानदार थ्रो कर बढ़त बना ली। नीरज चोपड़ा 85.83 मीटर के साथ दूसरे स्थान पर थे। वहीं यशवीर पदक की दौड़ में तो थे, लेकिन एंडरसन पीटर्स उनसे आगे थे। उधर बड़ा उलटफेर तब हुआ, जब पाकिस्तान के स्टार अरशद नदीम शुरुआती तीन थ्रो के बाद ही प्रतियोगिता से बाहर हो गए।

जब सब कुछ आखिरी थ्रो पर टिका था...
छह राउंड की प्रतियोगिता अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी। यशवीर जानते थे कि अगर पदक जीतना है तो अब तक का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करना होगा। उन्होंने लंबा रन-अप लिया। सारी ताकत और वर्षों की मेहनत उस एक रिलीज में समा गई। भाला हवा में तेजी से आगे बढ़ा। दूरी नापी गई- 85.41 मीटर।

यह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। यही थ्रो उन्हें एंडरसन पीटर्स से आगे ले गया और वह सीधे तीसरे स्थान पर पहुंच गए। स्टेडियम तालियों से गूंज उठा। भारत को नीरज चोपड़ा के रजत और यशवीर सिंह के कांस्य के रूप में ऐतिहासिक डबल पोडियम मिल चुका था।

एक थ्रो जिसने पूरी कहानी बदल दी
खेल में कई बार पूरा करियर एक पल में बदल जाता है। यशवीर सिंह के लिए वह पल ग्लास्गो का आखिरी थ्रो था। अगर वह प्रयास कुछ सेंटीमीटर भी छोटा रहता, तो शायद वह पोडियम से बाहर रह जाते। लेकिन बड़े खिलाड़ी दबाव में घबराते नहीं, बल्कि अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। यशवीर ने भी वही किया। देवसर गांव से शुरू हुआ सफर कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक पहुंच गया। पिता की वर्षों की मेहनत, बेटे का धैर्य और आखिरी थ्रो का साहस, इन तीनों ने मिलकर भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में एक नई कहानी लिख दी।

यशवीर सिंह का करियर सफर

वर्ष उपलब्धि
2015 14 वर्ष की उम्र में पिता राय सिंह से जैवलिन की ट्रेनिंग शुरू
2017 अंडर-18 राष्ट्रीय चैंपियनशिप – स्वर्ण
2018 लगातार दूसरी बार अंडर-18 राष्ट्रीय चैंपियन – स्वर्ण
2019 जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप – रजत
2022 पहली बार 80 मीटर का आंकड़ा पार
2025 एशियाई एथलेटिक्स में पांचवां स्थान (82.57 मीटर), जी. अर्जुमानोव मेमोरियल – स्वर्ण
2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में 85.41 मीटर के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ के साथ कांस्य पदक
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