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26 साल पुराने हाउसिंग लोन घोटाले में बड़ा खुलासा: फरार आरोपी गिरफ्त में, EOW की कार्रवाई तेज
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Wed, 18 Mar 2026 06:28 PM IST
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सार
राजधानी रायपुर में वर्षों पुराने गृह निर्माण ऋण घोटाले में आखिरकार बड़ी कार्रवाई हुई है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने लंबे समय से फरार चल रहे दो मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।
फरार आरोपी गिरफ्त में
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राजधानी रायपुर में वर्षों पुराने गृह निर्माण ऋण घोटाले में आखिरकार बड़ी कार्रवाई हुई है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने लंबे समय से फरार चल रहे दो मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें 25 मार्च तक पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है।
यह मामला 90 के दशक का है, जब जरूरतमंदों को मकान उपलब्ध कराने के नाम पर सरकारी योजना के तहत करोड़ों रुपये का गबन किया गया था। जांच एजेंसी के अनुसार, 1995 से 1998 के बीच 186 लोगों के नाम पर एक-एक लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया और कुल 1 करोड़ 86 लाख रुपये जारी कर दिए गए।
हालांकि जब बाद में जमीन पर जाकर सत्यापन किया गया, तो पूरी कहानी ही अलग निकली। जिन स्थानों पर मकान बनने का दावा किया गया था, वहां न तो कोई निर्माण मिला और न ही उन लाभार्थियों का कोई अस्तित्व सामने आया। इससे साफ हो गया कि पूरा खेल कागजों में ही रचा गया था।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए पूरे सिस्टम को गुमराह किया। कूटरचित प्रमाण पत्र तैयार किए गए, बिना जांच के ऋण स्वीकृत कराए गए और बाद में उपयोगिता प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए गए। इस तरह सुनियोजित तरीके से सरकारी राशि का गबन किया गया।
EOW के अनुसार, इस मामले में शामिल अन्य दो आरोपी अब जीवित नहीं हैं, जिससे जांच और जटिल हो गई है। वहीं, गिरफ्तार दोनों आरोपी लंबे समय से फरार थे और नोटिस के बावजूद जांच एजेंसी के सामने पेश नहीं हो रहे थे।
अब पुलिस रिमांड के दौरान आरोपियों से पूछताछ कर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस घोटाले में और कौन-कौन शामिल था और किस स्तर पर मिलीभगत हुई। अधिकारियों का मानना है कि पूछताछ में कई और अहम खुलासे हो सकते हैं।
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यह मामला 90 के दशक का है, जब जरूरतमंदों को मकान उपलब्ध कराने के नाम पर सरकारी योजना के तहत करोड़ों रुपये का गबन किया गया था। जांच एजेंसी के अनुसार, 1995 से 1998 के बीच 186 लोगों के नाम पर एक-एक लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया और कुल 1 करोड़ 86 लाख रुपये जारी कर दिए गए।
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हालांकि जब बाद में जमीन पर जाकर सत्यापन किया गया, तो पूरी कहानी ही अलग निकली। जिन स्थानों पर मकान बनने का दावा किया गया था, वहां न तो कोई निर्माण मिला और न ही उन लाभार्थियों का कोई अस्तित्व सामने आया। इससे साफ हो गया कि पूरा खेल कागजों में ही रचा गया था।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए पूरे सिस्टम को गुमराह किया। कूटरचित प्रमाण पत्र तैयार किए गए, बिना जांच के ऋण स्वीकृत कराए गए और बाद में उपयोगिता प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए गए। इस तरह सुनियोजित तरीके से सरकारी राशि का गबन किया गया।
EOW के अनुसार, इस मामले में शामिल अन्य दो आरोपी अब जीवित नहीं हैं, जिससे जांच और जटिल हो गई है। वहीं, गिरफ्तार दोनों आरोपी लंबे समय से फरार थे और नोटिस के बावजूद जांच एजेंसी के सामने पेश नहीं हो रहे थे।
अब पुलिस रिमांड के दौरान आरोपियों से पूछताछ कर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस घोटाले में और कौन-कौन शामिल था और किस स्तर पर मिलीभगत हुई। अधिकारियों का मानना है कि पूछताछ में कई और अहम खुलासे हो सकते हैं।