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Denmark: ग्रीनलैंड विवाद के बाद डेनमार्क में पहला आम चुनाव, देश के लिए रणनीतिक रूप से अहम है ये इलेक्शन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोपेनहेगन
Published by: Nitin Gautam
Updated Tue, 24 Mar 2026 01:22 PM IST
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सार
डेनमार्क में ग्रीनलैंड विवाद के बाद पहला आम चुनाव हो रहा है। डेनमार्क की पीएम मेटे फ्रेडरिक्सन तीसरी बार पीएम पद की रेस में बनी हुई हैं। ग्रीनलैंड विवाद के दौरान जिस तरह से उन्होंने डेनमार्क का मजबूती से पक्ष रखा, उससे उनकी लोकप्रियता में उछाल आया है।
मेटे फ्रेडरिक्सन, डेनमार्क की प्रधानमंत्री
- फोटो : एएनआई/रॉयटर्स
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विस्तार
डेनमार्क में मंगलवार को आम चुनाव के लिए मतदान हुआ, जहां प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही हैं। यह चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी के बाद हो रहे हैं। इस चुनाव में करीब 43 लाख से अधिक मतदाता डेनमार्क की संसद के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कर रहे हैं। डेनमार्क में संसद का कार्यकाल चार वर्षों का होता है।
डेनमार्क के लिए रणनीतिक रूप से अहम चुनाव
प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने पिछले महीने समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान किया था। माना जा रहा है कि ग्रीनलैंड संकट के दौरान उनकी मजबूत नेतृत्व वाली छवि का फायदा उठाने के उद्देश्य से उन्होंने तय समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया है। ग्रीनलैंड विवाद के दौरान प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने अमेरिकी दबाव में झुकने से इनकार कर दिया था, जिससे ग्रीनलैंड और डेनमार्क में फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता में उछाल आया है। डेनमार्क, जो यूरोपीय संघ और नाटो का सदस्य है, वहां यह चुनाव राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
फ्रेडरिक्सन को इन नेताओं से मिल सकती है चुनौती
डेनमार्क में अक्तूबर में आम चुनाव प्रस्तावित थे, लेकिन यूक्रेन युद्ध और नोर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन के क्षतिग्रस्त होने पर जिस मजबूती से प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने अपने देश का पक्ष रखा, उससे फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता में उछाल आया, जिसके बाद फ्रेडरिक्सन सरकार ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया। डेनमार्क के चुनाव में बढ़ती महंगाई और असमानता प्रमुख मुद्दे हैं। साथ ही बदले हालात में देश की परमाणु नीति और सख्त अप्रवासन नीति भी अहम मुद्दे हैं। पीएम फ्रेडरिक्सन को मौजूदा रक्षा मंत्री और सेंटर-राइट लिबरल पार्टी के नेता ट्रोएल्स पॉलसन से तगड़ी चुनौती मिल सकती है। साथ ही लिबरल अलायंस के नेता एलेक्स वनोप्सलाग भी लोकप्रिय उम्मीदवार हैं।
ग्रीनलैंड विवाद क्या है
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डेनमार्क के लिए रणनीतिक रूप से अहम चुनाव
प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने पिछले महीने समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान किया था। माना जा रहा है कि ग्रीनलैंड संकट के दौरान उनकी मजबूत नेतृत्व वाली छवि का फायदा उठाने के उद्देश्य से उन्होंने तय समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया है। ग्रीनलैंड विवाद के दौरान प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने अमेरिकी दबाव में झुकने से इनकार कर दिया था, जिससे ग्रीनलैंड और डेनमार्क में फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता में उछाल आया है। डेनमार्क, जो यूरोपीय संघ और नाटो का सदस्य है, वहां यह चुनाव राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
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फ्रेडरिक्सन को इन नेताओं से मिल सकती है चुनौती
डेनमार्क में अक्तूबर में आम चुनाव प्रस्तावित थे, लेकिन यूक्रेन युद्ध और नोर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन के क्षतिग्रस्त होने पर जिस मजबूती से प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने अपने देश का पक्ष रखा, उससे फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता में उछाल आया, जिसके बाद फ्रेडरिक्सन सरकार ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया। डेनमार्क के चुनाव में बढ़ती महंगाई और असमानता प्रमुख मुद्दे हैं। साथ ही बदले हालात में देश की परमाणु नीति और सख्त अप्रवासन नीति भी अहम मुद्दे हैं। पीएम फ्रेडरिक्सन को मौजूदा रक्षा मंत्री और सेंटर-राइट लिबरल पार्टी के नेता ट्रोएल्स पॉलसन से तगड़ी चुनौती मिल सकती है। साथ ही लिबरल अलायंस के नेता एलेक्स वनोप्सलाग भी लोकप्रिय उम्मीदवार हैं।
ग्रीनलैंड विवाद क्या है
- ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
- ट्रंप का कहना है कि अमेरिका की सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड अहम है।
- उनके मुताबिक यहां से मिसाइल डिफेंस सिस्टम को और मजबूत किया जा सकता है।
- ट्रंप ने आशंका जताई कि रूस और चीन इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं।
- इसी वजह से उन्होंने सहयोगी देशों पर दबाव बनाने और ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी दी थी।
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