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बस्तर में नक्सलवाद का अंत करीब: 50 साल की हिंसा पर अंतिम प्रहार, 30 मार्च को संसद में निर्णायक चर्चा
अमर उजाला नेटवर्क, बलौदाबाजार
Published by: अमन कोशले
Updated Sun, 29 Mar 2026 02:36 PM IST
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सार
कभी नक्सल हिंसा के साए में जीने वाला बस्तर अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। पांच दशकों से अधिक समय तक क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को प्रभावित करने वाला नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कभी नक्सल हिंसा के साए में जीने वाला बस्तर अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। पांच दशकों से अधिक समय तक क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को प्रभावित करने वाला नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है। ताजा आंकड़ों और सरकारी दावों के अनुसार, बस्तर का लगभग 96 प्रतिशत क्षेत्र अब नक्सली प्रभाव से मुक्त हो चुका है।
इस बदलाव की जड़ें 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी हैं, जहां से शुरू हुई यह विचारधारा धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों, खासकर बस्तर के घने जंगलों तक फैल गई। वर्षों तक चली इस हिंसा ने हजारों जानें लीं और विकास की रफ्तार को थाम दिया।
हालांकि, हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और सख्त रणनीति के चलते हालात तेजी से बदले हैं। बीते दो वर्षों में करीब 3000 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता अपनाया, जबकि 2000 से अधिक को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा 500 से ज्यादा नक्सली मारे गए, जिनमें संगठन के शीर्ष स्तर के नेता भी शामिल रहे। इस तरह कुल मिलाकर 5000 से अधिक नक्सली नेटवर्क कमजोर पड़ा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब बस्तर संभाग के जिलों में नक्सलियों की संख्या बेहद सीमित रह गई है। दंतेवाड़ा में एक, नारायणपुर में दो, सुकमा में पांच, बीजापुर में 11 और कांकेर में करीब 19 नक्सली सक्रिय बताए जा रहे हैं। यह स्थिति इस लंबे संघर्ष के निर्णायक मोड़ की ओर इशारा करती है।
फिर भी चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। जंगलों में छिपे आईईडी (विस्फोटक) अब भी सुरक्षा बलों के लिए खतरा बने हुए हैं। बीते वर्षों में 1277 आईईडी विस्फोट की घटनाएं सामने आईं, जिनमें सैकड़ों जवान शहीद और घायल हुए। हालांकि अब तक 4580 से अधिक आईईडी बरामद कर निष्क्रिय किए जा चुके हैं।
सरकार का अगला लक्ष्य बस्तर को पूरी तरह ‘आईईडी मुक्त’ बनाना है, ताकि आमजन और सुरक्षा बल दोनों के लिए क्षेत्र सुरक्षित हो सके। इसी दिशा में व्यापक अभियान चलाए जाने की तैयारी है। इस बीच, नक्सलवाद उन्मूलन के मुद्दे पर 30 मार्च को लोकसभा में महत्वपूर्ण चर्चा प्रस्तावित है। इस बहस में अब तक की उपलब्धियों, चुनौतियों और आगे की रणनीति पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
बस्तर, जो कभी भय और हिंसा के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे शांति, विकास और अपनी प्राकृतिक सुंदरता की ओर लौट रहा है। यदि मौजूदा प्रयास इसी गति से जारी रहे, तो आने वाले समय में यह क्षेत्र पूरी तरह नई पहचान के साथ देश के सामने होगा।
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इस बदलाव की जड़ें 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी हैं, जहां से शुरू हुई यह विचारधारा धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों, खासकर बस्तर के घने जंगलों तक फैल गई। वर्षों तक चली इस हिंसा ने हजारों जानें लीं और विकास की रफ्तार को थाम दिया।
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हालांकि, हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और सख्त रणनीति के चलते हालात तेजी से बदले हैं। बीते दो वर्षों में करीब 3000 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता अपनाया, जबकि 2000 से अधिक को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा 500 से ज्यादा नक्सली मारे गए, जिनमें संगठन के शीर्ष स्तर के नेता भी शामिल रहे। इस तरह कुल मिलाकर 5000 से अधिक नक्सली नेटवर्क कमजोर पड़ा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब बस्तर संभाग के जिलों में नक्सलियों की संख्या बेहद सीमित रह गई है। दंतेवाड़ा में एक, नारायणपुर में दो, सुकमा में पांच, बीजापुर में 11 और कांकेर में करीब 19 नक्सली सक्रिय बताए जा रहे हैं। यह स्थिति इस लंबे संघर्ष के निर्णायक मोड़ की ओर इशारा करती है।
फिर भी चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। जंगलों में छिपे आईईडी (विस्फोटक) अब भी सुरक्षा बलों के लिए खतरा बने हुए हैं। बीते वर्षों में 1277 आईईडी विस्फोट की घटनाएं सामने आईं, जिनमें सैकड़ों जवान शहीद और घायल हुए। हालांकि अब तक 4580 से अधिक आईईडी बरामद कर निष्क्रिय किए जा चुके हैं।
सरकार का अगला लक्ष्य बस्तर को पूरी तरह ‘आईईडी मुक्त’ बनाना है, ताकि आमजन और सुरक्षा बल दोनों के लिए क्षेत्र सुरक्षित हो सके। इसी दिशा में व्यापक अभियान चलाए जाने की तैयारी है। इस बीच, नक्सलवाद उन्मूलन के मुद्दे पर 30 मार्च को लोकसभा में महत्वपूर्ण चर्चा प्रस्तावित है। इस बहस में अब तक की उपलब्धियों, चुनौतियों और आगे की रणनीति पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
बस्तर, जो कभी भय और हिंसा के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे शांति, विकास और अपनी प्राकृतिक सुंदरता की ओर लौट रहा है। यदि मौजूदा प्रयास इसी गति से जारी रहे, तो आने वाले समय में यह क्षेत्र पूरी तरह नई पहचान के साथ देश के सामने होगा।