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उठते सवाल: आखिर क्यों बिखरे हैं आप के नेता?
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सार
राघव चड्ढा के आम आदमी पार्टी से अलग होने की चर्चाओं के बीच यह सवाल और भी प्रासंगिक हो गया है। हम अक्सर ऐसे मौकों पर बहुत आसान निष्कर्ष निकाल लेते हैं, कभी इसे अवसरवाद कह देते हैं, कभी संगठन की कमजोरी, और कभी एजेंसियों के डर का हवाला दे देते हैं।
आप से अलग हुए राघव चड्ढा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय राजनीति के हालिया घटनाक्रम को देखते हुए एक बात बार बार मन में आती है कि आखिर लोग किसी नेता के साथ क्यों जुड़ते हैं और कब उससे दूरी बना लेते हैं? राघव चड्ढा के आम आदमी पार्टी से अलग होने की चर्चाओं के बीच यह सवाल और भी प्रासंगिक हो गया है।
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हम अक्सर ऐसे मौकों पर बहुत आसान निष्कर्ष निकाल लेते हैं, कभी इसे अवसरवाद कह देते हैं, कभी संगठन की कमजोरी, और कभी एजेंसियों के डर का हवाला दे देते हैं। लेकिन सच यह है कि राजनीति को इस तरह समझना उसे बहुत संकीर्ण कर देगा। राजनीति दरअसल विश्वास और प्रेरणा की निरंतर प्रक्रिया है।
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2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा 240 सीटों पर आकर रुकी। यह पूर्ण बहुमत से कम था, लेकिन सरकार फिर भी बनी और विपक्ष ने भी अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया। ऐसे में यह उम्मीद की जा रही थी कि अब राजनीतिक आकर्षण बंटेगा, लोग अलग अलग दिशाओं में जाएंगे। पर जो हो रहा है, वह थोड़ा अलग है।
विपक्ष से निकलने वाले लोग किसी दूसरे विपक्षी दल या एनडीए के घटक दल में जाने के बजाय भाजपा की ओर जा रहे हैं। यह केवल आंकड़ों का मामला नहीं है, यह उस भरोसे का संकेत है जो कहीं न कहीं बन रहा है।
युवा नेता होना ही काफी नहीं...
विपक्ष में आज ऊर्जा की कमी नहीं है। राहुल गांधी हैं, अखिलेश यादव हैं, अभिषेक बनर्जी हैं, हेमंत सोरेन हैं, रेवंत रेड्डी हैं, के. कविता हैं, आदित्य ठाकरे हैं, राज ठाकरे हैं, सब अपेक्षाकृत युवा, सक्रिय और अपने अपने क्षेत्र में प्रभावी। फिर भी यदि प्रवाह एक ही दिशा में दिखता है, तो यह मानना पड़ेगा कि केवल युवा होना या पद पर होना पर्याप्त नहीं है। कुछ और है जो लोगों को खींचता है, और वह है प्रेरणा।
यह भी ठीक नहीं है कि हर बदलाव को केवल लाभ हानि के तराजू पर तौल दिया जाए। कपिल मिश्रा लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में अपेक्षित भूमिका से दूर रहे, उसके बाद उन्हें जिम्मेदारी मिली। आर.पी.एन. सिंह जैसे नेताओं को भी तत्काल कोई बड़ी राजनीतिक उछाल नहीं मिली। जयवीर शेरगिल जैसे युवा चेहरे भी बिना किसी त्वरित लाभ के भाजपा में आए। फिर भी इन सबने दिशा बदली।
इसका अर्थ है कि राजनीति में निर्णय केवल तात्कालिक लाभ से संचालित नहीं होते, उसके पीछे एक गहरा भरोसा और एक दृष्टि होती है।
अब बदल गए हैं मूल्य
यहां एक और बात समझनी जरूरी है। आज जो युवा राजनीति में आ रहे हैं, खासकर जो पढ़े लिखे हैं, उनके पास विकल्प हैं। वे चाहें तो अच्छी नौकरी कर सकते हैं, व्यवसाय कर सकते हैं, अपने लिए सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन बना सकते हैं। अगर वे राजनीति में आते हैं, तो इसलिए कि उन्हें लगता है कि यहां वे कुछ सार्थक कर पाएंगे। लेकिन अगर उन्हें बार बार समझौता करना पड़े, अपने मूल्यों से हटना पड़े, तो उनके लिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि फिर राजनीति में रहकर क्या हासिल करना है?
ऐसे लोग बिना ज्यादा शोर किए वापस अपने रास्ते पर लौट जाते हैं। इसलिए शिक्षित और सक्षम युवाओं को साथ बनाए रखना किसी भी नेतृत्व के लिए सबसे कठिन परीक्षा होती है।
यहीं पर नेतृत्व की असली कसौटी सामने आती है। नरेंद्र मोदी की बात इसलिए अलग दिखती है क्योंकि वह लोगों से जुड़ने की एक सहज क्षमता रखते हैं। जब वह किसी लिट्टी चोखा बेचने वाले से बात करते हैं, किसी नाविक से बातचीत करते हैं, या उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर पाने वाली महिला से यह पूछते हैं कि अब उसका जीवन कितना बदला है, तो वह संवाद बनावटी नहीं लगता।
वह सामने वाले के जीवन को समझने की कोशिश करते हैं और उसी स्तर पर बात करते हैं। यही वह क्षण होता है जब दूरी खत्म होती है और भरोसा बनता है।
युवाओं के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है। दिलचस्प बात यह है कि नरेंद्र मोदी न तो युवाओं की तरह बोलते हैं, न उनकी तरह कपड़े पहनते हैं, न उनकी भाषा या अंदाज अपनाते हैं, फिर भी युवा उनके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। शायद इसलिए क्योंकि युवा केवल शैली नहीं, बल्कि स्थिरता और स्पष्टता देखते हैं। उन्हें ऐसे नेता चाहिए जो निर्णय ले सके और उन पर टिक भी सके; जो कठिन समय में डगमगाएं नहीं।
आचरण और निर्णयों से नेतृत्व की पहचान
यही दृढ़ता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में भी दिखती है। साधारण पृष्ठभूमि से आए, बिना पारिवारिक राजनीतिक विरासत के, और फिर भी अपने कार्यों और निर्णयों के कारण युवाओं के बीच एक अलग तरह का विश्वास स्थापित किया है। जनता या नेता को प्रेरित करने के लिए उनके जैसा दिखना या बोलना आवश्यक नहीं है। नेतृत्व अपने आचरण और निर्णयों से पहचाना जाता है।
प्रेरणा केवल एक दल तक सीमित नहीं रही है। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने, तो उनकी युवा ऊर्जा ने एक पूरी पीढ़ी को आकर्षित किया। इंदिरा गांधी ने 1971 में जिस दृढ़ता का परिचय दिया, उसने पूरे देश को, विशेषकर युवाओं को, उनके साथ खड़ा कर दिया। इतिहास बार बार यही बताता है कि जब नेतृत्व भरोसा और दिशा देता है, तो लोग साथ आते हैं।
अरविंद केजरीवाल का उदाहरण भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। उन्होंने एक समय लोगों को यह भरोसा दिलाया कि राजनीति बदली जा सकती है और लोग उनके साथ जुड़ते चले गए। लेकिन प्रेरणा को बनाए रखना पड़ता है। जिस दिन यह कम होने लगती है, उसी दिन लोग दूरी बनाना शुरू कर देते हैं।
इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह उस प्रेरणा को निरंतर जीवित रखे, जो जनता और नेता, दोनों को उसके साथ जोड़े रखे।
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