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विश्व साहित्य का आकाश: पर्ल बक स्त्री के सार्वभौमिक दु:ख-दर्द की लेखिका

Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 28 Apr 2026 06:17 PM IST
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सार

पर्ल सिडेनस्ट्राइकर्स बक को 1938 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। नोबेल के अलावा उन्हें पुलित्जर एवं कई अन्य पुरस्कार मिले। आइए उनकी रचनाओं के बारे में विस्तार से जानते हैं।

history of world literature pearl sydenstricker buck American writer and her books
साहित्य की दुनिया - फोटो : adobe stock
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विस्तार

1892 में वेस्ट वर्जिनिया में जन्मी पर्ल सिडेनस्ट्राइकर्स बक को 1938 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। सात बच्चों में चौथी बच्ची पर्ल के माता-पिता चीन में मिशनरी थे। उनका अधिकांश जीवन चीन में बीता। वे कहतीं थीं, वे चीनी भाषा के मुहावरों में सोचती-बोलती हैं। उन्होंने मातृभाषा से पहले चीनी भाषा सीखी।

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नोबेल के अलावा उन्हें पुलित्जर एवं कई अन्य पुरस्कार मिले। उन्होंने चीन में तीन विश्वविद्यालयों में शिक्षण किया। बचपन से वे लिखने एवं प्रकाशित होने लगी थीं।
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बचपन से लिखने-छपने के बावजूद उनकी प्रसिद्धि 1931 में प्रकाशित ‘गुड अर्थ’ से है। उनकी इस त्रयी के अगले भाग हैं, ‘सन्स’ (1932) तथा ‘ए हाउस डिवाइडेड’ (1935)।

उन्होंने विपुल लेखन किया (‘द यंग रिवोल्यूशनरी’, ‘द मदर’, ‘दि एनिमी’, ‘किनफोक’, ‘दि एक्जाइल’, ‘द पैट्रिओट’, ‘द प्रोमिस’, ‘ईस्ट विन्ड वेस्ट विन्ड’, ‘दिस प्राउड हार्ट’, ‘दि एंग्री वाइफ’, ‘द लॉन्ग लव’ आदि) और मानसिक अपरिपक्व बच्चों केलिए 1949 में ‘वेलकम हाउस’ की स्थापना की।

उनकी अपनी बेटी कैरोल मानसिक रूप से अपरिपक्क थी। कैरोल, पूरा नाम कैरोलाइन ग्रेस बक पीकेयू (फेनिलकेटोनूरिया) से ग्रसित थी।

पर्ल बक की त्रयी चीन के वांग नामक किसान के परिवार की गाथा है। इस पर 1937 में इसी नाम से निर्देशकों (सिडनी फ्रैंक्लिन, विक्टर फ्लेमिंग एवं गुस्ताव मैचटी) ने फिल्म बनाई। फिल्म को दो ऑस्कर मिले। वांग गरीब, अनपढ़ अपने बूढ़े पिता के साथ रहता है, अमीर ह्वान हाउस परिवार की एक गुलाम से शादी करता है। पत्नी ओ लैन कुरूप, मेहनती है, बिना शिकायत ससुराल में जानवरों क तरह काम करती है।

कभी मनुष्य न समझी जाने वाली उर्वर ओ लैन तीन बेटे पैदा करती है, जमीन उर्वर बना ससुराल को समृद्ध करती है। पर सदा पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए ही अजनबी रहते हैं। पति दिन-पर-दिन धनी होता जाता है, जमीन खरीदता जाता है और जिस घर की गुलाम स्त्री को पत्नी बना कर लाया था, उस घर को खरीद लेता है। लेकिन जीवन इतना सरल नहीं होता है।

वांग के खेत पर टिड्डी दल का प्रकोप होता है, खड़ी फसल नष्ट हो जाती है, अकाल में भंडार खाली हो जाता है। अकाल में कोई किसी का नहीं होता है, पड़ोसी वांग का सब कुछ लूट लेते हैं। रुदन से हिलते घर में मिट्टी खाकर जिन्दा रहने की नौबत आ जाती है।

दुर्भिक्ष की क्रूरता में ओ लैन अपनी नवजात बच्ची का गला घोंट कर मार डालती है। याद कीजिए टोनी मरीसन की ‘बिलवड’ की सेथे को, जो गुलामी की क्रूरता से बचाने केलिए अपनी बच्ची को मार डालती है। वांग परिवार जमीन छोड़ कर दक्षिण जा संघर्ष करता है। दक्षिण में भंडार अनाज से भरे पड़े हैं। वांग रिक्शा चलाता है, परिवार के बाकी लोग भीख मांग कर जिन्दा हैं।

समय एक-सा नहीं रहता। शहर में विद्रोह होता है, गरीब अमीरों को लूटते हैं। वांग को सोना मिलता है, ओ लैन भी छिपा कर खूब सारे रत्न ले आई है। इनसे घर-जमीन खरीदी जाती है। वांग के मुंह लालच लग चुकी है, वह नाम और प्रसिद्धि चाहता है। लोटस नामक वैश्या से संबंध बनाता है। लोटस भी एक नम्बर की धूर्त है, इससे खूब रकम ऐंठती है।

अब वांग खूब परेशान रहने लगता है, पत्नी के प्रति किए गए अपराध बोधसे अशांत रहने लगा है। वांग काफी जटिल एवं यथार्थ का मिश्रित चरित्र है। कई विरोधाभास उसमें हैं। पत्नी के प्रति क्रूर वांग बेटों को खूब प्यार करता है, बड़े बेटे को पढ़ाता-लिखाता है, बूढ़े पिता-चाचा और बूढ़े चाचा के बच्चों की देखभाल करता है। खेत पर काम करने वालों के प्रति दयालु है, पड़ोसी चिंग से उसका अच्छा संबंध है।

एक परम्परागत मालिक के सब गुण से लैस चरित्र पर्ल बक ने रचा है। समय के साथ उसका पिता, पत्नी, पड़ौसी मरते हैं। बेटे की जमीन में कोई रूचि नहीं है।

‘गुड अर्थ’- मनुष्य की महागाथा

‘गुड अर्थ’ एक सर्वकालिक, सार्वभौमिक रचना है। मनुष्य की महागाथा। जीवन चक्र ऐसे ही सब काल, सब स्थानों में चलता रहता है। मनुष्य परिस्थिति में फंस कर क्या नहीं करता है। अच्छे कर्म, बुरे कर्म सब करता है। जीवन सपाट नहीं चलता है, उतार-चढ़ाव लगा रहता है। अपराध बोध के बावजूद आदमी दुष्टतापूर्ण गलत, नैतिक-अनैतिक काम करता रहता है। मगर यह उपन्यास एक अन्य कथा साथ लिए चलता है, जो पर्ल बक की आपबीती है।

उपन्यास ‘गुड अर्थ’ में एक अनाम बच्ची है, मानसिक रूप से अविकसित, वांग केलिए दु:ख, करुणा, चिढ़ का कारण। सदा हंसती रहने वाली बालिका पिता से आंख मिलने पर हंसती है, पिता निहाल होता है। वह बच्ची के मुंह से अपने लिए कोई शब्द सुनने की आशा रखता है। वह कभी उसे ‘डा डा’ नहीं पुकारती है। वांग का धैर्य चुकने लगता है, उसकी आशा निराशा में बदलने लगती है। इसके साथ ही वांग का अपनी बच्ची के प्रति नजरिया बदलता जाता है।

बच्ची कुछ बोलने में असमर्थ है। कुछ करने में सक्षम नहीं है। उसे खाना खिलाना होता है, सूरज दिखाना होता है, सर्दी, गर्मी, वर्षा से बचाना होता है। वह पूरी तरह पराश्रित है। सारे समय इस बच्ची की चिंता करनी होती है। नासमझ इतनी कि जब सब रो रहे होते हैं, वह हंसती रहती है। थोड़ी बड़ी होने पर एक ही काम बिना किसी भाव के करती रहती, घंटों एक कपड़े को तहाना- खोलना और फिर ताहना करती रहती है। कोई आए-जाए, मरे-जीए उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।

शुक्र है, अपने माता-पिता को पहचनती है। मगर उनसे भी कोई संवाद नहीं कायम कर पाती है, न  ही वे उससे कोई बात कह-सुन पाते हैं। दिन-पर-दिन वांग का उसके प्रति गुस्सा एवं खीज बढ़ती जाती है। बच्ची के प्रति लाचार वांग तरह-तरह से अपना फ्रस्ट्रेशन निकालता है। शायद पर्ल बक अपने पति का चित्रण कर रही है, मगर बहुत सहानुभूति के साथ।

उनके पति ने अविकसित बच्ची के इलाज पर खर्च करने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। मगर मां पर्ल बक बच्ची को मरने केलिए छोड़ न सकी, उन्होंने पति से तलाक ले लिया। उपन्यास का एक पात्र कहता है, ‘ऐसे लोगों को जीना नहीं चाहिए।’ आलोचक इस बच्ची को बेबस मानवता का प्रतीक मानते हैं।

अमेरिका की पहली स्त्री साहित्यकार और नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली चौथी स्त्री पर्ल बक मात्र ‘गुड अर्थ’ लिखती तो भी स्थाई ख्याति पातीं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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