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जीवन धारा: भीतर का संतुलन ही जीवन का आधार, आत्मनिर्भरता में ही आनंद

आर्थर शोपेनहावर Published by: अमन तिवारी Updated Tue, 28 Apr 2026 07:34 AM IST
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सार
मनुष्य का वास्तविक सुख उसकी सर्वोच्च क्षमताओं के स्वतंत्र और पूर्ण उपयोग में निहित है। जब वह अपनी प्रतिभाओं और शक्तियों को सार्थक दिशा में लगाता है, तब सच्चे संतोष और आनंद का अनुभव करता है।
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true happiness self reliance arthur schopenhauer thought life wisdom inner strength and purpose philosophy
इस संसार में सुख की प्राप्ति सरल नहीं है। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मनुष्य जो कुछ भी श्रेष्ठ बन सकता है या प्राप्त कर सकता है, उसका मूल स्रोत वह स्वयं ही होता है। जितना अधिक वह अपनी प्रसन्नता और संतोष के साधन अपने भीतर खोजता है, उतना ही वह स्थायी रूप से सुखी रह सकता है। इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए अरस्तू ने कहा था कि सच्चा सुख आत्मनिर्भरता में निहित है। बाहरी साधनों से मिलने वाला सुख स्वभावतः अस्थिर, क्षणिक और भाग्य पर निर्भर होता है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी अनुकूल क्यों न हों, वे कभी भी बदल सकती हैं और साथ ही उनसे मिलने वाला सुख भी समाप्त हो सकता है, क्योंकि वे सदैव हमारे नियंत्रण में नहीं रहतीं। इसी कारण विवेकपूर्ण मनुष्य बाहरी आकर्षणों के बजाय अपने भीतर स्थिर आधार खोजने का प्रयास करता है, जिससे उसका संतुलन बना रहता है। जीवन के उत्तरार्ध में यह सत्य और भी स्पष्ट हो जाता है। वृद्धावस्था में प्रेम, आकर्षण, चंचलता, यात्रा की इच्छा और सामाजिक सक्रियता धीरे-धीरे क्षीण हो जाती है। मित्र और संबंधी भी समय के साथ बिछड़ जाते हैं। ऐसे समय में मनुष्य के पास जो सबसे महत्वपूर्ण और स्थायी सहारा बचता है, वह उसका अपना आंतरिक संसार होता है। यही उसकी सच्ची संपत्ति है, जो जीवन के हर चरण में उसके साथ रहती है और उसे वास्तविक संतोष प्रदान करती है।


इस संसार में सुख की प्राप्ति सरल नहीं है। यह दुख, संघर्ष और पीड़ा से भरा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति इन कठिनाइयों से बच भी जाए, तो वह एक अन्य समस्या का सामना करता है-ऊब या बोरियत। यह आंतरिक रिक्तता मनुष्य को बेचैन कर देती है। इसी संदर्भ में अरस्तू का यह गहन विचार महत्वपूर्ण है कि हर प्रकार का सुख किसी न किसी गतिविधि या क्षमता के प्रयोग पर आधारित होता है। बिना सक्रियता के सुख का अस्तित्व संभव नहीं है। मनुष्य का वास्तविक सुख उसकी सर्वोच्च क्षमताओं के स्वतंत्र और पूर्ण उपयोग में निहित है। जब वह अपनी प्रतिभाओं और शक्तियों को सार्थक दिशा में लगाता है, तब वह सच्चे संतोष और आनंद का अनुभव करता है।


प्रकृति ने मनुष्य को जो शक्तियां प्रदान की हैं, उनका उद्देश्य उसे जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष करने योग्य बनाना है। परंतु जब यह संघर्ष समाप्त हो जाता है और मनुष्य के पास कोई चुनौती नहीं रह जाती, तब यही शक्तियां उसके लिए बोझ बन जाती हैं। तब वह केवल समय बिताने या ऊब से बचने के लिए अपने आपको व्यस्त रखने की कोशिश करता है। परिणामस्वरूप, उसे अपने भीतर अर्थ और उद्देश्य खोजना कठिन लगता है। स्पष्ट है कि सच्चा सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भीतर, उसकी सक्रियता, उसकी क्षमताओं और उसकी आत्मनिर्भरता में निहित है।            
- द विजडम ऑफ लाइफ के अनूदित अंश
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