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नाकेबंदी की मार: खाड़ी देशों के लिए सांस की नली है होर्मुज, यह बंद रहा तो सबसे पहले प्रवासियों की जेब कटेगी
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सार
खाड़ी में बैठे बहुत से लोग ईरान को समझौते की सलाह दे रहे हैं। सलाह ऐसे दे रहे हैं, जैसे जंग का बिल सिर्फ ईरान भरेगा और बाकी सब एयरकंडीशन कमरे में बैठकर तमाशा देखेंगे। असली खेल यह है कि होर्मुज बंद हुआ, तो चोट ईरान को लगेगी, लेकिन सांस खाड़ी देशों की अटकेगी और जेब प्रवासी की कटेगी।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
जंग के दूसरे महीने में खाड़ी देशों में रहने वाले कई प्रवासी यह लिख रहे हैं कि ईरान को अब समझौता कर लेना चाहिए। उनका कहना है कि अगर अमेरिका ने ईरान का इंपोर्ट-एक्सपोर्ट बंद कर दिया, तो ईरान कमजोर पड़ जाएगा और आगे चलकर उसके पास झुकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। बात सुनने में बड़ी सीधी लगती है लेकिन यही सबसे बड़ा धोखा है। जंग में सिर्फ मिसाइल नहीं चलती, रास्ते बंद होते हैं, जहाज रुकते हैं, बाजार महंगे होते हैं, नौकरी जाती है और घर की रसोई तक आग पहुंचती है।
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सबसे पहले यह समझिए कि ईरान कोई ऐसा देश नहीं है, जो पहली बार दबाव देख रहा हो। वह बरसों से पाबंदियों में जी रहा है। उसके बैंकों पर पाबंदियां लगीं, तेल पर दबाव डाला गया, जहाजों पर नजर रखी गई, कारोबार पर रोक लगी लेकिन फिर भी वह पूरा खत्म नहीं हुआ। वजह साफ है। ईरान ने मजबूरी में ही सही, लेकिन अपनी कई जरूरतें अपने अंदर पूरी करने का ढांचा बनाया है। चावल जैसी चीजों में उसे बाहर देखना पड़ता है, लेकिन खाने-पीने की बहुत सी चीजें वह खुद पैदा करता है या बनाता है इसलिए यह सोचना कि अमेरिका ने रास्ता रोका और ईरान अगले हफ्ते घुटनों पर आ जाएगा, यह बच्चों जैसी सोच है।
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अब तेल की बात कीजिए। ईरान का तेल पहले ही खुले बाजार में राजा की तरह नहीं बिकता। वह दबाव में बिकता है, छूट पर बिकता है और सबसे बड़ा खरीदार चीन जैसा देश है। अमेरिका चाह कर भी चीन की जरूरतों को पूरी तरह अपने आदेश से नहीं चला सकता। चीन कोई मोहल्ले की दुकान नहीं है कि अमेरिका ने डांटा और उसने माल लेना बंद कर दिया। चीन अपना फायदा देखता है। अगर उसे सस्ता तेल मिल रहा है तो वह सौ बार रास्ता खोजेगा। यही असली बात है जिसे बहुत लोग देखना ही नहीं चाहते।
अब खाड़ी देशों को देखिए। सऊदी, कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन जैसे देश अमीर जरूर हैं, लेकिन अमीरी और मजबूती एक ही चीज नहीं होती। बैंक में पैसा होना अलग बात है और रोज का सामान बंदरगाह तक पहुंचना अलग बात है। आपकी जेब में लाखों रुपये हों, लेकिन शहर में आटा, दाल, दूध और दवा आने का रास्ता बंद हो जाए तो पैसा भी नोटों की गड्डी बनकर पड़ा रह जाता है। होर्मुज इसी फर्क को उजागर करता है।
होर्मुज खाड़ी की सिर्फ समुद्री गली नहीं है। यह खाड़ी देशों की सांस की नली है। इसी रास्ते से तेल निकलता है, गैस जाती है, जहाज चलते हैं, बीमा कंपनियां दाम तय करती हैं और लाखों प्रवासियों की रोजी चलती है। अगर यह रास्ता बंद होता है या खतरे में आता है तो तेल का माल रुकता है, जहाज महंगे होते हैं, बीमा महंगा होता है, सामान देर से आता है और बाजार में कीमतें ऊपर जाती हैं। फिर सबसे पहले कौन पिसता है? कोई शेख नहीं, कोई मंत्री नहीं, कोई बड़ी कंपनी का मालिक नहीं। सबसे पहले मजदूर, ड्राइवर, छोटे कर्मचारी, होटल में काम करने वाले, दुकान पर खड़े लोग और वे प्रवासी पिसते हैं जो महीने की तनख्वाह से घर चलाते हैं।
यही वह बात है, जो खाड़ी में बैठे कई प्रवासी समझ नहीं रहे। वे ईरान को समझौते की सलाह दे रहे हैं, लेकिन अपने पैरों के नीचे की जमीन नहीं देख रहे। अगर खाड़ी की कमाई रुकी तो कंपनियां पहले खर्च काटेंगी। खर्च कटेगा तो बोनस जाएगा, फिर तनख्वाह रुकेगी, फिर नौकरी जाएगी और आखिर में टिकट पकड़ाकर कहा जाएगा कि घर जाओ। संकट में हर देश पहले अपने नागरिकों को बचाता है। बाहर से काम करने आए लोगों की बारी बाद में आती है। यह बात कड़वी है, लेकिन सच है।
यूएई, कुवैत और बहरीन जैसे देशों की बड़ी परेशानी यह है कि खाने-पीने की बहुत सी जरूरतें बाहर से आती हैं। गेहूं, चावल, फल, सब्जी, दूध की चीजें, दालें, मांस और रोजमर्रा का सामान बड़े पैमाने पर बाहर से आता है। सऊदी और कतर कुछ हद तक खुद संभाल सकते हैं, लेकिन वे भी पूरी तरह बेफिक्र नहीं हैं। अब सोचिए, अगर होर्मुज और बाब अल मंदब दोनों रास्तों पर दबाव आ जाए तो क्या होगा? सिर्फ तेल नहीं रुकेगा, रसोई का सामान भी महंगा होगा। सिर्फ गैस नहीं रुकेगी, मजदूर की थाली भी छोटी होगी।
यही असली खेल है। ईरान पर दबाव डालने के लिए होर्मुज को आग के पास लाया जाएगा, लेकिन आग की लपटें सिर्फ ईरान की तरफ नहीं जाएंगी। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था बाहर से आने वाले सामान, बाहर जाने वाले तेल-गैस और बाहर से आए मजदूरों पर टिकी है। यह पूरा ढांचा तब तक चमकदार दिखता है जब तक रास्ते खुले हैं। रास्ते बंद होते ही असली कमजोरी सामने आती है। चमचमाती इमारतें पेट नहीं भरतीं। बंदरगाह भरते हैं। और बंदरगाह डर गए तो शहरों की चमक भी फीकी पड़ने लगती है।
इसलिए ईरान को समझौते की सलाह देना आसान है, लेकिन सवाल यह है कि समझौता किस कीमत पर? अगर समझौते का मतलब यह है कि ईरान अपनी ताकत छोड़ दे और सामने वाला अपना दबाव जारी रखे तो यह समझौता नहीं, झुकना है। हां, अगर समझौते से रास्ते खुलते हैं, पाबंदियां कम होती हैं, तेल-गैस का रास्ता सुरक्षित होता है और आम लोगों पर बोझ कम होता है तो बातचीत सबके लिए बेहतर है, लेकिन कोई भी देश सिर्फ इसलिए नहीं झुकता कि खाड़ी में बैठे कुछ लोग सोशल मीडिया पर सलाह दे रहे हैं।
अब आगे क्या हो सकता है? अगर होर्मुज का तनाव बढ़ा तो खाड़ी देशों में महंगाई बढ़ेगी। खाने-पीने का सामान महंगा होगा। जहाजों का खर्च बढ़ेगा। कंपनियां खर्च काटेंगी। छोटी नौकरियों पर खतरा आएगा। प्रवासी मजदूरों और कर्मचारियों पर सबसे ज्यादा बोझ पड़ेगा। ईरान भी तकलीफ में रहेगा, लेकिन खाड़ी देश भी आराम से नहीं बैठ पाएंगे। असली चोट उन लोगों को लगेगी जिनकी तनख्वाह से घर चलता है और जिनके पीछे पूरा परिवार बैठा होता है।
हमारी सबसे बड़ी गलती यही है कि हम जंग को नक्शे पर देखते हैं, अपनी जेब में नहीं। होर्मुज नक्शे पर एक पतली सी समुद्री लाइन लगती है, लेकिन इसी लाइन पर लाखों घरों की रोटी टिकी है। जो लोग समझ रहे हैं कि ईरान झुकेगा और वे बच जाएंगे, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि इस जंग में अगर रास्ते बंद हुए तो सबसे पहले आम इंसान का रास्ता बंद होगा। निचोड़ यही है कि होर्मुज बंद हुआ, तो ईरान घायल होगा, लेकिन खाड़ी में रहने वाले प्रवासी की रोजी सबसे पहले खून बहाएगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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