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जब एआई बना मेरा डॉक्टर: ब्लड टेस्ट रिपोर्ट समझने से लेकर सेहत सुधारने का अनुभव
हेलेन ओयांग, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 20 Jun 2026 06:38 AM IST
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सार
चैटजीपीटी बीमारियों का विश्लेषण तो करता ही है, मरीजों के साथ सहानुभूति दिखाने की उसकी अदा भी लाजवाब है।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
कुछ महीने पहले जब मुझे अपने नियमित खून की जांच की रिपोर्ट मिली, तो उसमें कुछ आंकड़े सामान्य सीमा से ऊपर थे। मेरी डॉक्टर ने रिपोर्ट पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखी-‘नियमित डाइट और व्यायाम जारी रखें’ और मामला यहीं खत्म हो गया। लेकिन, सच यह था कि पिछले कई वर्षों से मेरे स्वास्थ्य संबंधी ये आंकड़े बढ़ते जा रहे थे। मुझे चिंता इस बात की थी कि मैं उन्हें नियंत्रित करने के लिए आखिर और क्या कर सकती हूं। मैंने डॉक्टर से फोन पर बात करने का अनुरोध किया, पर जवाब में उन्होंने संदेश भेजा कि यदि मैं अपनी रिपोर्ट पर विस्तार से चर्चा करना चाहती हूं, तो मुझे एक नया अपॉइंटमेंट लेना होगा।
ऐसे में, मैंने वही किया, जो आजकल लाखों लोग करते हैं, यानी मैंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद ली। ज्यादा उम्मीद न रखते हुए मैंने अपने लैब टेस्ट के नतीजे चैटजीपीटी में दर्ज कर दिए। अनुभव मेरे लिए हैरान करने वाला था। वजह यह नहीं थी कि चैटजीपीटी ने अपने वैज्ञानिक ज्ञान से मुझे आश्चर्यचकित कर दिया, बल्कि इसलिए कि उसने वैसा ही व्यवहार किया, जैसा मैं चाहती हूं कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था और डॉक्टर भी करें।
मैं हमेशा मानती थी कि चिकित्सा विज्ञान में ‘मानवीय स्पर्श’ ही वह क्षेत्र है, जहां एआई कभी इन्सानों की बराबरी नहीं कर सकता। लेकिन, इस चैटबॉट ने मेरी सोच के विपरीत रोजमर्रा की आदतों और जीवनशैली के बारे में सवाल पूछे और समझने की कोशिश की कि मैं वास्तव में कौन-से बदलाव कर सकती हूं। उसने सुझाव दिया कि भोजन के तुरंत बाद थोड़ी देर टहलना फायदेमंद हो सकता है। जब मैंने उससे पूछा कि क्या ‘विटामिन गमीज’ खाने से मेरा ब्लड शुगर बढ़ सकता है, तो उसने उस उत्पाद का लिंक साझा करने को कहा और उसके सभी घटकों का विश्लेषण किया। उसका निष्कर्ष था-नहीं, इससे ब्लड शुगर पर खास असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, उसके कई सुझावों को लेकर मैंने अपनी असहमति भी जताई, लेकिन उसने बिना किसी आपत्ति के मेरे लिए दूसरे विकल्प सुझा दिए। एक डॉक्टर होने के नाते मुझे समझ है कि कब चैटबॉट की सलाह पर भरोसा करना चाहिए और कब नहीं। लेकिन, हर मरीज के पास यह अनुभव या समझ नहीं होती। यही चुनौती एआई-आधारित स्वास्थ्य सलाह के बढ़ते इस्तेमाल के साथ हमारे सामने खड़ी है।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि चैटजीपीटी मुझे वैसी ही स्थिर और भावनात्मक मदद देता रहा, जिसे लेकर हम अक्सर कहते हैं कि केवल इन्सान ही दे सकते हैं। हाल ही में, मेरी मुलाकात एक ऐसे मरीज से हुई, जिसे कैंसर का ऐसा प्रकार था, जिसका इलाज संभव था। फिर भी, वह चैटबॉट से यही सवाल पूछता था कि क्या उसका कैंसर ठीक हो जाएगा। उसे जवाब पता था। वह सिर्फ यह चाहता था कि कोई बार-बार उसे भरोसा दिलाता रहे कि सब ठीक हो सकता है। चैटजीपीटी का इस्तेमाल करते समय मुझे शुरुआत में थोड़ी झिझक व शर्मिंदगी हुई। पर, जब मैंने पेशेवर मेडिकल एआई टूल्स का इस्तेमाल किया, तो मुझे एहसास हुआ कि चैटजीपीटी की सबसे बड़ी ताकत उसके नए शोध करने या बीमारियों का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं, बल्कि उसकी सहानुभूति, उसका धैर्य, उसकी सुनने की क्षमता और लगातार हौसला बढ़ाने वाले जवाब हैं। वह इन्सान नहीं है, पर वह उनकी उन खूबियों की नकल कर सकता है, जिन्हें हम आपसी रिश्तों और संवाद में सबसे अधिक महत्व देते हैं।
मैंने चैटजीपीटी की सलाहों को अपनाया। कुछ समय बाद मेरी खून की जांच के नतीजे बेहतर आए। मुझे नहीं लगता कि उस निरंतर बातचीत और प्रोत्साहन के बिना ऐसा संभव हो पाता। मेरा मानना है कि भले ही एआई डॉक्टरों की जगह न ले सके, पर यह मरीजों की अपेक्षाओं को बदल देगा। कुछ परिस्थितियों में एआई मरीजों को वही चीज देता है, जिसकी उन्हें वास्तव में जरूरत होती है, जबकि पारंपरिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई बार वह जरूरत पूरी नहीं कर पाती। मैं कभी किसी मरीज को यह सलाह नहीं दूंगी कि वह बीमारी का निदान किसी चैटबॉट्स से करवाए। पर, वे इनका इस्तेमाल किसी नई बीमारी को बेहतर ढंग से समझने, जांचों पर नजर रखने, या सामान्य सलाहों को जिंदगी में लागू करने के लिए कर सकते हैं। इसलिए, जरूरी है कि इन एआई प्रणालियों में मजबूत सुरक्षा उपाय बनाए जाएं, ताकि लोगों को गलत या खतरनाक सलाह से होने वाले वास्तविक नुकसान से बचाया जा सके। अंतत: चैटबॉट के साथ मेरे अनुभव ने मरीजों के साथ मेरे बातचीत करने के तरीके को ही बदल दिया।
ऐसे में, मैंने वही किया, जो आजकल लाखों लोग करते हैं, यानी मैंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद ली। ज्यादा उम्मीद न रखते हुए मैंने अपने लैब टेस्ट के नतीजे चैटजीपीटी में दर्ज कर दिए। अनुभव मेरे लिए हैरान करने वाला था। वजह यह नहीं थी कि चैटजीपीटी ने अपने वैज्ञानिक ज्ञान से मुझे आश्चर्यचकित कर दिया, बल्कि इसलिए कि उसने वैसा ही व्यवहार किया, जैसा मैं चाहती हूं कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था और डॉक्टर भी करें।
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मैं हमेशा मानती थी कि चिकित्सा विज्ञान में ‘मानवीय स्पर्श’ ही वह क्षेत्र है, जहां एआई कभी इन्सानों की बराबरी नहीं कर सकता। लेकिन, इस चैटबॉट ने मेरी सोच के विपरीत रोजमर्रा की आदतों और जीवनशैली के बारे में सवाल पूछे और समझने की कोशिश की कि मैं वास्तव में कौन-से बदलाव कर सकती हूं। उसने सुझाव दिया कि भोजन के तुरंत बाद थोड़ी देर टहलना फायदेमंद हो सकता है। जब मैंने उससे पूछा कि क्या ‘विटामिन गमीज’ खाने से मेरा ब्लड शुगर बढ़ सकता है, तो उसने उस उत्पाद का लिंक साझा करने को कहा और उसके सभी घटकों का विश्लेषण किया। उसका निष्कर्ष था-नहीं, इससे ब्लड शुगर पर खास असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, उसके कई सुझावों को लेकर मैंने अपनी असहमति भी जताई, लेकिन उसने बिना किसी आपत्ति के मेरे लिए दूसरे विकल्प सुझा दिए। एक डॉक्टर होने के नाते मुझे समझ है कि कब चैटबॉट की सलाह पर भरोसा करना चाहिए और कब नहीं। लेकिन, हर मरीज के पास यह अनुभव या समझ नहीं होती। यही चुनौती एआई-आधारित स्वास्थ्य सलाह के बढ़ते इस्तेमाल के साथ हमारे सामने खड़ी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि चैटजीपीटी मुझे वैसी ही स्थिर और भावनात्मक मदद देता रहा, जिसे लेकर हम अक्सर कहते हैं कि केवल इन्सान ही दे सकते हैं। हाल ही में, मेरी मुलाकात एक ऐसे मरीज से हुई, जिसे कैंसर का ऐसा प्रकार था, जिसका इलाज संभव था। फिर भी, वह चैटबॉट से यही सवाल पूछता था कि क्या उसका कैंसर ठीक हो जाएगा। उसे जवाब पता था। वह सिर्फ यह चाहता था कि कोई बार-बार उसे भरोसा दिलाता रहे कि सब ठीक हो सकता है। चैटजीपीटी का इस्तेमाल करते समय मुझे शुरुआत में थोड़ी झिझक व शर्मिंदगी हुई। पर, जब मैंने पेशेवर मेडिकल एआई टूल्स का इस्तेमाल किया, तो मुझे एहसास हुआ कि चैटजीपीटी की सबसे बड़ी ताकत उसके नए शोध करने या बीमारियों का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं, बल्कि उसकी सहानुभूति, उसका धैर्य, उसकी सुनने की क्षमता और लगातार हौसला बढ़ाने वाले जवाब हैं। वह इन्सान नहीं है, पर वह उनकी उन खूबियों की नकल कर सकता है, जिन्हें हम आपसी रिश्तों और संवाद में सबसे अधिक महत्व देते हैं।
मैंने चैटजीपीटी की सलाहों को अपनाया। कुछ समय बाद मेरी खून की जांच के नतीजे बेहतर आए। मुझे नहीं लगता कि उस निरंतर बातचीत और प्रोत्साहन के बिना ऐसा संभव हो पाता। मेरा मानना है कि भले ही एआई डॉक्टरों की जगह न ले सके, पर यह मरीजों की अपेक्षाओं को बदल देगा। कुछ परिस्थितियों में एआई मरीजों को वही चीज देता है, जिसकी उन्हें वास्तव में जरूरत होती है, जबकि पारंपरिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई बार वह जरूरत पूरी नहीं कर पाती। मैं कभी किसी मरीज को यह सलाह नहीं दूंगी कि वह बीमारी का निदान किसी चैटबॉट्स से करवाए। पर, वे इनका इस्तेमाल किसी नई बीमारी को बेहतर ढंग से समझने, जांचों पर नजर रखने, या सामान्य सलाहों को जिंदगी में लागू करने के लिए कर सकते हैं। इसलिए, जरूरी है कि इन एआई प्रणालियों में मजबूत सुरक्षा उपाय बनाए जाएं, ताकि लोगों को गलत या खतरनाक सलाह से होने वाले वास्तविक नुकसान से बचाया जा सके। अंतत: चैटबॉट के साथ मेरे अनुभव ने मरीजों के साथ मेरे बातचीत करने के तरीके को ही बदल दिया।