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ट्रेन में सीट, गुस्सा और मौत: आखिर हम इतने अधीर क्यों हो गए हैं?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 22 Jun 2026 08:17 AM IST
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सार

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर पहुंचने से पहले ही यात्री दरवाजों पर जमा हो जाते हैं। अंदर बैठे लोग अपनी सीट बचाने में लगे रहते हैं। बाहर खड़े लोग किसी तरह भीतर पहुंचने की कोशिश में रहते हैं। ऐसे माहौल में तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।

Train seats anger and death: Why have we become so impatient
भारतीय ट्रेन (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : AdobeStock
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विस्तार

दिल्ली के शाहदरा रेलवे स्टेशन पर योगा एक्सप्रेस की जनरल बोगी में चढ़ने को लेकर हुए विवाद में सिक्योरिटी गार्ड पंकज धामा की पीट-पीटकर हत्या की खबर केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, यह उस समाज का आईना है, जो तेजी से आगे तो बढ़ रहा है, लेकिन भीतर से कहीं अधिक बेचैन, अधीर और आक्रामक होता जा रहा है।



सवाल यह नहीं है कि एक व्यक्ति की हत्या क्यों हुई? असली सवाल यह है कि आखिर एक सीट, एक धक्का या एक छोटी-सी कहासुनी किसी की जान लेने तक कैसे पहुंच जाती है?
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भारत में रेल केवल परिवहन का साधन नहीं है। यह करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। नौकरी, पढ़ाई, व्यापार और परिवार से जुड़े कामों के लिए लाखों लोग हर दिन रेल यात्रा करते हैं, लेकिन जनरल डिब्बों की स्थिति अक्सर ऐसी होती है, जहां यात्रा नहीं, बल्कि जगह बनाने की जद्दोजहद चल रही होती है।
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ट्रेन प्लेटफॉर्म पर पहुंचने से पहले ही यात्री दरवाजों पर जमा हो जाते हैं। अंदर बैठे लोग अपनी सीट बचाने में लगे रहते हैं। बाहर खड़े लोग किसी तरह भीतर पहुंचने की कोशिश में रहते हैं। ऐसे माहौल में तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।

लेकिन, केवल भीड़ ही हिंसा का कारण नहीं है। भीड़ तो दशकों से रही है। पहले भी ट्रेनों में धक्का-मुक्की होती थी, सीटों को लेकर बहस होती थी। अधिकांश विवाद कुछ देर बाद खत्म हो जाते थे। आज स्थिति बदल गई है। लोगों के भीतर गुस्सा पहले से कहीं अधिक जमा है।

महंगाई, रोजगार की चिंता, पारिवारिक दबाव, सामाजिक प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अनिश्चितता ने व्यक्ति को मानसिक रूप से थका दिया है। ऐसे में एक छोटी-सी घटना भी उस दबे हुए तनाव को विस्फोट में बदल देती है।

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि लगातार तनाव में रहने वाला व्यक्ति छोटी असुविधा को भी व्यक्तिगत अपमान की तरह लेने लगता है। उसे लगता है कि हर कोई उसका हक छीनने की कोशिश कर रहा है। ट्रेन में सीट का विवाद फिर केवल सीट का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि सम्मान, अधिकार और वर्चस्व की लड़ाई बन जाता है। यही कारण है कि सामान्य झगड़े भी कई बार हिंसक रूप ले लेते हैं।

इस समस्या का एक दूसरा पहलू भी है, भीड़ की मानसिकता। जब कोई विवाद सार्वजनिक स्थान पर शुरू होता है तो अक्सर लोग समझने के बजाय पक्ष चुनने लगते हैं। कुछ लोग तमाशबीन बनते हैं, कुछ उकसाने लगते हैं और कुछ बिना पूरी जानकारी के हाथ उठाने लगते हैं।

भीड़ में व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी भूल जाता है। उसे लगता है कि इतने लोगों के बीच उसकी पहचान नहीं होगी और यही सोच कई बार सामूहिक हिंसा को जन्म देती है।

यह भी विचारणीय है कि देश में रेलवे का विस्तार हुआ है, नई ट्रेनें चली हैं, स्टेशनों का आधुनिकीकरण हुआ है, फिर भी सीटों का संकट क्यों बना हुआ है? इसका उत्तर भारत की विशाल आबादी और तेजी से बढ़ती यात्रा आवश्यकताओं में छिपा है। रोजगार और शिक्षा के अवसर कुछ चुनिंदा शहरों में केंद्रित हैं।

लाखों लोग रोजाना या नियमित रूप से लंबी दूरी की यात्रा करने को मजबूर हैं। यात्री संख्या जिस गति से बढ़ रही है, सुविधाएं कई बार उससे पीछे रह जाती हैं। परिणामस्वरूप जनरल डिब्बों में दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

सरकार के स्तर पर इस समस्या का समाधान केवल नई ट्रेनें चलाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। भीड़भाड़ वाले मार्गों पर अधिक जनरल कोच लगाए जाने चाहिए, अनारक्षित यात्रियों के लिए अतिरिक्त सेवाएं शुरू की जानी चाहिए और संवेदनशील स्टेशनों पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए।

रेलवे सुरक्षा बल और जीआरपी की प्रभावी मौजूदगी कई विवादों को शुरुआती स्तर पर ही रोक सकती है। हिंसा के मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई का संदेश भी समाज तक पहुंचना चाहिए।

हालांकि, केवल सरकार सब कुछ नहीं कर सकती। यह समस्या समाज के व्यवहार से भी जुड़ी हुई है। हमें स्वीकार करना होगा कि हम धीरे-धीरे संवाद की संस्कृति खोते जा रहे हैं। असहमति को दुश्मनी और बहस को युद्ध समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सार्वजनिक जीवन में धैर्य, सहनशीलता और दूसरे के अधिकारों के प्रति सम्मान जैसे मूल्य कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

स्कूलों, परिवारों और सामाजिक संस्थाओं को केवल सफलता का पाठ नहीं पढ़ाना चाहिए, बल्कि संयम, सहिष्णुता और भावनात्मक नियंत्रण भी सिखाना चाहिए। समाज तब मजबूत बनता है, जब उसके नागरिक अपने गुस्से पर नियंत्रण रखना सीखते हैं। कानून अपराध को सजा दे सकता है, लेकिन समाज ही ऐसे संस्कार दे सकता है जो अपराध होने से रोकें।

पंकज धामा की मौत हमें एक असहज सवाल पूछने के लिए मजबूर करती है, क्या हम सुविधाओं की कमी से ज्यादा धैर्य की कमी का सामना कर रहे हैं? यदि एक सीट के लिए शुरू हुआ विवाद किसी की जान ले सकता है तो समस्या केवल रेलवे की नहीं, हमारे सामाजिक व्यवहार की भी है। विकास केवल नई रेल लाइनों, स्टेशनों और ट्रेनों से नहीं मापा जाएगा।

उसकी असली कसौटी यह होगी कि भीड़ में खड़े दो अजनबी किसी विवाद की स्थिति में एक-दूसरे पर हाथ उठाते हैं या बातचीत का रास्ता चुनते हैं। एक सभ्य समाज की पहचान उसकी गति से नहीं, उसके संयम से होती है। आज शायद हमें उसी संयम को फिर से खोजने की जरूरत है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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