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प्रशांत महासागर की गर्म होती लहरें और हिमालय पर मंडराता खतरा
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सार
एल नीनो की विपरीत स्थिति को ला नीना कहा जाता है। इसमें प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है और व्यापारिक पवनें अधिक मजबूत हो जाती हैं। परिणामस्वरूप गर्म जल पश्चिमी प्रशांत में और अधिक एकत्रित होता है तथा भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।
हिमालय
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में कभी-कभी ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों और क्षेत्रों पर भी पड़ता है। दक्षिण अमेरिका के तट से लगे प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाला एक ऐसा ही परिवर्तन है—एल नीनो। इस समय विश्व के प्रमुख मौसम एवं जलवायु संस्थानों के वैज्ञानिकों की निगाहें प्रशांत महासागर पर टिकी हुई हैं।
नवीनतम आकलनों से संकेत मिल रहे हैं कि पृथ्वी एक बार फिर एल नीनो की स्थिति में प्रवेश कर रही है और इसके वर्ष के उत्तरार्द्ध में अत्यधिक शक्तिशाली रूप धारण करने की संभावना है। यदि ऐसा हुआ तो यह 1950 के बाद के सबसे प्रभावशाली एल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के मानसून, कृषि, जल संसाधनों और हिमालयी पारिस्थितिकी पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
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क्या है एल नीनो और कैसे बदल देता है मौसम का मिजाज?
सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली व्यापारिक पवनें समुद्र के गर्म जल को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अधिक वर्षा होती है और पूर्वी प्रशांत के तटों के पास अपेक्षाकृत ठंडा जल ऊपर आता रहता है।
किंतु जब ये पवनें कमजोर पड़ जाती हैं तो गर्म जल पूर्वी और मध्य प्रशांत में फैलने लगता है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य सेअधिक हो जाता है और यही स्थिति एल नीनो कहलाती है। समुद्र के तापमान में यह परिवर्तन केवल स्थानीय घटना नहीं है।
इसके कारण वायुमंडलीय परिसंचरण बदल जाता है, बादलों और वर्षा के क्षेत्रों का स्थानांतरण होता है तथा दुनिया के अनेक भागों में सूखा, बाढ़, गर्मी और तूफानों के स्वरूप में परिवर्तन देखने को मिलता है। यही कारण है कि एल नीनो को पृथ्वी की सबसे प्रभावशाली प्राकृतिक जलवायु घटनाओं में गिना जाता है।
एल नीनो का दूसरा चेहरा है ला नीना
एल नीनो की विपरीत स्थिति को ला नीना कहा जाता है। इसमें प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है और व्यापारिक पवनें अधिक मजबूत हो जाती हैं। परिणामस्वरूप गर्म जल पश्चिमी प्रशांत में और अधिक एकत्रित होता है तथा भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।
भारत के लिए ला नीना सामान्यतः अनुकूल मानी जाती है क्योंकि इसके दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून को अतिरिक्त ऊर्जा और नमी मिलती है। पिछले वर्षों में देश ने जिन अपेक्षाकृत अच्छे मानसूनों का अनुभव किया, उनमें ला नीना की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। हालांकि अत्यधिक शक्तिशाली ला नीना कभी-कभी बाढ़ और भूस्खलन जैसी समस्याएं भी बढ़ा सकती है।
भारत के मानसून पर क्यों रहती है विशेष नजर
भारत की लगभग आधी कृषि वर्षा पर निर्भर है। करोड़ों किसानों की आजीविका, जलाशयों का भराव, पेयजल आपूर्ति और विद्युत उत्पादन मानसून से जुड़े हुए हैं। इसलिए जब भी एल नीनो की संभावना बनती है तो देश में चिंता बढ़ जाती है। इतिहास बताता है कि भारत में पड़े कई प्रमुख सूखों का संबंध एल नीनो से रहा है।
हालांकि, यह भी सच है कि हर एल नीनो कमजोर मानसून नहीं लाता और हर कमजोर मानसून के पीछे केवल एल नीनो ही जिम्मेदार नहीं होता। भारतीय महासागर की स्थिति, अरब सागर का तापमान, हिमालयी बर्फ और अन्य अनेक कारक भी मानसून को प्रभावित करते हैं। फिर भी शक्तिशाली एल नीनो के दौरान मानसून के कमजोर पड़ने की आशंका सामान्य से अधिक रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान एल नीनो अत्यधिक शक्तिशाली रूप लेता है तो वर्षा का वितरण असमान हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा और कुछ क्षेत्रों में अचानक अत्यधिक वर्षा देखने को मिल सकती है। इससे कृषि योजना और जल प्रबंधन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
बढ़ सकती है भीषण गर्मी की मार
एल नीनो का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव तापमान पर पड़ता है। जब प्रशांत महासागर का विशाल क्षेत्र सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो उसकी अतिरिक्त ऊष्मा वायुमंडल में पहुंचती है। इससे वैश्विक औसत तापमान बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि शक्तिशाली एल नीनो विकसित होता है तो विश्व के अनेक हिस्सों में गर्मी के नए कीर्तिमान बन सकते हैं।
भारत में भी लंबे और तीव्र लू के दौर देखने को मिल सकते हैं। मैदानी क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना होगी। इससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ेंगे, बिजली की मांग बढ़ेगी और जल स्रोतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन और फसलों पर भी इसका असर दिखाई दे सकता है।
हिमालय के लिए क्यों है विशेष चिंता
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों के लिए एल नीनो का प्रभाव विशेष महत्व रखता है। पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम पहले ही तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, हिमनद झीलों का आकार बढ़ रहा है और भूस्खलनों की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
एल नीनो के दौरान हिमालयी क्षेत्र में वर्षा का स्वरूप अधिक अनिश्चित हो सकता है। कुल वर्षा सामान्य से कम हो सकती है, लेकिन जब वर्षा होगी तो वह कम समय में अत्यधिक मात्रा में हो सकती है। ऐसी स्थिति बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं को जन्म दे सकती है।
उत्तराखंड में पिछले वर्षों में केदारनाथ, ऋषिगंगा, चमोली और विभिन्न घाटियों में आई आपदाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्वतीय क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील हो चुके हैं। यदि एल नीनो के कारण मौसम की चरम घटनाओं में वृद्धि होती है तो जोखिम और बढ़ सकता है।
इसके अलावा ऊंचे हिमालय में बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के पिघलने की गति को भी प्रभावित कर सकता है। इससे हिमनदीय झीलों के विस्तार और उनके फटने की आशंका बढ़ सकती है। वैज्ञानिक पहले ही हिमालय को विश्व का तीसरा ध्रुव कहकर उसकी संवेदनशीलता पर चेतावनी दे चुके हैं।
जलवायु परिवर्तन और एल नीनो का खतरनाक मेल
वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो स्वयं कोई नई घटना नहीं है। यह हजारों वर्षों से पृथ्वी की प्राकृतिक जलवायु प्रणाली का हिस्सा रहा है। लेकिन वर्तमान चिंता का कारण यह है कि अब पृथ्वी पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्म हो चुकी है। औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव गतिविधियों द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों ने वैश्विक तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि कर दी है।
ऐसी स्थिति में जब एल नीनो जैसी प्राकृतिक गर्म घटना सक्रिय होती है तो उसके प्रभाव और अधिक तीव्र हो सकते हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने रिकॉर्ड गर्मी, जंगलों की आग, समुद्री तापमान में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं का अनुभव किया है।
सतर्कता और तैयारी की जरूरत
एल नीनो के संभावित प्रभावों को देखते हुए भारत को जल प्रबंधन, कृषि योजना, आपदा तैयारी और मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। किसानों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना, जल संरक्षण को बढ़ावा देना तथा हिमालयी क्षेत्रों में संवेदनशील स्थानों की निगरानी बढ़ाना समय की मांग है।
प्रशांत महासागर में उठ रही गर्म लहरें भले ही भारत से हजारों किलोमीटर दूर हों, लेकिन उनका प्रभाव देश के खेतों, नदियों, पहाड़ों और शहरों तक पहुंच सकता है।
इसलिए एल नीनो केवल एक समुद्री घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी वैश्विक जलवायु चुनौती है जो हमें यह याद दिलाती है कि पृथ्वी की प्राकृतिक प्रणालियां एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। आने वाले महीनों में वैज्ञानिकों की निगाहें प्रशांत महासागर पर बनी रहेंगी, क्योंकि वहां होने वाले बदलाव भारत सहित पूरी दुनिया के मौसम और भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।