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Assam Vidhan Sabha Election 2026: असम चुनाव में किसका साथ देंगे चाय बागान मजदूर
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सार
पूर्वी और उत्तरी असम के नौ जिलों में फैले इन चाय बागानों के करीब 35 लाख मजदूर राज्य की 126 में से 35 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं। यही वजह है कि बीजेपी सरकार ने चुनाव से पहले अचानक मजदूरों के प्रति हमदर्दी दिखाने लगी है।
असम के चाय बागान मजदूर। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
असम में नौ अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में चाय बागान मजदूर किसका साथ देंगे? मतदान से ठीक पहले राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है। इसकी वजह यह है कि कम से कम 35 सीटों पर इनके वोट निर्णायक हैं। सत्ता की ओर जाने का रास्ता इन बागानों से होकर ही गुजरता है।
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बागान मजदूरों की अहमियत को ध्यान में रखते हुए सत्ता के दोनों दावेदार यानी भाजपा और कांग्रेस इनको अपने पाले में खींचने के लिए लुभावने वादे करने में जुटी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने पिछले असम दौरे के दौरान मजदूरों के साथ मिल कर पत्तियां तोड़ी थी और उनका पारंपरिक आदिवासी नृत्य देखा था।
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उनके अलावा कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी चाय बागानों का दौरा कर चुके हैं। इससे इन मजदूरों की अहमियत समझ में आती है।
लेकिन आखिर यह मजदूर क्या सोच रहे हैं। राज्य की भाजपा सरकार ने चाय बागान मजदूरों के लिए कई योजनाएं शुरू करने और उनको जमीन का पट्टा देने का दावा किया है। लेकिन कई मजदूर अपना घर नहीं होने से हताश है।
उनको राज्य सरकार की अरुणोदय योजना के तहत मासिक सहायता भी नहीं मिल रही है। असम चाय निगम के तहत चलने वाले सिनामारा चाय बागान की एक मजदूर सुमित्रा ओरांव बताती है कि उनको अरुणोदय योजना के तहत पैसे नहीं मिल रहे हैं। इलाके में पीने के पानी की दिक्कत तो है ही, कच्चे मकान में रहना भी उनकी मजबूरी है।
हालांकि, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कई मजदूरों को मकान मिले हैं। लेकिन अब तक सबको यह नहीं मिल सका है।
पूर्वी और उत्तरी असम के नौ जिलों में फैले इन चाय बागानों के करीब 35 लाख मजदूर राज्य की 126 में से 35 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं। यही वजह है कि बीजेपी सरकार ने चुनाव से पहले अचानक मजदूरों के प्रति हमदर्दी दिखाने लगी है।
सरकार ने बागान मजदूरों को पांच-पांच हजार की वित्तीय मदद मुहैया कराने के साथ ही उनकी दैनिक मजदूरी भी 30 रुपए बढ़ा दी है। अब ब्रह्मपुत्र घाटी के बागानों में यह रकम 280 रुपए प्रति दिन हो गई है। इस बार बीजेपी ने अगले पांच साल में इस रकम को बढ़ा कर पांच सौ करने का वादा किया है।
लेकिन मजदूरों में अब भी इस बात की नाराजगी है कि पार्टी ने वर्ष 2014 के चुनाव से पहले किया गया अपना एक वादा अब तक पूरा नहीं किया है। वह है इन मजदूरों को अनुसूचित जनजाति के दर्जे का। पार्टी लगभग हर चुनाव में यह वादा करती रही है।
हालांकि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि कांग्रेस ने छह दशक में बागान मजदूरों के लिए जितना काम नहीं किया उतना बीजेपी सरकार ने दस साल में कर दिया है। उनका आरोप है कि कांग्रेस महज वोट बैंक के तौर पर इनका इस्तेमाल करती रही है।मुख्यमंत्री का दावा है कि सरकार इन मजदूरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए केंद्र सरकार से गंभीरता से बातचीत कर रही है।
लेकिन मजदूरों का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद ही आदिवासी के तौर पर उनका वजूद सुरक्षित हो सकता है। उनका सवाल है कि आखिर सरकार को इसमें 12 साल से ज्यादा का समय क्यों लग रहा है जबकि केंद्र में बीजेपी की ही सरकार है?
असम में डिब्रूगढ़ से जोरहाट तक साढ़े आठ सौ से ज्यादा चाट बागान हैं। वर्ष 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव में इस इलाके की ज्यादातर सीटों पर भाजपा उम्मीदवार ही विजयी रहे थे।
प्रधानमंत्री ने इस महीने की पहली तारीख को डिब्रूगढ़ के पास मनोहारी चाय बागान का दौरा कर पत्तियां चुनी और मजदूरों से बातचीत की। उसके कुछ देर बाद ही प्रियंका गांधी ने भी नाजिरा में एक चाय बागान में रैली को संबोधित किया। दो अप्रैल को राहुल गांधी और गौरव गोगोई भी टीटाबोर में एक चाय बागान में रैली कर चुके हैं।
भाजपा इन इलाकों में बीते एक दशक में शुरू की गई अपने कल्याण योजनाओं का प्रमुखता से प्रचार कर रही है। उसका दावा है कि इन योजनाओं के कारण बागान मजदूरों का जीवन स्तर पहले के मुकाबले बेहतर हुआ है।
लेकिन कांग्रेस का दावा है कि इन योजनाओं से जमीनी स्तर पर तस्वीर नहीं बदली है। बागान मजदूर अब भी तमाम समस्याओं से जूझ रहे हैं। पार्टी ने अपने घोषणापत्र में बागान मजदूरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और नई योजनाओं के साथ इस उद्योग की बेहतरी की दिशा में ठोस कदम उठाने का वादा किया है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि अतिक्रमण हटाओ अभियान और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की वजह से इस बार निचले और मध्य असम में मुस्लिम वोटरों के कांग्रेस के पक्ष में मतदान की संभावना को ध्यान में रखते हुए पार्टी चाय बागानों पर खास ध्यान दे रही है।
दूसरी ओर, कांग्रेस का सवाल है कि आखिर बीजेपी बागान मजदूरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने का अपना वादा क्यों नहीं पूरा कर सकी है? पार्टी के नेता गौरव गोगोई का आरोप है कि चाय बागानों में पीने के पानी के साथ ही स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है। भाजपा सरकार के कार्यकाल में कई बागान बंद हो गए हैं और वहां रहने वाली महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मजदूरों की अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग पुरानी है। 2016 तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया था। इसके कारण इस बार मजदूरों को उसके पक्ष में झुकने की संभावना कम ही है।
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