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विधानसभा चुनाव: निर्णायक साबित हो सकती है महिलाओं को नकद रेवड़ी

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Mon, 06 Apr 2026 05:00 PM IST
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सार

जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें केन्द्र शासित राज्य पुदुच्चेरी को छोड़ दें तो बाकी चार में नकदी रेवड़ी के इर्द-गिर्द ही राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र और चुनावी व्यूहरचना दिखाई देती है। 

assembly elections 2026 manifesto promises cash for women by many parties
महिलाओं के वोट बैंक पर सबकी नजर - फोटो : ANI
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विस्तार

देश के पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में से तीन पुदुच्चेरी, असम और केरल विस के लिए 9 अप्रैल को मतदान होने जा रहा है। ऐसे में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि कौन-सा मुद्दा मतदाता को प्रभावित करेगा? कौन-सा फैक्टर गेमचेंजर हो सकता है? ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है तो सत्ता परिवर्तन अथवा सत्ता में वापसी करा सकती है? गहराई से देखें तो बाकी मुद्दे एक तरफ नकदी रेवड़ी एक तरफ। 

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हाल के कुछ वर्षों में सत्तारूढ़ दलों के हाथ यह ऐसा नुस्खा हाथ लग गया है, जिसके चलते राज्यों में किसी भी सत्तासीन पार्टी को उखाड़ फेंकना विपक्षी दलों के लिए टेढ़ी खीर होता जा रहा है। इस रेवड़ी कल्चर की डिजाइन भी उन महिलाओं को ध्यान में रख कर की गई हैं, जिनकी संख्या कुल वोटरों का करीब आधी है और जिनका समर्थन किसी भी पार्टी को सत्ता में लौटा या सत्ता से हटा सकता है।
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इसी दशक की बात करें तो इसकी शुरूआत सबसे पहले ममता बैनर्जी ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में 2021 में ‘लक्ष्मीर भंडार’ नामक योजना से की थी, जिसके तहत हर महिला को 500 रु. प्रति माह दिए जाते थे। 

पश्चिम बंगाल और महिला वोटर

इसके बाद बंगाल की महिलाएं मोटे तौर ममता दीदी के साथ ही खड़ी रही हैं। हर चुनाव में इस राशि में 500 रु. की वृद्धि की जाती है। अब यह 1500 रु. है और  इसमें भी एससी/एसटी  को 1700 रू. हर माह मिलते हैं। इसका लाभ राज्य की करीब ढाई करोड़ महिला वोटरों को मिल रहा है। इस नकद रेवड़ी की चुनावी ताकत को भांप कर मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने सत्ता में आने पर इसकी राशि 3 हजार रू. प्रति माह करने का चुनावी वादा किया है। इसका राज्य की महिलाओं पर कितना असर होगा, यह तो नतीजों से पता चलेगा। 

इस शर्तिया नुस्खे की शुरूआत तो ममता दीदी ने की थी, लेकिन 2023 में मध्यप्रदेश में मामा शिवराज ने इसे एक व्यवस्थित रूप दिया। इसके चलते मप्र में भाजपा भारी बहुमत से पांचवी बार सत्ता में लौटी तो अन्य राज्यों की सरकारों ने भी इस नकदी नुस्खे को अपनी गांठ में बांध लिया। यानी 2021 से अब तक देश में कुल 15 राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें 6 राज्यों में सत्तारूढ़ दल सत्ता में लौटे। फर्क ऐसी योजना के नामों और राशि जरूर रहा है।

लेकिन भुगतान का तरीका वही सीधे खातों में ऑनलाइन भेजने का है। गरीब और निम्न वर्ग की महिलाओंके लिए छोटी-सी लगने वाली यह रकम भी बहुत मायने रखती है। उनके वोट की प्राथमिकता तय करने में इस रकम का निर्णायक रोल होता है। 

इसके आगे विचारधारा, अन्य सुख-सुविधाएं और विकास आदि की बाते गौण हैं। हाथ खर्च के लिए बिना किसी मेहनत के मिलने वाले दो पैसे भी भगवान मिलने जैसे हैं। पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनावों में केवल आंध्र प्रदेश और दिल्ली प्रदेश के विस चुनावों को अपवाद जहां, महिलाओंको नकदी बांटने का फार्मूला  सत्तारूढ़ दल को चुनाव नहीं जितवा पाया। वहां राज कर रही पार्टी के बाकी शायद पाप नकदी खैरात पर भारी पड़े।

ये राज्य हैं-आंध्र प्रदेश, जहां 2020 में सत्ता में आई वायएसआर कांग्रेस ने महिलाओं को वायएसआर चेयुथा नामक योजना के तहत एकमुश्त 18 हजार 759 रूपए देना शुरू किया था, लेकिन 2024 का विधानसभा चुनाव वो बुरी तरह हारे। ऐसा लगता है कि मासिक नकदी महिलाओं को ज्यादा फायदेमंद लगती है, बजाए कोई धंधा करने के लिए दी गई एक मुश्त रकम के।

दिल्ली में महिलाओं के लिए योजना

इसी तरह दिल्ली में दो बार से विधानसभा चुनाव जीत रही आम आदमी पार्टी तीसरी बार सत्ता में नहीं लौट सकी, क्योंकि उसने दिल्ली की महिलाओं को ‘महिला समृद्धि योजना’ के तहत प्रतिमाह 2500 रू. देने का वादा तो किया, लेकिन देना शुरू नहीं किया। हालांकि दे तो अब वहां की बीजेपी सरकार भी नहीं रही है। लिहाजा अगला चुनाव उसके लिए भी कठिन साबित हो सकता है।

मप्र में मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना के तहत पात्र महिलाओं को प्रतिमाह 1250 रू, तेलंगाना में महालक्ष्मी योजना के अंतर्गत 2500 रू, महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना में 1500 रू, कर्नाटक में गृहलक्ष्मी योजना के तहत 2000 रू, बिहार में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत एक मुश्त 10 हजार रू, तमिलनाडु में कलैनार मगालिर उरिमई थोगई ( महिला अधिकार अनुदान) के तहत 1 हजार रू., झारखंड में सीएम मइया योजना में 2500 रू, ओडिशा में सुभद्रा योजना 833 रू., छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के तहत 1 हजार रू. असम  में अरूणोदय योजना के अंतर्गत  1250 रू. हरियाणा में लाडो लक्ष्मी योजना के अंतर्गत 2100 रू तथा हिमाचल प्रदेश में इंदिरा गांधी प्यारी बहना योजना में 1500 रू. प्रति माह महिलाओं को दिए जा रहे हैं। 

केरल में सीधे तौर पर नकदी देने की योजना नहीं है, लेकिन वहां कम्युनिस्टों ने तीन दशक पहले कुटुंबश्री योजना शुरू की थी, जिसकी आज 46 लाख से ज्यादा लाभार्थी दीदियां हैं। योजना के तहत सरकार महिलाओं को छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता देती है। ये वाम दलों की ताकत हैं।

इसी तरह पुदुच्चेरी में होने वाले चुनाव में भी नकदी रेवड़ी की चर्चा नहीं है। लेकिन महिलाओं को सीधे नकदी के दम पर महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, मप्र, झारखंड, असम, और हरियाणा में सरकारें तमाम एंटी इनकम्बेंसी को मात देकर सत्ता में लौटी हैं और तेलंगाना,कर्नाटक, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और हिमाचल की सरकारें इसे आगामी विस चुनावों में आजमाएंगी।

इसका अर्थ यह नहीं कि सत्तारूढ़ दलों की सरकार में वापसी का यही एक कारण है, लेकिन यह महत्वपूर्ण कारण जरूर है। जैसे-जैसे महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इस योजना का राजनीतिक फलित भी सुखकर साबित हो रहा है।

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चुनाव में महिला वोटरों पर नजर - फोटो : ANI

नकदी रेवड़ी के इर्दगिर्द की राजनीति

जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें केन्द्र शासित राज्य पुदुच्चेरी को छोड़ दें तो बाकी चार में नकदी रेवड़ी के इर्दगिर्द ही राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र और चुनावी व्यूहरचना दिखाई देती है। मसलन केरल में वाम दलों के गठबंधन एलडीएफ ने महिलाओंको सीधे नकदी का तो कोई वादा नहीं किया है, लेकिन मुख्य विपक्षी कांग्रेस नीत यूडीएफ ने इंदिरा गारंटी के तहत महिलाओं तो 3000 रू पेशंन तथा फ्री बस पास की पेशकश की है। वहीं भाजपानीत एनडीए भी 3 हजार रू. पेंशन देने की वकालत कर रहा है। मतदाता किस पर भरोसा करेगा, यह नतीजे बताएंगे। 

इसी तरह असम में महिलाओं को नकदी देने की अरूणोदय योजना पहले से लागू है। लेकिन वहां विपक्षी कांग्रेस ने महिलाओं को कारोबार के लिए साल में 50 हजार रुपये देने और हर परिवार को 25 लाख रुपये का कैशलेस हेल्थ कवर देने के वादा किया है। साथ ही कांग्रेस ने राज्य के 6 समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने का वादा किया है। यही बात अब सत्तासीन भाजपा भी कह रही है।

तमिलनाडु में वर्तमान डीएमके सरकार मघालिर उरिमई थोगई योजना के तहत हर माह 1 हजार रू. दे रही है और सत्ता में वापसी पर इसे बढ़ाकर 2 हजार रू. करने का वादा है। ऐसा ही वादा विपक्षी एआईएडीएमके ने भी किया है। साथ में वह महिलाओं को व्यवसाय के लिए 10 हजार रू. एकमुश्त भी देगी। 

पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा चुनावी घमासान है, जहां एसआईआर के साथ-साथ सीबीएस ( कैश बेनिफिट स्कीम) भी उतनी ही मायने रखती है। ममता दीदी तो अभी प्रति महिला 1500/1700 रू. दे ही रही है, सत्ता की दावेदार भाजपा ने इसे बढ़ाकर 3 हजार करने और सरकारी कर्मचारियों को डीए का बकाया भुगतान करने का वादा भी किया है। जहां देश के अन्य राज्यों में आठवे पे कमीशन की बात हो रही है, वहां पश्चिम बंगाल में अभी भी 6 वेतन आयोग की लागू है।

विस चुनावों में महिलाओं के वोट की कीमत इसी से समझी जा सकती है कि इन पांच राज्यों में कुल 17.4 करोड़ वोटर है, जिनमें से लगभग आधी महिलाएं हैं। तमिलनाडु और केरल में तो महिला वोटरों की संख्या पुरूषों से ज्यादा है। ऐसे में अगर बदलाव की कोई आंधी नहीं चली और नकद रेवड़ी का नुस्खा असर कर गया तो सत्तासीन दलों की सरकार में वापसी ज्यादा मुश्किल नहीं होनी चाहिए।

यह बात अलग है कि इस तरह नकद पैसा बांटने से सभी सम्बन्धित राज्यों पर सालाना 2 लाख 46 हजार करोड़ रू. का बोझ पर पड रहा है। इस घाटे की भरपाई का कोई प्रभावी उपाय उनके पास नहीं है। कुछ राज्य तो कंगाली की तरफ जा रहे हैं। लेकिन सत्ता है तो सब कुछ है, के सिद्धांत के तहत राज्यसत्ता को पाना ही राजनीतिज्ञों के लिए सर्वोपरि है, भले ही इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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