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चिराग-मांझी-राजभर: आरक्षण पर असली लड़ाई या एनडीए की नूराकुश्ती?

सार

आरक्षण को लेकर एनडीए के भीतर चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और ओम प्रकाश राजभर के अलग-अलग सुर अब खुली राजनीतिक बहस में बदल गए हैं। चिराग आरक्षण में क्रीमी लेयर और उप-वर्गीकरण के विरोध में हैं, जबकि मांझी और राजभर आरक्षण के लाभ को अधिक वंचित समूहों तक पहुंचाने के लिए बदलाव की वकालत कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह वास्तविक वैचारिक टकराव है? या चुनावी सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति? या फिर नूराकुश्ती?

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Chirag Paswan and Om Prakash Rajbhar clashed in a political debate surrounding reservations, creamy layers
जीतन राम मांझी, चिराग पासवान - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

आरक्षण का सवाल एनडीए के भीतर अब गंभीर टकराव का कारण बनता दिख रहा है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच विवाद इतना बढ़ गया है कि बात एक-दूसरे से इस्तीफा मांगने तक पहुंच गई है। चिराग ने मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन से इस्तीफे की मांग की, तो मांझी ने पलटवार करते हुए चिराग से पहले खुद इस्तीफा देने की चुनौती दे दी।

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यह सिर्फ दो नेताओं की बयानबाजी नहीं है। इसके पीछे अपने-अपने सामाजिक आधार को साधने और दलित राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश भी दिखाई देती है।

चिराग के लिए आरक्षण ‘अधिकार’

चिराग पासवान का स्पष्ट रुख है कि एससी-एसटी आरक्षण को क्रीमी लेयर से जोड़ना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि आरक्षण आर्थिक गरीबी दूर करने की योजना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव से पैदा हुई असमानता को दूर करने का संवैधानिक माध्यम है।
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चिराग का कहना है कि एससी-एसटी आरक्षण का आधार सामाजिक भेदभाव रहा है, इसलिए इसमें आर्थिक आधार जोड़ना उचित नहीं होगा। वह आरक्षण के भीतर भी बंटवारे के खिलाफ हैं और मानते हैं कि इससे अनुसूचित जातियों की सामूहिक राजनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है।
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मांझी क्यों मांग रहे हैं ‘कोटे में कोटा’?

दूसरी ओर जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन का तर्क है कि आरक्षण का लाभ सभी वंचित समूहों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। कुछ समुदायों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिला है, जबकि कई जातियां अब भी पीछे हैं।

इसीलिए मांझी खेमे की ओर से आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे में कोटा’ की मांग की जा रही है। तर्क यह है कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचे जो लंबे समय से इससे अपेक्षाकृत वंचित रहे हैं। संतोष सुमन ने भी आरक्षण की समीक्षा का अर्थ आरक्षण समाप्त करना नहीं, बल्कि उसका लाभ अधिक जरूरतमंदों तक पहुंचाना बताया है।

यानी विवाद केवल यह नहीं है कि आरक्षण रहे या न रहे। असली बहस यह है कि आरक्षण का लाभ किसे और कितना मिले।

राजभर की एंट्री ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान

उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर का आरक्षण को लेकर रुख मांझी की बहस से मिलता-जुलता दिखाई देता है। राजभर भी इस बात की पैरवी कर रहे हैं कि आरक्षण का लाभ उन वर्गों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचे, जो अभी भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।

अब एनडीए के भीतर तस्वीर दिलचस्प है। एक तरफ चिराग मौजूदा व्यवस्था में बदलाव के प्रति सावधान कर रहे हैं, दूसरी तरफ मांझी और राजभर आरक्षण के भीतर नए बंटवारे और पुनर्वितरण की जरूरत बता रहे हैं।

और यहीं से उठता है ‘नूराकुश्ती’ का सवाल

राजनीति में सवाल यह भी होता है कि किसी विवाद का फायदा आखिर किसे मिल रहा है?

चिराग, मांझी और राजभर तीनों एनडीए के घटक दलों से जुड़े हैं। ऐसे में एक ही गठबंधन के भीतर आरक्षण को लेकर अलग-अलग आवाजें उठना केवल वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक पहुंच बनाने की कोशिश भी हो सकती है।

लेकिन इसे सीधे एनडीए की ‘नूराकुश्ती’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। चिराग और मांझी के बीच राजनीतिक मतभेद वास्तविक भी हो सकते हैं और दोनों अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने के लिए स्वतंत्र रणनीति बना रहे हों, इसकी भी पूरी संभावना है।

नूराकुश्ती से लाभ किसे, नुकसान किसका?

इस सियासी नूराकुश्ती का सबसे बड़ा संभावित लाभ फिलहाल एनडीए को दिखाई देता है। चिराग पासवान आरक्षण के मौजूदा स्वरूप की रक्षा की आवाज बनकर अपने सामाजिक आधार को मजबूत कर सकते हैं, जबकि मांझी और राजभर आरक्षण के लाभ से अपेक्षाकृत वंचित दलित-पिछड़े समूहों के बीच अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर सकते हैं। यानी एक ही गठबंधन के भीतर अलग-अलग नेता अलग-अलग सामाजिक वर्गों को साध रहे हैं और इसका व्यापक राजनीतिक लाभ एनडीए को मिल सकता है।

खासकर भाजपा के लिए यह स्थिति इसलिए उपयोगी हो सकती है कि उसे सीधे आरक्षण पर अपना कोई विवादास्पद रुख लेने की जरूरत नहीं पड़ती, जबकि उसके सहयोगी ही अलग-अलग सामाजिक समूहों के सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर इसका नुकसान विपक्ष को हो सकता है, क्योंकि एनडीए के भीतर से ही आरक्षण के पक्ष और उसके पुनर्वितरण- दोनों की आवाजें आने से विपक्ष के लिए भाजपा को एकतरफा ‘आरक्षण विरोधी’ बताना आसान नहीं रहेगा। 

हालांकि इसका उलटा असर भी संभव है। यदि विवाद बयानबाजी से आगे बढ़कर गठबंधन के भीतर स्थायी दरार, दलित वोटों के विभाजन और सहयोगी दलों के बीच अविश्वास में बदल गया, तो नुकसान एनडीए को ही हो सकता है। इसलिए फिलहाल यह लड़ाई जितनी चिराग बनाम मांझी-राजभर की दिखाई दे रही है, उतनी ही यह दलित और पिछड़े वोटों के बीच राजनीतिक हिस्सेदारी की लड़ाई भी है।

आरक्षण की बहस या 2027 की तैयारी?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। क्या एनडीए के भीतर आरक्षण को लेकर वास्तव में वैचारिक मतभेद हैं या फिर अलग-अलग सहयोगी अपने-अपने वोट बैंक को साधने की तैयारी कर रहे हैं? आने वाले चुनावों को देखते हुए दलित, अति-दलित, पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों के बीच राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल और तेज हो सकता है। आरक्षण इसी सामाजिक राजनीति का सबसे प्रभावशाली मुद्दा है।

यही वजह है कि इस विवाद को केवल नेताओं की व्यक्तिगत बयानबाजी मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और चुनावी रणनीति—तीनों की राजनीति दिखाई देती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है- यह आरक्षण के भीतर न्याय की वास्तविक लड़ाई है या एनडीए के भीतर चल रही ऐसी सियासी नूराकुश्ती, जिसका अंतिम लाभ गठबंधन को और नुकसान विपक्ष को हो सकता है?



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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