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दूसरा पहलू: वह मंदिर, जहां सूर्य की पहली किरण करती है अभिषेक, उत्तराखंड में है ये विशिष्ट जगह
Tue, 01 Sep 2026 08:43 AM IST
प्रेम प्रताप सिंह
लियो टॉल्स्टॉय, (रूस के लेखक)
लियो टॉल्स्टॉय, (रूस के लेखक)
Published by: प्रेम प्रताप सिंह
Updated Tue, 01 Sep 2026 08:43 AM IST
सार
उत्तराखंड की पहाड़ियों में एक प्राचीन सूर्य मंदिर आज भी है, जहां वर्ष के दो खास दिनों में सूरज की पहली किरण सीधे गर्भगृह तक पहुंचती है। कटारमल सूर्य मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि सूर्य संबंधी अध्ययनों के लिए एक प्राचीन प्रयोगशाला भी है। यहां की सूर्य देव की प्रतिमा पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। 22 फरवरी व 22 अक्तूबर की सुबह सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान सूर्य की प्रतिमा पर पड़ती हैं।
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कटारमल मंदिर उत्तराखंड
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अल्मोड़ा शहर की भीड़-भाड़ और शोर से जैसे ही 17 किलोमीटर दूर कोसी नदी के पास से कटारमल की चढ़ाई शुरू होती है, हवा बदल जाती है। चीड़ के जंगल, घाटी का सन्नाटा और फिर अचानक सामने आती है पत्थरों से बनी मंदिरों की एक ऐसी नगरी, जो सदियों से सूर्य का इंतजार करती है। यहीं है कटारमल सूर्य मंदिर। यह उत्तराखंड की अनमोल विरासत है।
इसे ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर के बाद देश का दूसरा प्रमुख व विशाल प्राचीन सूर्य मंदिर माना जाता है। यह सिर्फ मंदिर नहीं, सूर्य संबंधी अध्ययनों के लिए एक प्राचीन प्रयोगशाला भी है। नौवीं से 11वीं सदी के बीच कत्यूरी राजा कटारमल ने इसे बनवाया था।
त्रिरथ शैली, वर्गाकार गर्भगृह और ऊपर नागर शैली का वक्ररेखी शिखर...
कारीगरों ने हर पत्थर पर देवताओं, समुद्र मंथन और आम जनजीवन को इस बारीकी से उकेरा है कि देखने वाला घंटों देखता रह जाए। मुख्य मंदिर के चारों ओर 45 छोटे मंदिरों का समूह है, जैसे सूर्य के दरबार में सभी देवता बैठे हों। मंदिर में चोरी की घटनाओं के बाद कई प्राचीन मूर्तियों को गर्भगृह में सुरक्षित रखा गया है। कटारमल सूर्य मंदिर को बड़ आदित्य सूर्य मंदिर भी कहा जाता है। यहां स्थापित सूर्य देव की प्रतिमा को लेकर भी मंदिर की अपनी अलग विशेषता है।
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मान्यता के अनुसार, भगवान आदित्य की प्रतिमा पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में सुरक्षित रखा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, क्षेत्र में कालनेमि नामक राक्षस का आतंक था। लोगों ने भगवान सूर्य से रक्षा की प्रार्थना की। कहा जाता है कि सूर्य देव बरगद के पेड़ में विराजमान हुए और लोगों को संकट से मुक्ति दिलाई। इसी कारण उन्हें यहां बड़ आदित्य के नाम से पूजा जाता है।
साल में दो विशेष दिनों 22 फरवरी और 22 अक्तूबर को सुबह के समय सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान सूर्य की प्रतिमा पर पड़ती हैं। मंदिर को लेकर यह भी दावा किया जाता है कि यह ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से करीब दो सौ वर्ष पुराना है। हालांकि, मंदिर के निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर को संरक्षित तो किया है, पर पहाड़ों में छिपा होने से यह पर्यटन मानचित्र पर वह जगह नहीं पा सका, जिसका यह हकदार है। यहां खड़े होकर एक सवाल मन में आता है कि क्या हम इसे सिर्फ इतिहास की किताब में छोड़ देंगे?
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इसे ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर के बाद देश का दूसरा प्रमुख व विशाल प्राचीन सूर्य मंदिर माना जाता है। यह सिर्फ मंदिर नहीं, सूर्य संबंधी अध्ययनों के लिए एक प्राचीन प्रयोगशाला भी है। नौवीं से 11वीं सदी के बीच कत्यूरी राजा कटारमल ने इसे बनवाया था।
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त्रिरथ शैली, वर्गाकार गर्भगृह और ऊपर नागर शैली का वक्ररेखी शिखर...
कारीगरों ने हर पत्थर पर देवताओं, समुद्र मंथन और आम जनजीवन को इस बारीकी से उकेरा है कि देखने वाला घंटों देखता रह जाए। मुख्य मंदिर के चारों ओर 45 छोटे मंदिरों का समूह है, जैसे सूर्य के दरबार में सभी देवता बैठे हों। मंदिर में चोरी की घटनाओं के बाद कई प्राचीन मूर्तियों को गर्भगृह में सुरक्षित रखा गया है। कटारमल सूर्य मंदिर को बड़ आदित्य सूर्य मंदिर भी कहा जाता है। यहां स्थापित सूर्य देव की प्रतिमा को लेकर भी मंदिर की अपनी अलग विशेषता है।
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मान्यता के अनुसार, भगवान आदित्य की प्रतिमा पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में सुरक्षित रखा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, क्षेत्र में कालनेमि नामक राक्षस का आतंक था। लोगों ने भगवान सूर्य से रक्षा की प्रार्थना की। कहा जाता है कि सूर्य देव बरगद के पेड़ में विराजमान हुए और लोगों को संकट से मुक्ति दिलाई। इसी कारण उन्हें यहां बड़ आदित्य के नाम से पूजा जाता है।
साल में दो विशेष दिनों 22 फरवरी और 22 अक्तूबर को सुबह के समय सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान सूर्य की प्रतिमा पर पड़ती हैं। मंदिर को लेकर यह भी दावा किया जाता है कि यह ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से करीब दो सौ वर्ष पुराना है। हालांकि, मंदिर के निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर को संरक्षित तो किया है, पर पहाड़ों में छिपा होने से यह पर्यटन मानचित्र पर वह जगह नहीं पा सका, जिसका यह हकदार है। यहां खड़े होकर एक सवाल मन में आता है कि क्या हम इसे सिर्फ इतिहास की किताब में छोड़ देंगे?