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अनुशासन से आती है स्थिरता: जो स्वयं पर विजय पा ले, वही पाता है सच्ची शांति

जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 20 Jun 2026 07:34 AM IST
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सार
अनुशासन हमें यह समझने की क्षमता देता है कि हमारे जीवन में क्या आवश्यक है और क्या केवल क्षणिक इच्छा का परिणाम। उसके माध्यम से हम अपने भीतर एक ऐसा केंद्र विकसित कर सकते हैं, जो जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों के बीच भी स्थिर बना रहे।
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जीवन धारा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मनुष्य अक्सर अनुशासन को केवल सफलता का साधन समझता है। हम सोचते हैं कि अनुशासन हमें अधिक कुशल बनाता है, अधिक सक्षम बनाता है, और जीवन में उपलब्धियां दिलाता है। यह सत्य है, लेकिन शायद यह उसका सबसे छोटा और सबसे सतही फल है। अनुशासन का वास्तविक महत्व कहीं अधिक गहरा है। उसका संबंध केवल हमारी क्षमताओं से नहीं, बल्कि हमारी आत्मा से है।


सदियों से मनुष्यों ने यह समझने का प्रयास किया है कि अनुशासन क्यों आवश्यक है। किसी ने इसका उत्तर गीता में खोजा, किसी ने स्टोइक दर्शन में, तो किसी ने संतों और दार्शनिकों की शिक्षाओं में। उनके उत्तर अलग-अलग थे, मार्ग अलग थे, पर एक बात समान थी, वे सभी इस विश्वास तक पहुंचे कि अनुशासन मनुष्य को भीतर से रूपांतरित करता है। अनुशासन केवल आदतों का संग्रह नहीं है। वह धीरे-धीरे हमें स्वयं पर विजय पाना सिखाता है। वह हमें यह समझने की क्षमता देता है कि हमारे जीवन में क्या आवश्यक है और क्या केवल क्षणिक इच्छा का परिणाम। हम जिन वस्तुओं, परिस्थितियों और सुविधाओं को कभी अनिवार्य समझते थे, अनुशासन हमें उनसे अलग होकर भी शांत रहना सिखाता है। जीवन अनिश्चित है। सुख और दुख आते-जाते रहते हैं। हमारे नियंत्रण से बाहर असंख्य घटनाएं हमारे भाग्य को आकार देती हैं। लेकिन, अनुशासन के माध्यम से हम अपने भीतर एक ऐसा केंद्र विकसित कर सकते हैं, जो इन परिवर्तनों के बीच भी स्थिर बना रहे। लेकिन, अनुशासन कभी शून्य में उत्पन्न नहीं होता। उसे किसी वास्तविक उद्देश्य की आवश्यकता होती है।  


इसीलिए मुझे लगता है कि अनुशासन पैदा करने वाली सभी चीजों, पढ़ाई-लिखाई, लोग और समाज के प्रति हमारे फर्ज, युद्ध, निजी मुश्किलें, और यहां तक कि गुजारे की जरूरत का स्वागत हमें गहरे शुक्रगुजार भाव से करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के जरिये हम थोड़ी-बहुत अनासक्ति पा सकते हैं, और इसी तरह हम शांति पा सकते हैं, जिसकी खोज मनुष्य ने हर युग में की है।      
edit@amarujala.com
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