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जेन-जी से संवाद की बारी: क्या अब संसद नहीं, सड़क से तय होगी देश की राजनीति?

Siddheshwar Shukla सिद्धेश्वर शुक्ला
Updated Mon, 03 Aug 2026 12:43 PM IST
सार

 इसी बदलते संचार-संतुलन से उत्साहित होकर चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में गुरुग्राम संसदीय क्षेत्र से हारने के बाद अब तक कोई चुनाव नहीं लड़े हैं, कहते हैं कि अब देश की राजनीति संसद से नहीं, बल्कि सड़क से तय होगी।

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जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और अन्य मांगों को स्वीकार किए जाने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का जंतर-मंतर पर चल रहा अनशन समाप्त हो गया। यह आंदोलनकारियों की सफलता तो है ही, साथ ही इसे सरकार की भी एक उपलब्धि माना जा सकता है कि उसने इस आंदोलन को बिना किसी जनहानि के समाप्त करा दिया और 2020-21 के दिल्ली किसान आंदोलन तथा 2024 के पंजाब-हरियाणा किसान आंदोलनों की तुलना में व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों को भी अपेक्षाकृत बहुत कम क्षति पहुंची।

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हालांकि, इस आंदोलन से भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण सीख लेना भी आवश्यक है, ताकि ऐसे जनांदोलनों की परिस्थितियों, संचार-रणनीतियों और जनभावनाओं को समय रहते समझकर उनसे अधिक प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। 
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विमर्श निर्माण में सोशल मीडिया

एक समय था जब संचार के माध्यमों (साधनों) पर सत्ता का व्यापक नियंत्रण हुआ करता था और आंदोलनों की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती थी कि आंदोलनकारी इन साधनों तक अपनी पहुंच किस सीमा तक बना पाते हैं। किंतु सोशल मीडिया के वर्तमान युग में यह स्थिति मूलतः बदल चुकी है। आज संचार के साधनों तक जितनी पहुंच सत्ता की है, लगभग उतनी ही पहुंच एक सामान्य व्यक्ति की भी संभव हो गई है, विशेष रूप से भारत जैसी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में।
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प्रभावी संदेशों का निर्माण कर उन्हें सही समय पर  सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाला ही इस संचार-प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल कर लेता है। इसी कारण अब आंदोलनों के विमर्श की लड़ाई जमीन से अधिक सोशल मीडिया पर लड़ी जा रही है। 

संभवतः इसी बदलते संचार-संतुलन से उत्साहित होकर चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में गुरुग्राम संसदीय क्षेत्र से हारने के बाद अब तक कोई चुनाव नहीं लड़े हैं, कहते हैं कि अब देश की राजनीति संसद से नहीं, बल्कि सड़क से तय होगी।

यह कथन केवल आंदोलनकारी राजनीति के बढ़ते आत्मविश्वास को ही नहीं दर्शाता, बल्कि उस नई संचार-व्यवस्था की ओर भी संकेत करता है जिसमें सोशल मीडिया ने सड़क पर होने वाले छोटे से आंदोलन को भी कुछ ही समय में व्यापक राजनीतिक विमर्श में बदलने की क्षमता प्रदान कर दी है। 


गंदी गालियों के प्रयोग पर बने कानून

सीजेपी के आंदोलन का सबसे अभद्र पक्ष प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत माता, केंद्रीय मंत्रियों, दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों के अधिकारियों को उनकी माता, बहन तथा परिवार की अन्य महिलाओं के जननांगों का नाम लेकर अपमानित करने के उद्देश्य से गालियां देना रहा। तथाकथित जेन-जी के कुछ युवक-युवतियों ने न केवल सार्वजनिक रूप से निर्लज्जता के साथ ऐसी भाषा का प्रयोग किया, बल्कि उसके वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी प्रसारित किए।

चिंताजनक यह भी है कि सीजेपी के नेताओं ने न तो मंच से ऐसे लोगों को रोकने का प्रयास किया और न ही सोशल मीडिया अथवा सार्वजनिक बयान के माध्यम से अब तक इसकी निंदा की।

सरकार और समाज को समझना होगा कि जेन-जी केवल आंदोलनकारी नहीं हैं। इसी पीढ़ी के युवा अपनी मेहनत और योग्यता से आईएएस, आईपीएस, पुलिस, सेना और अन्य सुरक्षा बलों में भी सेवाएं दे रहे हैं।
 

  • एक ओर सरकारी सेवा में कार्यरत इन युवाओं पर अनुशासन और आचरण के कठोर नियम लागू हैं, जिसके कारण वे उकसावे और गालियों के बावजूद संयम बनाए रखने को बाध्य हैं। 
  • दूसरी ओर उनके ही समवयस्क आंदोलनकारियों को ऐसी अभद्रता की खुली छूट नहीं दी जा सकती। कानून की दृष्टि में दोनों की गरिमा समान होनी चाहिए।


इसलिए सरकार को वर्तमान कानूनों में आवश्यक संशोधन कर सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर आंदोलनों के दौरान, किसी व्यक्ति की माता, बहन, बेटी, पिता, पुत्र अथवा अन्य परिजनों के जननांगों का उल्लेख कर अपमानित करने के उद्देश्य से दी जाने वाली लक्षित अश्लील गालियों के लिए एक से तीन वर्ष तक की सजा का स्पष्ट प्रावधान करने पर विचार करना चाहिए। अभिव्यक्ति और असहमति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन उसकी आड़ में किसी की व्यक्तिगत और पारिवारिक गरिमा को तार-तार करने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। 

शास्त्रार्थ-आधारित जनसंपर्क रणनीति

अपने पक्ष की स्थापना के लिए सुदृढ़ संदेशों का प्रयोग और प्रतिपक्ष के विचारों का खंडन करना शास्त्रार्थ का प्रमुख उद्देश्य रहा है। किंतु सोशल मीडिया के इस युग में यह शास्त्रार्थ आमने-सामने बैठकर नहीं, बल्कि युवाओं के वैचारिक संसार में हो रहा है।

यह संभव है कि युवा दोषपूर्ण संदेशों से प्रभावित होकर उसी के अनुरूप व्यवहार और कार्य करने लगें। ऐसे में उनके वैचारिक संसार में प्रवेश कर दोषपूर्ण संदेशों का तर्कपूर्ण खंडन करना और उनके स्थान पर अधिक तथ्यपरक एवं प्रभावी संदेशों की स्थापना करना भी एक सुदृढ़ संचार-रणनीति के माध्यम से ही संभव है।

वस्तुतः सत्ता अब केवल पांच वर्ष में एक बार चुनाव के समय जनता को अपने विचारों से प्रभावित कर जनादेश प्राप्त करने और उसके आधार पर अगले पांच वर्ष तक सरकार चलाने का विषय नहीं रह गई है। सोशल मीडिया और युवा-आधारित आंदोलनों के इस दौर में सत्ता को बनाए रखना पूरे पांच वर्ष चलने वाले सतत वैचारिक संघर्ष और जनसंवाद का स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। इसके लिए सरकार को जनता के बीच जाकर सीधा संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है।

इस रणनीति में सोशल मीडिया के साथ-साथ जमीनी स्तर पर रैलियों, नुक्कड़ नाटकों और अन्य जनसंचार माध्यमों का भी समुचित उपयोग किया जा सकता है। इससे युवाओं को तथ्यों के आधार पर अपना मत बनाने का अवसर मिलेगा।



यदि सरकार शास्त्रार्थ की मूल भावना- तर्क, तथ्य, संवाद और प्रतिपक्ष के विचारों के विवेकपूर्ण खंडन के साथ इस रणनीति पर आगे बढ़ती है, तो सोशल मीडिया आधारित इस आंदोलन का शांतिपूर्ण और संवादपरक समाधान संभव हो सकता है। 


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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