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कैंसर को भी ट्रैक कर सकते हैं जुगनू: ट्यूमर पता लगाने की तकनीक में सुधार के आसार, शोध के दौरान क्या मिला?
Mon, 03 Aug 2026 08:49 AM IST
ज्योति भास्कर
अमित मुद्गल
अमित मुद्गल
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 03 Aug 2026 08:49 AM IST
सार
गुवाहाटी विवि के शोधकर्ताओं ने खोेजी भारतीय जुगनू की ऐसी प्रजाति, जो कैंसर ट्यूमर को ट्रैक करने की तकनीक में सुधार कर सकती है।
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कैंसर को भी ट्रैक कर सकते हैं जुगनू (सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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विस्तार
वृंदावन में एक जगह है निधिवन। मान्यता है कि निधिवन में आज भी हर रात भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी गोपियों संग रासलीला करते हैं। केवल जुगनू रातभर यहां चमकते हैं और अपना प्रकाश बिखेरते हैं। जुगनू अपने आप में प्रकृति का एक अनोखा चमत्कार है।
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लैम्पिरिडी परिवार का यह कीट अपनी जैविक चमक के लिए जाना जाता है। इनके शरीर के पिछले हिस्से में एक रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, जिसे ‘बायोल्यूमिनेसेंस’ कहा जाता है। इनमें ‘ल्यूसिफरेज’ एंजाइम व ‘ल्यूसिफेरिन’ तत्व होता है, जो सांस लेने के दौरान ऑक्सीजन के साथ मिलकर प्रकाश पैदा करता है। खास बात यह है कि जुगनू की रोशनी पूरी तरह ठंडी होती है, जिससे यह खुद नहीं जलता।
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यह प्रकाश मुख्य रूप से साथी को आकर्षित करने व दुश्मन से बचाव के लिए होता है, जिसे ‡‘लव सिग्नल’ कहते हैं। यह प्रकाश कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में भी महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। कैंसर रिसर्च में 'बायोल्यूमिनेसेंस इमेजिंग' का अहम रोल है, जिसमें पहले मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिकी जुगनू की प्रजाति फोटिनस पाइरालिस का इस्तेमाल किया जाता था।
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अमेरिका का दावा था कि केवल यही प्रजाति इस तकनीक पर सबसे ठोस काम करती है। हालांकि, इसी साल गुवाहाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बताया कि भारतीय प्रजाति के जुगनू ‘एसिमेट्रिका सरकमडेटा’ का भी इस तकनीक में बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।
शोधकर्ता ए.जे बोराह व प्रोफेसर ए. गोहैन बरुआ ने इस प्रजाति के जुगनुओं की तरंगदैर्ध्य यानी वेव लेंथ में 9 नैनोमीटर का बदलाव भी दर्ज कराया और बताया कि स्थिर विद्युत क्षेत्र में रखने पर इस जुगनू की चमक की अवधि व सीमा तुरंत बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों ने भारत की पहली जुगनू चेकलिस्ट 2026 तैयार की है, जिसमें 92 प्रजातियों को दर्ज किया गया है।
जूटैक्सा जर्नल में प्रकाशित इस सूची के अनुसार, इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। इस सर्वे में पाया गया कि रेगिस्तानी इलाकों में जुगनुओं की एक भी प्रजाति नहीं है, जबकि पश्चिमी घाट व गंगा के मैदानी क्षेत्रों में इनकी भरमार है।
साथ ही, वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते प्रकाश प्रदूषण के कारण जुगनू खतरे में हंै। अंत में यह गलतफहमी दूर करना जरूरी है कि जुगनू गोबर में पैदा होता है, गोबर में पैदा होने वाला कीट अलग होता है। यह कुदरत की ऐसी अद्भुत रचना है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत कारगर है।