{"_id":"6a6dd7e680e6497f8909ee73","slug":"where-will-go-20-rebel-tmc-mps-what-will-be-their-next-plan-of-action-2026-08-01","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"West Bengal: तृणमूल के 20 बागी सांसद आखिर जाएंगे कहां? एनसीपीआई, भाजपा या ममता बनर्जी के पास वापसी?","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
West Bengal: तृणमूल के 20 बागी सांसद आखिर जाएंगे कहां? एनसीपीआई, भाजपा या ममता बनर्जी के पास वापसी?
सार
तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों की राजनीतिक और संसदीय पहचान को लेकर सवाल उठ रहे हैं। एनसीपीआई की मान्यता, भाजपा से संभावित नजदीकी, टीएमसी में पुनर्वापसी और सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना से बंगाल की राजनीति में नई हलचल।
विज्ञापन
लोकसभा अध्यक्ष के साथ टीएमसी का बागी समूह
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/पीटीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसद खुद को एनसीपीआई के साथ बता रहे हैं और एनडीए की बैठकों में भी नजर आ रहे हैं। लेकिन लोकसभा के रिकॉर्ड में अभी उनकी पहचान टीएमसी सांसद की है। एनसीपीआई को संसदीय मान्यता नहीं मिलने से सवाल उठ रहा है कि आखिर इन सांसदों की वास्तविक राजनीतिक और संसदीय पहचान क्या है?
विज्ञापन
राजनीति में कई बार किसी फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सवाल होता है, जो उस फैसले के बाद खड़ा होता है। टीएमसी के 20 सांसदों के अलग होने के मामले में भी यही हो रहा है। एक तरफ वे एनसीपीआई के साथ खड़े हैं, दूसरी तरफ संसद के रिकॉर्ड में अभी भी टीएमसी के सदस्य हैं।
विज्ञापन
अब चर्चा केवल यह नहीं कि ये सांसद टीएमसी से अलग क्यों हुए। असली सवाल यह है कि वे जाएंगे कहां? एनसीपीआई में रहेंगे, भाजपा का दामन थामेंगे या इनमें से कुछ फिर ममता बनर्जी के साथ लौटेंगे?
विज्ञापन
संसद में TMC और राजनीति में NCPI
20 सांसद खुद को एनसीपीआई के साथ बता रहे हैं और एनडीए की बैठकों में शामिल हो रहे हैं। लेकिन लोकसभा के रिकॉर्ड में उनके नाम के साथ अभी भी एआईटीसी यानी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस दर्ज है। एनसीपीआई को लोकसभा अध्यक्ष की ओर से औपचारिक मान्यता नहीं मिली है। ऐसे में राजनीतिक पहचान और संसदीय पहचान के बीच अंतर दिखाई दे रहा है।
सवाल है कि क्या यह केवल प्रक्रिया का मामला है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक समीकरण बन रहा है?
कल्याण बनर्जी के बयान ने बढ़ाई हलचल
टीएमसी के वरिष्ठ सांसद और अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने संकेत दिया है कि अगले एक सप्ताह में बड़ा घटनाक्रम हो सकता है। इससे यह संभावना मजबूत हुई है कि टीएमसी इस पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है। कल्याण बनर्जी का कहना है कि टीएमसी छोड़कर दूसरे राजनीतिक दल के साथ जाने वाले सांसदों पर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून लागू होना चाहिए। अगर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है तो विवाद सिर्फ 20 सांसदों की सदस्यता तक सीमित नहीं रहेगा।
सवाल यह भी होगा कि राजनीतिक दल छोड़ने, नया समूह बनाने और संसदीय मान्यता मिलने के बीच दसवीं अनुसूची किस तरह लागू होगी।
क्या एनसीपीआई सिर्फ एक पड़ाव है?
इस कहानी का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू एनसीपीआई का भविष्य है। एनसीपीआई को मान्यता मिलने में देरी के बीच यह चर्चा है कि बागी सांसद आगे चलकर भाजपा में विलय कर सकते हैं। इसकी अभी कोई औपचारिक पुष्टि नहीं है, इसलिए इसे राजनीतिक अटकल से ज्यादा नहीं माना जा सकता।
सवाल लेकिन जरूर बड़ा है, अगर मंजिल भाजपा है तो एनसीपीआई का रास्ता क्यों चुना गया? क्या एनसीपीआई एक स्थायी राजनीतिक विकल्प है या किसी बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन से पहले का अस्थायी पड़ाव?
तीन सांसद लौटे तो बदल जाएगा समीकरण
इधर एनसीपीआई के तीन सांसदों- अबू ताहेर खान, खलीलुर्रहमान और यूसुफ पठान के टीएमसी में लौटने की खबरें भी हैं। यदि तीनों की वापसी होती है तो टीएमसी की संख्या आठ से बढ़कर 11 और एनसीपीआई की संख्या 20 से घटकर 17 हो जाएगी। यानी एनसीपीआई दो-तिहाई के आंकड़े से नीचे चली जाएगी।
संख्या का केवल बदलाव नहीं होगा। इससे पूरे दल-बदल विवाद का राजनीतिक और संवैधानिक गणित बदल सकता है।
टीएमसी के भीतर भी क्या कुछ चल रहा है?
बागी सांसदों की कहानी के बीच टीएमसी के कुछ नेताओं की भाजपा नेताओं से मुलाकातों ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी है। कल्याण बनर्जी को भाजपा सांसद और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य के साथ देखा गया। उनके साथ महुआ मोइत्रा भी थीं। सौगत रॉय और शत्रुघ्न सिन्हा को केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के साथ भोजन की मेज पर देखा गया। शताब्दी रॉय की प्रधानमंत्री मोदी से और जून मालिया की गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की तस्वीरें भी सामने आई हैं।
इन मुलाकातों को पाला बदलने का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। लोकतंत्र में अलग-अलग दलों के नेताओं का मिलना असामान्य नहीं है। लेकिन जब एक पार्टी टूट के दौर में हो, तब राजनीतिक तस्वीरों का महत्व भी बढ़ जाता है।
क्या भाजपा बंगाल में बड़े खेल की तैयारी में है?
यहीं से सवाल 20 सांसदों से आगे निकल जाता है। क्या भाजपा केवल टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है? या बंगाल में इससे बड़ा राजनीतिक पुनर्संयोजन तैयार हो रहा है? अभी इसका जवाब नहीं है। लेकिन घटनाक्रम को देखते हुए इन सवालों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
पूरे मामले में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है। एनसीपीआई को संसदीय मान्यता मिलेगी या नहीं और बागी सांसदों की संसदीय पहचान क्या होगी- इन सवालों पर संसदीय प्रक्रिया निर्णायक होगी। लेकिन प्रक्रिया में देरी के साथ राजनीतिक असमंजस भी बढ़ता जा रहा है।एक तरफ जमीन पर सांसद एनसीपीआई और एनडीए के साथ दिखाई दे रहे हैं, दूसरी तरफ संसद के रिकॉर्ड में वे अभी भी टीएमसी सांसद हैं।यही अंतर इस पूरे मामले को असाधारण बनाता है।
सुप्रीम कोर्ट गया मामला तो क्या होगा?
टीएमसी अगर सुप्रीम कोर्ट जाती है तो उसे केवल सांसदों के पार्टी छोड़ने का तथ्य नहीं रखना होगा। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि इस स्थिति में संविधान की दसवीं अनुसूची कैसे लागू होती है।दूसरी ओर बागी सांसदों के सामने भी अपनी राजनीतिक पहचान स्पष्ट करने की चुनौती होगी।क्या वे एनसीपीआई में रहेंगे? क्या भाजपा के साथ जाएंगे? या कुछ सांसद वापस टीएमसी में लौटेंगे? अभी तीनों संभावनाएं राजनीतिक चर्चा का हिस्सा हैं।
असली सवाल- बागी सांसद हैं कहां?
बंगाल की राजनीति में दल बदल और राजनीतिक पाला बदल कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार मामला इसलिए अलग है क्योंकि राजनीतिक निष्ठा, संसदीय पहचान और संवैधानिक प्रक्रिया तीन अलग-अलग दिशाओं में जाती दिख रही हैं।अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन 20 सांसदों का अंतिम ठिकाना क्या होगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है- एनसीपीआई की संसदीय मान्यता पर फैसला जितना लंबा खिंचेगा, राजनीतिक अटकलें उतनी ही तेज होंगी। आखिर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तृणमूल के बागी सांसद किस दल में हैं?
सवाल यह है कि वे संसद में किस पहचान के साथ हैं और आने वाले समय में जनता के सामने किस राजनीतिक पहचान के साथ खड़े होंगे? अगर अगले एक सप्ताह में कल्याण बनर्जी के संकेत के मुताबिक कोई बड़ा घटनाक्रम होता है, तो बंगाल की राजनीति में नई तस्वीर बन सकती है। और अगर ऐसा नहीं होता, तो भी मौजूदा असमंजस एक सवाल जरूर छोड़ जाएगा- दल बदलना शायद आसान है, लेकिन अपनी राजनीतिक पहचान तय करना सबसे मुश्किल।
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।