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सिलक्यारा से तीस्ता तक: क्या सबक सिखा रही हैं हिमालय की चेतावनियां?
सार
सिक्किम की दुर्घटना ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। बताया जा रहा है कि सुरंग में मीथेन गैस का विस्फोट हुआ। यह कोई अप्रत्याशित या अज्ञात जोखिम नहीं है। सुरंग इंजीनियरिंग में मीथेन गैस, विषैली गैसों, भूजल के दबाव और अस्थिर चट्टानों को सबसे बड़े खतरों में गिना जाता है।
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सिलक्यारा सुरंग
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
सिक्किम की तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में मीथेन गैस विस्फोट से हुई बड़ी जनहानि और उत्तराखंड की सिलक्यारा -बड़कोट सुरंग में हाल में चट्टान गिरने से एक श्रमिक की मौत ने हिमालय में चल रही सुरंग परियोजनाओं की सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह पहला अवसर नहीं है।
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नवंबर 2023 में सिलक्यारा सुरंग में 41 श्रमिक 17 दिनों तक फंसे रहे थे। उस समय देश-विदेश का ध्यान इस दुर्घटना पर गया, अभूतपूर्व बचाव अभियान चला और श्रमिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया। लेकिन उस हादसे के बाद जो मूल प्रश्न उठे थे, भू-वैज्ञानिक आकलन कितना सटीक था, सुरक्षा मानकों का पालन हुआ या नहीं, जोखिम का पूर्व आकलन क्यों विफल हुआ?
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उनके जवाब आज तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए। अब उसी परियोजना में फिर एक जान चली गई है। देखा जाय तो इन सुरंगों में जिंदगियां तो क्या, स्वयं हिमालय भी असुक्षित है।
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सिक्किम की दुर्घटना ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। बताया जा रहा है कि सुरंग में मीथेन गैस का विस्फोट हुआ। यह कोई अप्रत्याशित या अज्ञात जोखिम नहीं है। सुरंग इंजीनियरिंग में मीथेन गैस, विषैली गैसों, भूजल के दबाव और अस्थिर चट्टानों को सबसे बड़े खतरों में गिना जाता है। दुनिया भर में इनके लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं दशकों से मौजूद हैं। प्रश्न यह है कि यदि खतरे ज्ञात हैं तो दुर्घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं?
दरअसल, हिमालय आज देश की सबसे बड़ी निर्माण प्रयोगशाला बन गया है। जलविद्युत परियोजनाएं, चारधाम सड़क परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन, कश्मीर आदि राज्यों में सीमा सड़कें और ज़ोजिला और सोनमर्ग की जैसी सामरिक सुरंगें, हर दिशा में पहाड़ों के भीतर सुरंगों का जाल बिछाया जा रहा है।
आने वाले वर्षों में इनकी संख्या और लंबाई दोनों कई गुना बढ़ने वाली हैं। लेकिन क्या सुरक्षा व्यवस्था भी उसी अनुपात में मजबूत हो रही है? यदि पिछले डेढ़ दशक की घटनाओं पर नजर डालें तो चिंता और बढ़ जाती है। फरवरी 2021 में चमोली जिले में ऋषिगंगा और धौलीगंगा में आई विनाशकारी बाढ़ ने एनटीपीसी की तपोवन-विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना को तबाह कर दिया था। निर्माणाधीन सुरंग में काम कर रहे बड़ी संख्या में श्रमिक और कर्मचारी मलबे और पानी में समा गए।
लगभग 200 लोगों की मौत हुई या वे लापता हो गए। कई दिनों तक चले बचाव अभियान के बावजूद अधिकांश लोगों को नहीं बचाया जा सका। यह त्रासदी केवल प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि इसने हिमालयी परियोजनाओं की आपदा तैयारी और जोखिम आकलन पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए।
इससे पहले टिहरी बांध परियोजना के भूमिगत निर्माण के दौरान भी कई हादसे हुए। सुरंगों में चट्टानें गिरने, पानी भरने और तकनीकी कारणों से श्रमिकों की जान गई। इन घटनाओं के बाद सुरक्षा सुधारों की बातें हुईं, लेकिन आज भी हिमालयी सुरंगों में दुर्घटनाओं का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा। हिमालय कोई साधारण पर्वत श्रृंखला नहीं है।
यह दुनिया का सबसे युवा पर्वत तंत्र है, जो आज भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय है। यहां की चट्टानें अनेक स्थानों पर कमजोर हैं, भूकंपीय गतिविधि अधिक है और कई क्षेत्रों में मीथेन जैसी ज्वलनशील गैस की जेबें मौजूद हैं।
इसलिए यहां सुरंग निर्माण मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक जटिल और जोखिमपूर्ण है। यही कारण है कि प्रत्येक परियोजना में विस्तृत भू-वैज्ञानिक अध्ययन, गैस की पूर्व जांच, ड्रेनेज बोरहोल, प्रभावी वेंटिलेशन, रियल टाइम मॉनिटरिंग और आपातकालीन निकासी व्यवस्था अनिवार्य मानी जाती है।
लेकिन क्या हमारी परियोजनाओं में इन मानकों का पूरी कठोरता से पालन हो रहा है? यह सवाल नया नहीं है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अक्सर टनलिंग और हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए भारतीय कंसल्टेंसी फर्मों द्वारा तैयार की गई डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स (डीपीआर ) की खराब क्वालिटी की कड़ी आलोचना की है।
वह खराब डीपीआरऔर दोषपूर्ण सिविल इंजीनियरिंग को संवेदनशील इलाकों में प्रोजेक्ट में देरी, लागत बढ़ने और भयानक हादसों के लिए मुख्य वजह बता चुके हैं।
यदि प्रारंभिक भू-वैज्ञानिक अध्ययन और डिजाइन में ही कमियां रह जाएं तो निर्माण के दौरान खतरे बढ़ना स्वाभाविक है। हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तो डीपीआर की छोटी-सी त्रुटि भी भारी पड़ सकती है। दुर्भाग्य यह है कि हर बड़ी दुर्घटना के बाद जांच समितियां बनती हैं, मुआवजे घोषित होते हैं और कुछ समय तक सुरक्षा पर बहस चलती है। फिर मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है।
जांच रिपोर्टें अक्सर सार्वजनिक नहीं होतीं या उनसे निकले सबक व्यापक रूप से लागू होते दिखाई नहीं देते। परिणामस्वरूप अगली दुर्घटना फिर हमें उसी मोड़ पर खड़ा कर देती है।
सबसे अधिक कीमत वे श्रमिक चुकाते हैं, जो इन परियोजनाओं की असली ताकत हैं। अधिकांश श्रमिक प्रवासी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। वे कठिन परिस्थितियों में पहाड़ों के भीतर काम करते हैं। दुर्घटना के बाद उनके परिवारों को मुआवजा तो मिल सकता है, लेकिन खोया हुआ जीवन कभी वापस नहीं आता।
यह कहना उचित नहीं होगा कि हिमालय में विकास कार्य रुक जाने चाहिए। सीमांत राज्यों को बेहतर सड़कें, रेल संपर्क, सुरंगें और ऊर्जा परियोजनाएं चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास की दृष्टि से इनका महत्व निर्विवाद है। लेकिन विकास और सुरक्षा को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
यदि हजारों करोड़ रुपये की परियोजना में अत्याधुनिक मशीनें लग सकती हैं तो श्रमिकों की सुरक्षा पर भी सर्वोच्च निवेश होना चाहिए। अब समय आ गया है कि हिमालयी सुरंग परियोजनाओं के लिए अलग सुरक्षा ढांचा तैयार किया जाए।
प्रत्येक परियोजना की स्वतंत्र भू-वैज्ञानिक समीक्षा हो, डीपीआर का विशेषज्ञों द्वारा पुनर्मूल्यांकन अनिवार्य बनाया जाए, गैस और भूगर्भीय गतिविधियों की रियल टाइम निगरानी हो, सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक किए जाएं और दुर्घटना की स्थिति में जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय की जाए।
परियोजनाओं की सफलता केवल समय पर निर्माण से नहीं, बल्कि सुरक्षित निर्माण और हिमालय के पारितंत्र की दशा से मापी जानी चाहिए। सिक्किम, सिलक्यारा , चमोली और टिहरी, ये चार नाम अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये हिमालय की ओर से दी जा रही लगातार चेतावनियां हैं।
यदि इन चेतावनियों को भी हम केवल दुर्घटनाओं का संयोग मानकर आगे बढ़ गए, तो विकास की अगली सुरंग के मुहाने पर शायद एक और त्रासदी हमारा इंतजार कर रही होगी। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी सुरंगों की संख्या से नहीं, बल्कि उन सुरंगों में काम करने वाले प्रत्येक श्रमिक के सुरक्षित घर लौटने से मापी जानी चाहिए। इसके साथ ही हिमालय की सेहत को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।