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देव की डायरी: गाली का डिजिटल माइग्रेशन- बिना वाईफाई से लेकर वायरल गाली तक
सार
एक समय था, जब गाली देने के लिए न मोबाइल चाहिए था, न इंटरनेट, न कोई ऐप। बस सामने एक आदमी चाहिए था और भीतर उबलता हुआ गुस्सा। गाली सीधे मुंह से निकलती थी और बिना किसी नेटवर्क के दिल को छेद देती थी। उनमें वीभत्स रस का इतना प्रचुर निवेश होता था कि आस-पास खड़े लोग भी सन्न रह जाते थे। उनमें अलंकार और आक्रमण की तीव्रता प्रतिद्वंद्वी का ‘चरित्र-मर्दन’ और ‘मनोबल-भंजन’ कर डालती थी। तब गालियां निजी संपत्ति थीं। पीढ़ियों से विरासत में मिलती थीं और सीमित दायरे में खर्च होती थीं।
अब गालियां ओपन सोर्स हैं। जिसे जो पसंद आए, डाउनलोड कर ले। गाली अब भाषा नहीं, कंटेंट है। वह एडिट होती है , मीम बनती है, रीपोस्ट होती है और फिर वायरल होकर ट्रेंड करने लगती है। उसके अपने व्यू और रीच है । लगता है, गालियों ने भी ‘क्रिएटर इकोनॉमी’ में अपना सफल स्टार्टअप खोल लिया है।
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गालियों का बदलता दौर
- फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
देश में गालियों ने इन दिनों गजब की तरक्की की है। पहली बार गालियां अपने अर्थ से ज्यादा अपने विश्लेषण के कारण चर्चित हैं। पहले वे गांव की चौपाल पर पैदा होती थीं, फिर शहर पहुंचकर आधुनिक हुईं और अब विकास की पूरी परिक्रमा करके फिर गांव लौट आई हैं। मानो उन्होंने भी 'रिवर्स माइग्रेशन' का सरकारी मॉडल अपना लिया हो।
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पूरे देश मेंं गालियों पर राष्ट्रीय मंथन चल रहा है। कई लोगों को गालियां सुनने में शर्म आ रही है। देने वाले मुस्कुरा रहे हैं। जिन्हें दी जा रही है, वे चुप हैं। टीवी स्टूडियो में गालियों का पोस्टमार्टम हो रहा है। सोशल मीडिया उन पर शोधपत्र लिख रहा है। राजनीतिक दल गालियों के व्याकरण में अपनी-अपनी पीएचडी जमा कर रहे हैं।
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ऐसा लगता है कि देश में फिलहाल बारिश बाद में आएगी, पहले यह तय होगा कि किस गाली का अर्थ क्या था, उसका आशय क्या था और उससे किसकी भावनाएं कितनी वैज्ञानिक ढंग से आहत हुईं। शब्दों पर अविश्वास इतना बढ़ गया है कि कोई अगर सिर्फ "सुनिए..." कह दे, तो सामने वाला पहले मानसिक हेलमेट पहन लेता है।
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यह सब देखकर मुझे अपने गांव मोतिया के औकती झा याद आ गए। गाली अगर कभी किसी के कंठ में शास्त्रीय संगीत की तरह बसी थी, तो वह औकती झा ही थे। गुस्सा उनका राग था और गाली उसका आलाप। एक बार शुरू हो जाते, तो आगे की ‘गाली यात्रा’ को संभालने और विस्तार देने का काम गांजा करता था। जैसे किसी संगीत समारोह में पहले कलाकार गाता है, फिर तानपुरा देर तक वातावरण थामे रहता है। औकती झा की एक और विशेषता थी।
सामान्य बातचीत में उनके शब्दों का अंतिम अक्षर अक्सर हवा में उड़ जाता था। लगता था, जैसे वाक्य बीच रास्ते में थक गया हो। लेकिन गाली...! गाली का हर वर्ण पूरे सुर और पूरे उच्चारण के साथ बाहर आता था। ऐसी स्पष्टता तो आजकल चैनलों के एंकरों में भी नहीं मिलती।
हम बच्चे उनके गाली-शिल्प के अनौपचारिक विद्यार्थी थे। वह गाली नहीं देते थे, भाषा की निजी प्रयोगशाला चलाते थे। उनके पास मौलिक, अप्रकाशित और अप्रसारित गालियों का ऐसा भंडार था कि अगर उस समय ‘भारतीय गाली अकादमी’ बन गई होती, तो औकती झा उसके आजीवन अध्यक्ष घोषित कर दिए जाते।
वह जिसको गाली देते थे, वह उसी पर फिट बैठता था, दूसरे पर नहीं। कोई अगर उनके दिए गालियों की नकल भी करना चाहता तो दिमाग लगाना पड़ता था। और अगर दिमाग ही लगाना है तो अपनी गाली क्यों न बना ले आदमी। इस सिद्धांत से उनकी गालियों का सर्वाधिकार सुरक्षित रहा, जब तक वह रहे।
औकती झा गाली बोलते थे तो हवा उसे अपने साथ उड़ा ले जाती थी और सुनने वाले के कानों में जाकर अपना लोकतंत्र स्थापित कर देती थीं। तब गालियां निजी संपत्ति थीं। अब ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर हैं। जो चाहे डाउनलोड कर ले।
हालांकि गालियों पर चल रहे मंथन की इस कठिन वेला में कई लोग मानते हैं कि उनके समय में गालियां भी ‘संस्कारी’ हुआ करती थीं। वे संयुक्त परिवार में रहती थीं। बिना बुलाए किसी के घर नहीं जाती थीं। कई बार शादी में समधन उनका हाथ पकड़ कर लाती थी और समधी मुस्कुरा कर सुनता था-”समधी का पेट बा कि कुआं हो राम! ..अइसन भुक्खड़ समधी पाई के, हमार किस्मत रोए हो राम...!“
विशेषज्ञों की मानें तो वह गालियों का स्वर्णकाल था। उनके भी नियम थे, मर्यादा थी और अवसर थे। होली में वे लोकगीत बन जाती थीं। शादी में रस्म बन जाती थीं। गांव के झगड़े में फड़फड़ाती थीं। बाकी दिनों में शालीन नागरिक की तरह अपने घर बैठी रहती थीं। उन्हें भी मालूम था कि हर समय उपस्थित रहना शिष्टाचार नहीं, बदतमीजी है।
लेकिन मेरी तरह औकती झा जैसे अनगिनत लोगों के ‘गाली ग्रंथ’ को जिन्होंने करीब से महसूस किया है, वे जानते हैं कि पुराने समय की गालियां भले ही किसी ‘पीआर एजेंसी’ से प्रशिक्षित नहीं थीं , लेकिन उनमें वीभत्स रस का इतना प्रचुर निवेश था कि सुनने वाला अपमानित हो या न हो, आस-पास खड़े लोग जरूर सन्न रह जाते थे। उनमें अलंकार और आक्रमण की तीव्रता बहुत ज्यादा होती थी। उनका उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी का ‘चरित्र-मर्दन’ और ‘मनोबल-भंजन’ होता था।
अब भाषा नहीं, कंटेंट हैं गालियां
आज की गालियां बदल गई हैं। अब वे मुंह से कम, कमेंट सेक्शन से ज्यादा निकलती हैं। वहीं उनका स्थायी पता है। गाली अब भाषा नहीं, कंटेंट है। एडिट होती है, रीपोस्ट होती है, वायरल होती है। उसके भी व्यू हैं, रीच है, एंगेजमेंट है। लगता है, उसने भी क्रिएटर इकोनामी में अपना स्टार्टअप खोल लिया है।
चाहें तो हम और आप लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि मान लें। गालियां अब व्यक्तिगत नहीं रहीं। वे सामूहिक पाठ बन गई हैं। नारे लोकतंत्र की आवाज थे, गालियां उनका लाउडस्पीकर बन बैठी हैं। जिसे भी मन हो, इस्तेमाल कर ले रहे हैं। कोई रॉयल्टी नहीं, कोई कॉपीराइट नहीं। गाली देकर भागने की भी जरूरत नहीं, ‘सेंड’ दबाकर आदमी ऑनलाइन ही बैठा रहता है। याददाश्त में रहने वाली गालियां सर्वर में सांस ले रही हैं।
मेरे एक परिचित ने बताया कि उनके बेटे की शादी में किसी ने एक भी पारंपरिक गाली नहीं दी। मैंने पूछा, "फिर शादी कैसे हुई?" उन्होंने कहा, "सब मोबाइल में व्यस्त थे। एक फूफा जी बार-बार मुस्कुरा रहे थे। हमें लगा, सामने बैठे समधी पर हंस रहे हैं। बाद में पता चला कि वे किसी अजनबी को कमेंट में गालियां दे रहे थे।"
मुझे पहली बार लगा कि अब बिना गाली बोले भी ‘गाली’ दी जा सकती है। एक इमोजी काफी है। एक मीम काफी है। मुझे ‘जेन-जी पीढ़ी ‘ से कोई शिकायत नहीं है। इस पीढ़ी ने गालियों का आविष्कार नहीं किया। हार्डवेयर हमारा था। इस पीढ़ी ने केवल नया सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कर दिया। अपडेट मुफ्त था।
आने वाले दिनों में लोक साहित्य के शोधकर्ता बड़ी परेशानी में पड़ेंगे। वे गांव-गांव घूमकर पूछेंगे, "पुरानी शादी की गालियां सुनाइए।" लोग कहेंगे, "वह तो दादी के साथ चली गई। चाहें तो कमेंट सेक्शन दिखा देते हैं।" लेकिन कमेंट सेक्शन में लोक नहीं है। वहां केवल भीड़ है। भीड़ बिना पहचाने गाली देती है।
मेरी परेशानी यह है कि अब मैं गालियों के मामले में अनपढ़ हो गया हूं। हमारे जमाने में जितनी गालियां प्रचलन में थीं, उनका सामान्य ज्ञान लगभग पूरा था। शादी में कौन सी गाली कब बोली जाएगी, इसका मोटा-मोटा पाठ्यक्रम मालूम था। होली का प्रश्नपत्र भी अनुमान से हल हो जाता था। हमारे समय में गाली, गाली होती थी और तारीफ, तारीफ। अब दोनों ने गठबंधन कर लिया है।
पहले गाली देने में मेहनत लगती थी। आदमी सामने खड़ा होता था। आवाज ऊंची करनी पडती थी। अब केवल अंगूठा चलता है और गाली महाद्वीप पार कर जाती है। मुझे डर है कि आने वाले दिनों में बच्चे अपने दादा से पूछेंगे, "दादाजी, क्या आपके जमाने में लोग बिना वाईफाई के भी गालियां दे लेते थे?"
दादा मुस्कुराकर कहेंगे, "हां बेटा, और सामने देखकर देते थे।" बच्चा पूछेगा, "फिर स्क्रीनशॉट कौन लेता था?" दादा चुप हो जाएंगे।
गालियों का बदल गया है पता
लोग कहते हैं, समाज बदल गया है। मुझे लगता है, समाज नहीं, गालियों का पता बदल गया है। वे समधिन के आंगन से उठकर कमेंट सेक्शन में आ बसी हैं। यह संकट गालियों का नहीं है। संकट यह है कि हमारी असहमति से आत्मीयता गायब हो गई है। जब तर्क कमजोर पडते हैं तो गालियां मजबूत होने लगती हैं।
फिर भी मैं आशावादी हूं। यह वही देश है , जिसने हर गंभीर विषय पर संगोष्ठी करने की अद्भुत परंपरा विकसित की है। इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन किसी भव्य सभागार में राष्ट्रीय संगोष्ठी होगी। विषय होगा-"डिजिटल भारत में गालियों का समावेशी विकास : चुनौतियां और संभावनाएं।" मुख्य अतिथि के नाम पर विचार होगा।
औकती झा होते, तो मैं सबसे पहले उनका नाम प्रस्तावित करता। वे नहीं हैं, लेकिन अपने यहां गाली वीरों की कमी नहीं है। मुख्य अतिथि आएंगे और कहेंगे, "लोकगालियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए।" एक विशेषज्ञ बताएंगे कि एआई अब ऐसी गालियां तैयार कर सकता है, जो सुनने वाले की उम्र, विचारधारा और मनोदशा के अनुसार अपने आप बदल जाएं।
अध्यक्ष महोदय उच्चस्तरीय समिति बनाएंगे। बाकी काम... कमेंट सेक्शन कर देगा, क्योंकि इस देश में हर बहस का अंतिम तर्क आजकल कमेंट सेक्शन ही लिखता है।
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