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जीवन धारा: वर्तमान से आगे देखने की नजर, भविष्य केवल अतीत की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि एक नई रचना
कार्ल गुस्टाफ युंग
Published by: Pavan
Updated Sat, 04 Apr 2026 08:17 AM IST
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सार
जब हम सचेत होकर जीना शुरू करते हैं, तब हमें यह एहसास होता है कि भविष्य केवल अतीत की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि एक नई रचना है, जिसे हम अपने विचारों, कर्मों और जागरूकता से आकार दे सकते हैं।
अमर उजाला
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बहुत-से लोग अपने मन का उपयोग करने से बचते हैं, जैसे सोचने-समझने की क्षमता उनके लिए कोई बोझ हो। और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपने मन का इस्तेमाल तो करते हैं, परंतु ऐसे ढंग से कि उनकी सोच दिशाहीन और अविवेकपूर्ण लगती है। यह स्थिति केवल अज्ञानता का परिणाम नहीं है, बल्कि एक गहरी मानसिक आदत का भी संकेत है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को जानने व समझने का प्रयास ही नहीं करता।
आश्चर्य तो तब होता है, जब हम देखते हैं कि कई बुद्धिमान और जागरूक दिखने वाले लोग भी अपनी इंद्रियों का सही इस्तेमाल नहीं करते। वे अपनी आंखों के सामने उपस्थित वास्तविकताओं को ही नहीं देख पाते। ऐसा लगता है, मानो वे जीवन को सच में जी ही नहीं रहे, बल्कि केवल उसके ऊपर से गुजर रहे हैं। इस प्रकार वे अपने ही अस्तित्व से कटे हुए रहते हैं। यह अलगाव धीरे-धीरे उन्हें एक ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंचा देता है जहां वे वर्तमान को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं, अर्थात जो आज है, वही हमेशा रहेगा।
उनके लिए न कोई नया कल है, न कोई नई संभावना। वे कल्पनारहित हो जाते हैं, और उनका जीवन केवल इंद्रियों से प्राप्त सीमित अनुभवों तक सिमट जाता है। उनके संसार में न तो अवसरों का कोई स्थान होता है, और न ही परिवर्तन की कोई गुंजाइश। पर वास्तविकता इससे अलग है।
जीवन परिवर्तनशील है। हर क्षण अपने भीतर अनगिनत संभावनाएं छिपाए हुए है। यदि हम अपनी चेतना को जागृत करें, अपने भीतर झांकें, और अपने अनुभवों को समझने का प्रयास करें, तो हम पाएंगे कि जीवन स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है।
मनुष्य के भीतर असीम विकास की क्षमता है। आवश्यकता केवल अपने मन, इंद्रियों और चेतना का सही उपयोग करने की है। जब हम सचेत होकर जीना शुरू करते हैं, तब हमें यह एहसास होता है कि भविष्य केवल अतीत की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि एक नई रचना है, जिसे हम अपने विचारों, कर्मों और जागरूकता से आकार दे सकते हैं।
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आश्चर्य तो तब होता है, जब हम देखते हैं कि कई बुद्धिमान और जागरूक दिखने वाले लोग भी अपनी इंद्रियों का सही इस्तेमाल नहीं करते। वे अपनी आंखों के सामने उपस्थित वास्तविकताओं को ही नहीं देख पाते। ऐसा लगता है, मानो वे जीवन को सच में जी ही नहीं रहे, बल्कि केवल उसके ऊपर से गुजर रहे हैं। इस प्रकार वे अपने ही अस्तित्व से कटे हुए रहते हैं। यह अलगाव धीरे-धीरे उन्हें एक ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंचा देता है जहां वे वर्तमान को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं, अर्थात जो आज है, वही हमेशा रहेगा।
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उनके लिए न कोई नया कल है, न कोई नई संभावना। वे कल्पनारहित हो जाते हैं, और उनका जीवन केवल इंद्रियों से प्राप्त सीमित अनुभवों तक सिमट जाता है। उनके संसार में न तो अवसरों का कोई स्थान होता है, और न ही परिवर्तन की कोई गुंजाइश। पर वास्तविकता इससे अलग है।
जीवन परिवर्तनशील है। हर क्षण अपने भीतर अनगिनत संभावनाएं छिपाए हुए है। यदि हम अपनी चेतना को जागृत करें, अपने भीतर झांकें, और अपने अनुभवों को समझने का प्रयास करें, तो हम पाएंगे कि जीवन स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है।
मनुष्य के भीतर असीम विकास की क्षमता है। आवश्यकता केवल अपने मन, इंद्रियों और चेतना का सही उपयोग करने की है। जब हम सचेत होकर जीना शुरू करते हैं, तब हमें यह एहसास होता है कि भविष्य केवल अतीत की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि एक नई रचना है, जिसे हम अपने विचारों, कर्मों और जागरूकता से आकार दे सकते हैं।