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मुद्दा: अल्पसंख्यक मानक पर हो पुनर्विचार

डॉ. सुरजीत सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Sat, 04 Apr 2026 09:27 AM IST
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सार

भारत में जनसंख्या का वितरण राज्य से राज्य व जिले से जिले में बदलता रहता है। फिर, किसी क्षेत्र में कोई समुदाय 50 फीसदी से ज्यादा है, तो उसे अल्पसंख्यक कैसे माना जा सकता है?

minority status in country should reconsider for defferener geography blog
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

वित्तीय वर्ष 2025 और 2026 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के लिए बढ़ता बजटीय प्रावधान पहली दृष्टि में सकारात्मक संकेत अवश्य देता है, किंतु जब संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता, तो एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या समस्या धन की कमी की है या फिर नीतिगत संरचना की खामियों की? अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़े आंकड़ों और जमीनी वास्तविकता के बीच की खाई का कारण कहीं न कहीं ‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा और उससे जुड़े मानकों की सीमाएं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर 50 प्रतिशत से कम आबादी को आधार मानकर बनाई गई मौजूदा नीति, भारत जैसे विविध और संघीय ढांचे में आवश्यकताओं व क्षेत्रीय असमानताओं को ठीक से प्रतिबिंबित नहीं कर पा रही है। नतीजतन, संसाधनों का वितरण न तो प्रभावी बन पाता है और न ही न्यायसंगत।
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के विचारों ने इस मुद्दे की जटिलता को और साफ कर दिया। न्यायालय का एक पक्ष अल्पसंख्यक की पहचान को व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की वकालत, तो दूसरा पक्ष इसे कानूनी संरचना और सांविधानिक सीमाओं के भीतर परिभाषित करने पर जोर दे रहा था। इससे साफ है कि केवल न्यायिक व्याख्याओं के सहारे इस संवेदनशील विषय का स्थायी हल संभव नहीं है। इसी संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से बाहर कर दिया। स्पष्ट है कि वर्तमान में अल्पसंख्यक मानक केवल सांविधानिक अधिकारों का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह संसाधनों के न्यायसंगत वितरण, सामाजिक संतुलन और प्रशासनिक दक्षता से भी गहराई से जुड़ चुका है।
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भारत में जनसंख्या का वितरण राज्य से राज्य और जिले से जिले में बदलता रहता है। फिर, यदि किसी क्षेत्र में कोई समुदाय 50 फीसदी से अधिक है, तो वह प्रभावशाली स्थिति में होता है। ऐसे में, उसे ‘अल्पसंख्यक’ मानकर विशेष संरक्षण देना नीति-न्याय के सिद्धांत पर सवाल खड़ा करता है, खासकर तब, जब सिख, जैन, बौद्ध या पारसी जैसे समुदाय संख्या और प्रतिनिधित्व की दृष्टि से सीमित हों। 

शीर्ष न्यायालय ने टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक के ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर तय करना अधिक तार्किक और सांविधानिक है, क्योंकि शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों का लागू होना राज्य के दायरे में ही होता है। यदि इस सिद्धांत को सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह मानना जरूरी है कि ‘अल्पसंख्यक’ कोई तय और स्थायी श्रेणी नहीं है, बल्कि एक बदलती हुई सामाजिक अवधारणा है, जो क्षेत्रानुसार अलग-अलग हो सकती है। 
स्थानीय जनसांख्यिकी, सामाजिक संरचना और वास्तविक वंचना की स्थिति को सटीक रूप से समझने के लिए अल्पसंख्यक की अवधारणा को क्षेत्रीय संदर्भ में पुनर्परिभाषित किया जाए और उसे धर्म के साथ आय, शिक्षा, लैंगिक समानता व क्षेत्रीय विकास सूचकांकों को आधार बनाया जाए। यही दृष्टिकोण सामाजिक न्याय, आर्थिक दक्षता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।

 
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