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जीवन धारा: संतुष्टि संभावनाओं को खत्म कर देती है; सूत्र- लक्ष्य निर्धारित करें
सिल्विया प्लाथ
Published by: Pavan
Updated Mon, 30 Mar 2026 07:49 AM IST
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सार
लोग खुश दिखते हैं। लेकिन अगर खुशी का अर्थ सिर्फ अपनी वर्तमान स्थिति में पूरी तरह संतुष्ट हो जाना है, जहां सब कुछ सहज और तयशुदा लगे, तो ऐसी संतुष्टि का कोई मतलब नहीं रह जाता।
जीवन धारा: संतुष्टि संभावनाओं को खत्म कर देती है
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मेरी जिंदगी किसलिए है, और मैं इसके साथ क्या करने वाली हूं? मुझे नहीं पता, और यही अनजानपन मुझे डराता है। मैं कभी उन सारी किताबों को नहीं पढ़ पाऊंगी, जिन्हें मैं पढ़ना चाहती हूं। पूरी जिंदगी नहीं जी पाऊंगी, जो मैं जीना चाहती हूं। मैं कभी खुद को उन सभी हुनर में माहिर नहीं बना पाऊंगी, जो मैं सीखना चाहती हूं। फिर मैं ऐसा क्यों चाहती हूं? मैं अपनी जिंदगी में मुमकिन हर तरह के मानसिक और शारीरिक अनुभव के हर रंग, हर सुर और हर रूप को जीना और महसूस करना चाहती हूं। लेकिन सच्चाई यह है कि मैं सीमित हूं, बहुत सीमित। हालांकि, मैं अयोग्य नहीं हूं। मैं न तो अपंग हूं, न अंधी, न ही बुद्धिहीन। मैं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हूं, जो अपने शरीर की अक्षमता के कारण जीवन से कट गया हो। मैं कोई ऐसा भी नहीं हूं, जो अपनी मानसिक स्थिति के कारण दुनिया से बेगाना हो चुका हो। मेरे पास जीने के लिए बहुत कुछ है, और फिर भी न जाने क्यों, मेरे भीतर एक अजीब-सी उदासी और थकान घर कर जाती है।
शायद इस भावना की जड़ इस बात में छिपी है कि मुझे कई विकल्पों में से किसी एक को चुनना पसंद नहीं। हर चुनाव मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं अपने बाकी सारे संभावित रूपों को खो रही हूं। शायद इसी कारण मैं सब कुछ बनना चाहती हूं, हर किसी जैसी होना चाहती हूं, ताकि मुझे अपने ‘मैं’ होने की जिम्मेदारी न उठानी पड़े। ताकि कोई मुझ पर यह आरोप न लगा सके कि मैंने खुद को सीमित कर लिया है। ताकि मुझे अपने चरित्र, अपने विचारों और अपने जीवन-दर्शन को गढ़ने का भार न उठाना पड़े।
लोग खुश दिखते हैं। लेकिन अगर खुशी का अर्थ सिर्फ अपनी वर्तमान स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट हो जाना है, जहां सब कुछ सहज और तयशुदा लगे, तो ऐसी संतुष्टि में न कोई बेचैनी बचती है, न सवाल, न ही कोई संघर्ष। वहां जिज्ञासा के लिए भी कोई जगह नहीं रह जाती। मैं ऐसी संतुष्टि नहीं चाहती, क्योंकि मेरे लिए यह एक ठहराव है, एक तरह की कैद है। हर व्यक्ति किसी एक दिशा में आगे बढ़ता है, किसी एक विचार को पकड़कर जीवन को अर्थ देता है, और फिर कहता है कि उसने खुद को पा लिया है। लेकिन क्या सच में खुद को पा लेना ही अंतिम संतोष है? या यह स्वीकार करना है कि हम केवल एक ही प्रकार के अस्तित्व में बंधे हुए हैं? जब हम खुद को एक रूप में सीमित कर लेते हैं, तो क्या हम यह नहीं मान लेते कि हमारे भीतर जो अनगिनत संभावनाएं थीं, वे अब कभी साकार नहीं होंगी?
यही विचार मुझे विचलित करता है। मैं अपने भीतर की हर संभावना को जीना चाहती हूं, हर दिशा में फैलना चाहती हूं। लेकिन जीवन की सच्चाई यह है कि हर रास्ता चुनने के साथ हम कई और रास्तों को छोड़ देते हैं। और शायद इसे खोने का एहसास, इस अपूर्णता की टीस, मेरे भीतर इस बेचैनी और उदासी को जन्म देती है। -द अनएब्रिज्ड जर्नल्स ऑफ सिल्विया प्लाथ के अनूदित अंश
सूत्र- लक्ष्य निर्धारित करें
तुम्हारी बेचैनी ही तुम्हारी जागरूकता है, और यही तुम्हें साधारण नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण जीवन की ओर ले जाती है। सच्ची खुशी का अर्थ केवल अनुकूल परिस्थितियों में सहज रहना नहीं, बल्कि मुश्किलों के बीच भी विकास और अर्थ खोजने की क्षमता रखने में है। हमेशा आगे बढ़ने के लिए छोटे और स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें।
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शायद इस भावना की जड़ इस बात में छिपी है कि मुझे कई विकल्पों में से किसी एक को चुनना पसंद नहीं। हर चुनाव मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं अपने बाकी सारे संभावित रूपों को खो रही हूं। शायद इसी कारण मैं सब कुछ बनना चाहती हूं, हर किसी जैसी होना चाहती हूं, ताकि मुझे अपने ‘मैं’ होने की जिम्मेदारी न उठानी पड़े। ताकि कोई मुझ पर यह आरोप न लगा सके कि मैंने खुद को सीमित कर लिया है। ताकि मुझे अपने चरित्र, अपने विचारों और अपने जीवन-दर्शन को गढ़ने का भार न उठाना पड़े।
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लोग खुश दिखते हैं। लेकिन अगर खुशी का अर्थ सिर्फ अपनी वर्तमान स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट हो जाना है, जहां सब कुछ सहज और तयशुदा लगे, तो ऐसी संतुष्टि में न कोई बेचैनी बचती है, न सवाल, न ही कोई संघर्ष। वहां जिज्ञासा के लिए भी कोई जगह नहीं रह जाती। मैं ऐसी संतुष्टि नहीं चाहती, क्योंकि मेरे लिए यह एक ठहराव है, एक तरह की कैद है। हर व्यक्ति किसी एक दिशा में आगे बढ़ता है, किसी एक विचार को पकड़कर जीवन को अर्थ देता है, और फिर कहता है कि उसने खुद को पा लिया है। लेकिन क्या सच में खुद को पा लेना ही अंतिम संतोष है? या यह स्वीकार करना है कि हम केवल एक ही प्रकार के अस्तित्व में बंधे हुए हैं? जब हम खुद को एक रूप में सीमित कर लेते हैं, तो क्या हम यह नहीं मान लेते कि हमारे भीतर जो अनगिनत संभावनाएं थीं, वे अब कभी साकार नहीं होंगी?
यही विचार मुझे विचलित करता है। मैं अपने भीतर की हर संभावना को जीना चाहती हूं, हर दिशा में फैलना चाहती हूं। लेकिन जीवन की सच्चाई यह है कि हर रास्ता चुनने के साथ हम कई और रास्तों को छोड़ देते हैं। और शायद इसे खोने का एहसास, इस अपूर्णता की टीस, मेरे भीतर इस बेचैनी और उदासी को जन्म देती है। -द अनएब्रिज्ड जर्नल्स ऑफ सिल्विया प्लाथ के अनूदित अंश
सूत्र- लक्ष्य निर्धारित करें
तुम्हारी बेचैनी ही तुम्हारी जागरूकता है, और यही तुम्हें साधारण नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण जीवन की ओर ले जाती है। सच्ची खुशी का अर्थ केवल अनुकूल परिस्थितियों में सहज रहना नहीं, बल्कि मुश्किलों के बीच भी विकास और अर्थ खोजने की क्षमता रखने में है। हमेशा आगे बढ़ने के लिए छोटे और स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें।