बेंगलुरु की त्रासदी से सिस्टम पर उठते सवाल: क्या आत्महत्या ही एकमात्र समाधान है?
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह एक सिस्टम की विफलता है। यह दिखाती है कि हमारा समाज अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लेता। शारीरिक बीमारी पर हम अस्पताल दौड़ते हैं, दवाएं लेते हैं, छुट्टी लेते हैं। लेकिन चिंता, डिप्रेशन, एंग्जायटी को हम ‘माइंड सेट’ या ‘कमजोरी’ समझते हैं। “हिम्मत रखो”, “सब ठीक हो जाएगा”,
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भारत की आईटी राजधानी के नाम से जाने जाना वाला बेंगलुरु, पिछले 24 घंटों में एक ऐसी घटना से हिल गया है जो न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है। 31 मार्च 2026 को कोठानूर इलाके के एक हाई-राइज अपार्टमेंट में एक युवा तकनीकी जोड़ी ने आत्महत्या कर ली। पति भानुचंद्र रेड्डी (32) और पत्नी बीबी शाजिया सिराज (31)। दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे, दोनों की कमाई अच्छी थी, अमेरिका में नौकरी के अनुभव के साथ वे बेंगलुरु शिफ्ट हुए थे। 80 लाख रुपये का वार्षिक पैकेज, अमेरिका में घर, शादी के पांच साल, कोई बच्चा नहीं। बाहरी तौर पर वे सब कुछ रखते थे जो सफलता की परिभाषा मानी जाती है। लेकिन अंदर से? बस एक चिंता, नौकरी खोने की।
भानुचंद्र रेड्डी अमेरिका में काम करते थे। एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के कारण छंटनी हुई और उनकी नौकरी चली गई। भारत लौटकर वे दूसरी नौकरी की तलाश में लगे, लेकिन असफल रहे। चिंता बढ़ती गई। स्वास्थ्य की समस्या भी जुड़ गई। उन्होंने सुसाइड नोट में यही लिखा, नौकरी की चिंता और बढ़ता तनाव। पत्नी शाजिया आईबीएम में नई नौकरी कर रही थीं। सुबह 7:30 बजे नाइट शिफ्ट से लौटीं तो पति का कमरा अंदर से बंद मिला। सुरक्षा गार्डों ने दरवाजा तोड़ा, भानुचंद्र फांसी पर लटक रहे थे। शाजिया ने 20 मिनट तक वहां खड़े रहकर सब कुछ देखा। फिर वे चुपचाप लिफ्ट से 18वें फ्लोर पर चली गईं और कूद गईं।
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह एक सिस्टम की विफलता है। यह दिखाती है कि हमारा समाज अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लेता। शारीरिक बीमारी पर हम अस्पताल दौड़ते हैं, दवाएं लेते हैं, छुट्टी लेते हैं। लेकिन चिंता, डिप्रेशन, एंग्जायटी को हम ‘माइंड सेट’ या ‘कमजोरी’ समझते हैं। “हिम्मत रखो”, “सब ठीक हो जाएगा”, “दूसरों से क्या कहेंगे”, ये वाक्य आज भी सबसे पहले सुनाई देते हैं। नतीजा? भानुचंद्र जैसा युवा, जो एआई की वजह से नौकरी गंवाकर चिंता में डूब गया और शाजिया जैसी पत्नी, जो अचानक पति की मौत सहन नहीं कर सकीं।
आंकड़ों की बात करें तो भारत में आत्महत्या के ये आंकड़े डरावने हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2023 में 1,71,418 आत्महत्याएं हुईं। प्रति लाख जनसंख्या पर दर 12.4 से ऊपर पहुंच चुकी है। आईटी सेक्टर में 2017 से 2025 तक 227 से ज्यादा रिपोर्टेड सुसाइड केस सामने आए हैं। युवा प्रोफेशनल्स, खासकर 25-40 साल के, जहां नौकरी की अनिश्चितता, एआई से छंटनी, प्रदर्शन का दबाव और लोन-ईएमआई का बोझ है, वहां यह आंकड़ा और बढ़ रहा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे शहरों में हर महीने ऐसे केस आते रहते हैं। फिर भी हम चुप हैं।
समस्या सिर्फ नौकरी खोने की नहीं है। समस्या है उस ‘चुप्पी’ की, जो मानसिक बीमारी को स्वीकार नहीं करती। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे बताता है कि 80 प्रतिशत लोग मानसिक बीमारी का इलाज नहीं लेते। वजह? स्टिग्मा, जागरूकता की कमी और सुविधाओं का अभाव। भारत में मनोचिकित्सकों की संख्या बेहद कम है। प्रति लाख जनसंख्या पर सिर्फ 0.75 साइकिएट्रिस्ट हैं। जिला स्तर पर मनोवैज्ञानिक क्लिनिक नाममात्र के हैं। नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम (NMHP) 1982 से चल रहा है, लेकिन उसकी पहुंच गांव-कस्बों तक नहीं पहुंची। प्राइवेट अस्पतालों में सेशन महंगे हैं। एक घंटे की काउंसलिंग के 1500-3000 रुपये, जो कि मध्यम वर्ग के लिए एक बोझ है।
अब सवाल यह है कि क्या हम इस त्रासदी से कुछ सीखेंगे? क्या हम मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य की तरह देखना शुरू करेंगे? जवाब हां होना चाहिए। हमें एक मजबूत ‘साइकोलॉजिकल इकोसिस्टम’ की जरूरत है, ठीक वैसे ही जैसे सामान्य अस्पतालों का नेटवर्क है। इसके लिए हमें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।
सरकार को चाहिए कि हर जिले में कम से कम एक फुल-टाइम मेंटल हेल्थ सेंटर बनाना चाहिए, जहां साइकिएट्रिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, काउंसलर और सोशल वर्कर उपलब्ध हों। ओपीडी फ्री या बहुत सस्ती हो। टेली-मेंटल हेल्थ सर्विस को और मजबूत करें, ताकि ग्रामीण इलाकों तक पहुंच हो। मानसिक स्वास्थ्य बीमा को आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में अनिवार्य शामिल करें।
इसके साथ ही कॉर्पोरेट जगत को भी पहल करनी होगी। आईटी कंपनियां, जहां छंटनी सबसे ज्यादा होती है, वहां कर्मचारी सहायता कार्यक्रम (ईएपी) अनिवार्य करें। हर कर्मचारी को साल में कम से कम चार काउंसलिंग सेशन मुफ्त मिलें। लेआउफ के समय ‘आउटप्लेसमेंट सपोर्ट’ के साथ मानसिक सहायता भी दी जाए। एआई छंटनी को देखते हुए स्किल री-ट्रेनिंग के साथ मेंटल रेजिलिएंस ट्रेनिंग भी जरूरी की जाए।
स्कूल-कॉलेज स्तर पर मेंटल हेल्थ एजुकेशन अनिवार्य हो। “डिप्रेशन है तो डॉक्टर के पास जाओ” यह बात बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक समझ आए। मीडिया को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। आत्महत्या की खबरें संवेदनशील तरीके से दें, बढ़ा-चढ़ा कर नहीं। परिवारों में खुलकर बात करने का माहौल बने।
हमें यह समझना होगा कि मानसिक बीमारी कोई ‘पाप’ या ‘कमजोरी’ नहीं है। डायबिटीज है तो इंसुलिन लेते हैं, हार्ट अटैक है तो स्टेंट लगवाते हैं। तो एंग्जायटी या डिप्रेशन होने पर इलाज क्यों नहीं करवाते? जब हम यह मान लेंगे कि मानसिक बीमारी भी अन्य बीमारियों की तरह ही है, तभी लोग बिना संकोच के विशेषज्ञों की मदद मांगेंगे। भानुचंद्र की तरह चुपचाप चिंता में डूबने की बजाय वे समय रहते मदद ले पाएंगे। शाजिया की तरह अचानक पति की मौत का सदमा अकेले नहीं झेलना पड़ेगा।
यह बदलाव आसान नहीं है। इसमें सरकार, निजी क्षेत्र, एनजीओ और आम नागरिक सभी को साथ आना होगा। लेकिन अगर हम आज नहीं बदले तो कल और कई भानुचंद्र-शाजिया हमें छोड़कर चले जाएंगे। बेंगलुरु की यह घटना सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक पुकार है।
हमारे युवा देश की ताकत हैं। वे आईटी, स्टार्टअप, इंजीनियरिंग में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन अगर उनके मन की सेहत की अनदेखी की गई तो यह ताकत कमजोर पड़ जाएगी। मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना अब कोई ‘विलासिता’ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जरूरत है।
जब हम अस्पतालों की तरह ‘मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों’ का जाल बिछाएंगे, जब हर गांव-शहर में काउंसलर उपलब्ध होंगे, जब इस पर लगा स्टिग्मा मिटेगा, तभी ऐसी त्रासदियां कम होंगी। भानुचंद्र और शाजिया की याद में हम यह बदलाव शुरू करें। क्योंकि वे सिर्फ एक जोड़ी नहीं थे। वे हजारों उन युवाओं का प्रतिनिधित्व थे, जो आज भी चुपचाप चिंता में जूझ रहे हैं। समय आ गया है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को एक ही सिक्के के दो पहलू मानें। तभी हम एक स्वस्थ, सशक्त भारत बना पाएंगे।
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