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क्या ईरान से जीत नहीं पाया अमेरिका: 13 हजार एयरक्राफ्ट, 100x रक्षा बजट, फिर क्यों मैदान छोड़ रहे ट्रंप?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 01 Apr 2026 07:14 PM IST
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सार

इस्राइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के एक महीने बाद अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस संघर्ष से बाहर निकलने के संकेत दे रहे हैं। उन्होंने हाल ही में कहा है कि अमेरिका होर्मुज संकट के समाधान के बिना ही युद्ध से निकल सकता है। ट्रंप बार-बार यह कहते रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान में अपने सारे लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। हालांकि, ईरान अब भी न सिर्फ इस्राइल और पश्चिम एशिया के सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है, बल्कि अपनी शासन व्यवस्था के भी पहले की तरह ही बरकरार रहने की बात कह रहा है। 

US Israel vs Iran War West Asia Conflict Donald Trump Hormuz Strait Gulf Countries NATO Global Superpower Fire
अमेरिका को ईरान से युद्ध में हथियारों का भारी नुकसान। - फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार

इस्राइल-अमेरिका की तरफ से 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध को अब एक महीने से ज्यादा का समय हो चुका है। इस युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को इशारा किया कि अमेरिका जल्द ही ईरान युद्ध से बाहर निकल सकता है। उन्होंने साफ किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाए बिना ही युद्ध का अंत किया जा सकता है। ट्रंप के बयान के बाद अटकलें हैं कि अब ईरान में युद्ध का अंत जल्द हो सकता है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज न खुलवा पाना अमेरिका के लिए एक बड़ी नाकामी के तौर पर देखा जा रहा है। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर दुनिया के सबसे ताकतवर देश की शक्ति ईरान के मकाबले कितनी ज्यादा है? इस जबरदस्त ताकत के बावजूद अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाने में अब तक नाकाम क्यों रहा है? ईरान अपनी किन खासियतों और रणनीतियों का फायदा उठाने में सफल रहा है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- ईरान के मुकाबले कितना ताकतवर है अमेरिका?

आंकड़ों के लिहाज से अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी ओर ईरान अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण एक बेहद गंभीर चुनौती पेश करता रहा है, जो दोनों देशों की सैन्य ताकत में अंतर को काफी हद तक पाट देती है। हालांकि, युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका लगातार ईरान की नौसेना से लेकर वायुसेना और सैन्य बलों को बड़े नुकसान पहुंचाने का दावा करता रहा है।

रैंकिंग और रक्षा बजट 
'ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग 2026' के मुताबिक, अमेरिका दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो ईरान के नौ अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है।

सैनिक बल
अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं, ईरान के पास 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं। कुल मिलाकर एक पूर्ण युद्ध में अमेरिका के करीब 20 लाख और ईरान के 10 लाख सैनिक मैदान में उतर सकते हैं। 

ये भी पढ़ें: क्या US का यू-टर्न?: 'अमेरिकी सैनिक दो-तीन हफ्ते में ईरान छोड़ेंगे'; एक माह से जारी जंग के बीच ट्रंप का बयान

वायु सेना
अमेरिका के पास 13,000 से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि उसे दुनिया की सबसे बड़ी और उन्नत वायुसेना बनाते हैं। अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पांचवीं पीढ़ी के विमान हैं। इनमें एफ-22 रैप्टर और एफ-35 मौजूद हैं। दूसरी ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं।

नौसेना
समुद्री ताकत में अमेरिका का दबदबा बहुत बड़ा है। अमेरिकी नौसेना के पास 465 पोत हैं, जिनमें 11 विमानवाहक पोत, 66 सबमरीन और 83 विध्वंसक शामिल हैं। इसके मुकाबले ईरान के पास 109 नौसैनिक पोत मौजूद हैं, जिनमें 25 पनडुब्बियां और 21 गश्ती जहाज शामिल हैं। ईरान के पास एक भी विमानवाहक पोत या विध्वंसक नहीं है।

थल सेना 
अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियां हैं। वहीं, ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं। इसके अलावा, आर्टिलरी और रॉकेट प्रोजेक्टर्स के मामले में भी अमेरिका की संख्या ईरान से अधिक है।

मिसाइलें और ड्रोन 
अमेरिका के पास 25,000 से 30,000 घातक मिसाइलें हैं। इसके जवाब में ईरान के पास लगभग 3,000 बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही अनुमानित जखीरा है। इसके बावजूद ईरान ने इन्हें क्षेत्रीय स्तर पर इस्तेमाल कर अमेरिका के साथी देशों- यूएई, सऊदी, कतर, कुवैत, आदि पर निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया है। यानी कम संसाधनों के बावजूद ईरान का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने का है। 

दूसरी तरफ जहां अमेरिका इस संघर्ष में अपने सबसे उन्नत और महंगे ड्रोन्स, जैसे- एमक्यू-9 रीपर ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहा है, वहीं ईरान के पास एक बड़ी ताकत उसके सस्ते लेकिन बेहद खतरनाक आत्मघाती कामिकाजे ड्रोन्स, जैसे- शाहेद 136 हैं, जो लंबी दूरी के हमलों में सक्षम हैं। अमेरिका ने इसके जवाब में शाहेद की तर्ज पर ही लुकास ड्रोन्स युद्ध में उतारे हैं। लेकिन इनकी संख्या ईरान के जखीरे में रखे ड्रोन्स के बराबर नहीं है। 

ये भी पढ़ें: 'ईरान ने युद्धविराम का किया अनुरोध': ट्रंप ने सामने रखी शर्त, कहा- होर्मुज खोलने पर ही करेंगे सीजफायर पर विचार

ताकत में इतने फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे खड़ा है ईरान? 

अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य ताकत में भारी अंतर होने के बावजूद ईरान मुख्य रूप से अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित युद्ध की क्षमताओं के कारण युद्ध में डटा हुआ है। ईरान जानता है कि वह अमेरिका को सीधे सैन्य युद्ध में नहीं हरा सकता, इसलिए उसने अपने भूगोल और दबाव बनाने की क्षमता को हथियार बना लिया है। 

1. भूगोल को हथियार बनाना
ईरान की सबसे बड़ी ताकत होर्मुज जलडमरूमध्य है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के कई क्षेत्रों के लिए अहम ऊर्जा गलियारा माना जाता है। यहां से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया है, जिससे वैश्विक तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। ईरान इस भौगोलिक लाभ का उपयोग करके पूरी दुनिया और अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव बना रहा है। 



इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के सीनियर फेलो रूबेन स्टीवर्ट का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास के द्वीपों पर अमेरिकी सेना का उतरना संभव है, लेकिन किसी भी द्वीप को कुछ दिनों से अधिक समय तक नियंत्रण में रखना बहुत मुश्किल होगा। वे स्पष्ट करते हैं कि यह बेहद असंभव लगता है कि सैन्य दृष्टिकोण से इससे कुछ भी हासिल किया जा सकता है। 

गल्फ न्यूज के एक लेख में कहा गया है कि ईरान जानता है कि वह अमेरिका को सैन्य रूप से नहीं हरा सकता, इसलिए उसने होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम व्यापारिक मार्ग को नियंत्रित करके अपने भूगोल को ही एक हथियार में बदल दिया है। इस स्थिति को संक्षेप में बताते हुए कहा गया है कि ताकत लड़ाइयां जीतती है, लेकिन दबाव युद्ध के नतीजे तय करता है।

2. गैर-बराबरी वाला युद्ध और प्रॉक्सी नेटवर्क
ईरान अमेरिका से सीधे टकराने के बजाय अलग-अलग तरीकों से पलटवार कर रहा है। ईरान पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों (प्रॉक्सी गुटों) का इस्तेमाल कर रहा है। उदाहरण के लिए, यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इस्राइल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा, ईरान खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को ड्रोन हमलों का निशाना बना रहा है।

रिटायर्ड मरीन कोर जनरल जनरल केनेथ एफ. मैकेंजी जूनियर का कहना है कि अमेरिकी सेना ईरान के मुख्य तेल निर्यात केंद्र खर्ग द्वीप पर कब्जा करके ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से ठप कर सकती है और इसे एक बातचीत के जरिए के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि, कई पूर्व और वर्तमान रक्षा अधिकारियों का मानना है कि ईरान को इसका आर्थिक झटका लगने से पहले ही होर्मुज या कोई और मार्ग के बंद होने और संभावित ईरानी जवाबी हमलों की वजह से वैश्विक तेल बाजारों में भारी संकट पैदा हो जाएगा।
 

3. अमेरिका की दुविधा का फायदा
ईरान की रणनीति इस युद्ध में अमेरिका को हराने की नहीं, बल्कि केवल खुद को बचाने की है, जिसे वह अपनी जीत मानता है। दूसरी ओर, अमेरिका के पास ईरान के खर्ग द्वीप या होर्मुज में सैन्य कार्रवाई करने की ताकत तो है, लेकिन इसमें अमेरिकी सैनिकों की जान जाने का जोखिम बहुत ज्यादा है। अमेरिका के लिए इस राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक कीमत को चुकाना बहुत मुश्किल है। 

ड्यूक यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर पीटर फीवर का मानना है कि अमेरिका भले ही ईरान को भारी नुकसान पहुंचा रहा है, लेकिन अमेरिका खुद भी इस युद्ध का दर्द- महंगाई और वैश्विक आर्थिक दबाव के रूप में महसूस कर रहा है। वे कहते हैं कि ईरान को यह संदेश मिल रहा है कि उनकी केवल खड़े रहने की रणनीति उनके लिए जीत होगी शायद काम कर रही है। ईरान को लगता है कि डटे रहने से उसे बेहतर समझौता मिल सकता है।

सबसे ताकतवर देश की युद्ध से निकलने की रणनीति क्यों?

सैन्य ताकत में बेजोड़ होने के बावजूद, अमेरिका के लिए इस युद्ध की आर्थिक और राजनीतिक कीमत काफी ज्यादा हो चुकी है। इसी दबाव के कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जल्द ही युद्ध से बाहर निकलने और अपनी सेना वापस बुलाने पर विचार कर रहे हैं। 

1. वैश्विक और घरेलू अर्थव्यवस्था पर भारी असर (तेल की कीमतें)
ईरान के होर्मुज बंद करने का असर यह हुआ है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं और अमेरिका में भी 2022 के बाद पहली बार पेट्रोल की कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन के पार चली गई है। इतना ही नहीं अमेरिकी शेयर बाजार भी बुरे दौर से गुजर रहे हैं, जो कि आर्थिक विकास को धीमा होने के संकेत हैं। दूसरी तरफ ट्रंप चाहते हैं कि शेयर बाजार में फिर से उछाल आए और तेल की कीमतें जल्द से जल्द नीचे गिरें। ऐसे में अमेरिका इस युद्ध से निकलने के तरीकों पर भी विचार कर रहा है।

2. राजनीतिक जोखिम और चुनाव
अमेरिकी जनता इस युद्ध की आर्थिक कीमत पेट्रोल पंपों और किराने की दुकानों पर रोजमर्रा की महंगाई के रूप में चुका रही है। होर्मुज बंद होने की वजह से कई अहम आपूर्तियां भी बंद हो गई हैं। इनमें दवा के लिए सामग्री से लेकर और अहम जरूरत के सामान शामिल हैं। इस बीच अमेरिका में मध्यावधि चुनाव करीब आ रहे हैं, ऐसे में युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकती है। 

3. अमेरिकी कॉरपोरेट और डाटा सेंटर्स पर हमले की धमकी
ईरान ने लड़ाई को सैन्य ठिकानों से आगे ले जाते हुए पश्चिम एशिया में स्थित अमेरिकी टेक कंपनियों जैसे माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, एपल, इंटेल, अमेजन, आईबीएम समेत 20 कंपनियों के डाटा सेंटर्स पर बड़े हमले करने की चेतावनी दी है। इससे दुनिया भर में इंटरनेट और तकनीकी सेवाएं ठप होने का खतरा है, जो अमेरिका के लिए एक अलग तरह की चुनौती है। ईरान ने इसे लेकर बुधवार को ही खाड़ी देशों को 24 घंटे की डेडलाइन जारी कर दी है।

इसके अलावा ईरान के पास खाड़ी देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की भी क्षमता है, जिससे वह इन देशों की आय के स्रोतों को भी खत्म कर सकता है। 

 

4. अमेरिकी सैनिकों की जान का डर

अगर अमेरिका ईरान पर जमीनी हमला करता है, तो ईरान ने बेहद खतरनाक रणनीति अपनाने की चेतावनी दी है। मध्यस्थों के अनुसार, ईरान ने धमकी दी है कि वह अपनी ही धरती पर कारपेट बॉम्बिंग करेगा और अपने ही बुनियादी ढांचे को उड़ा देगा, ताकि वहां आने वाले अमेरिकी सैनिकों को मारा जा सके। बताया जा रहा है कि ट्रंप इतने बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैनिकों की जान जाने का राजनीतिक जोखिम नहीं उठाना चाहते।

फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की सीनियर फेलो एम्मा सैल्सबरी के मुताबिक, अगर राष्ट्रपति ट्रंप युद्ध को बढ़ाते हुए खाड़ी में किसी ईरानी द्वीप पर कब्जा करने के लिए सैनिकों को उतारते हैं तो यह अमेरिका के लिए विनाशकारी हो सकता है। उनका कहना है कि यह बहुत भयानक रूप से गलत साबित होगा और इसमें अमेरिकी सैनिकों की भारी संख्या में जान जाने का खतरा है।

5. हथियारों का नुकसान
लगातार बमबारी के कारण अमेरिकी सेना के हथियारों का स्टॉक तेजी से कम हो रहा है। अमेरिका को डर है कि हथियारों, जहाजों और सैनिकों की इस कमी के कारण वह चीन जैसे अन्य बड़े वैश्विक खतरों से निपटने में कमजोर पड़ सकता है। दरअसल, हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका को इस संघर्ष में बहरीन, यूएई, कतर समेत कुछ देशों में रडार की तबाही झेलनी पड़ी है। इसके अलावा उसका एक थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम का रडार भी तबाह हुआ है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका ने ईरान पर करीब 850 टॉमहॉक मिसाइलों का इस्तेमाल किया है और अब उसका मिसाइल स्टॉक भी तेजी से कम हो रहा है। इनमें हर एक मिसाइल की कीमत करीब 20 लाख डॉलर है, जो कि अमेरिका के युद्ध खर्च को भी बढ़ाने वाला साबित हो रहा है।  



ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में अमेरिका ने अब तक अपने कई एयरक्राफ्ट भी गंवाए हैं। इनमें लड़ाकू विमानों से लेकर रिफ्यूलर और अवाक्स विमान भी शामिल हैं। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका इस युद्ध में ड्रोन्स समेत करीब 20 से ज्यादा एयरक्राफ्ट गंवा चुका है और उसका नुकसान 1.4 अरब डॉलर से लेकर 2.9 अरब डॉलर के बीच का हो सकता है। 



ट्रंप का मानना है कि अमेरिका ने ईरान की रक्षा क्षमताओं को 90% तक नष्ट कर दिया है (हालांकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक यह केवल एक-तिहाई है) और उन्होंने कहा है कि सबसे मुश्किल काम हो चुका है। उनका मानना है कि अमेरिका ने अपना काम कर दिया है और अब यूरोप (जैसे फ्रांस) या अन्य देशों को अपने तेल के लिए खुद लड़ना सीखना होगा। इसलिए, वे 'मिशन पूरा होने' का दावा करके 2-3 हफ्ते में सेना को वापस बुलाने का विकल्प देख रहे हैं।


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