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जीवन धारा: भविष्य के शिल्पकार आप स्वयं हैं, न बनाएं परिस्थितियों का बहाना
जीन-पॉल सार्त्र
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Thu, 15 Jan 2026 07:24 AM IST
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सार
यदि अर्थ पहले से तय होता, तो मनुष्य केवल एक मशीन होता। अर्थहीनता ही उसे यह साहस देती है कि वह अपने कर्मों, संघर्षों और प्रतिबद्धताओं के माध्यम से स्वयं अर्थ रचे।
परिस्थितियों का बहाना न बनाएं
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
क्या हो सकता था-इस पर पछतावा करना ऊर्जा की बर्बादी है, क्योंकि मनुष्य का सत्य अतीत की संभावनाओं में नहीं, बल्कि उसके किए गए कर्मों में बसता है। मनुष्य स्वतंत्रता को विरासत में नहीं पाता, बल्कि वह स्वतंत्रता के खुले आकाश में जन्म लेता है और वहीं पलता-बढ़ता है। यह स्वतंत्रता कोई उत्सव नहीं, कोई आरामदेह उपहार नहीं, बल्कि एक अपरिहार्य अवस्था है-ऐसी अवस्था, जिससे पलायन असंभव है।
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जैसे ही मनुष्य इस संसार में प्रवेश करता है, उसी क्षण से वह अपने हर निर्णय, कर्म और मौन की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा लेता है। वह यह नहीं कह सकता कि परिस्थितियों ने उसे बाध्य किया, क्योंकि बाध्यता भी एक चुनाव है और मौन एक निर्णय। मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और फिर, अपने कर्मों की लौ से, स्वयं को परिभाषित करता है। उसके लिए कोई पहले से लिखा हुआ अर्थ नहीं, कोई तयशुदा नियति नहीं, जो उसे यह बताए कि उसे क्या होना चाहिए। वह जो करता है, वही बनता है, क्योंकि उसका लक्ष्य जन्म से निर्धारित नहीं होता; वह अपने कर्मों के माध्यम से उसे गढ़ता है। उसका हर चुनाव निजी नहीं रहता, बल्कि वह मानवता के लिए भी एक उद्घोष बन जाता है कि मनुष्य कैसा हो सकता है और उसे कैसा होना चाहिए। यही स्वतंत्रता मनुष्य को भयभीत करती है और इसीलिए वह चाहता है कि कोई नियम, कोई ईश्वर, कोई व्यवस्था उसके निर्णयों का बोझ उठा ले, पर सत्य यह है कि ऐसा कोई सहारा नहीं है।
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जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि उसके पास कोई बहाना नहीं, कोई ऊंची सत्ता नहीं, जिसे दोष दिया जा सके, तब वह अपने नग्न अस्तित्व के सामने खड़ा होता है और वहीं से चिंता जन्म लेती है। पर यह चिंता कमजोरी नहीं, चेतना का प्रमाण है और यह उस गरिमा की घोषणा है, जो केवल जागरूक मनुष्य को प्राप्त होती है। अक्सर वह कहता है, ‘मैं तो ऐसा ही हूं’ या ‘परिस्थितियां ऐसी थीं’, अथवा ‘समाज ने मुझे ऐसा बना दिया।’ लेकिन यह खुद से ही छलावा है, क्योंकि हर क्षण उसके पास चुनने की शक्ति है, और उस शक्ति से इन्कार करना भी एक चुनाव है।
जीवन अपने आप में अर्थहीन है और यही उसकी सबसे बड़ी संभावना है। यदि अर्थ पहले से तय होता, तो मनुष्य केवल एक मशीन होता, निर्देशों पर चलने वाली वस्तु। पर अर्थहीनता ही उसे यह साहस देती है कि वह अपने कर्मों, अपने संघर्षों और अपनी प्रतिबद्धताओं के माध्यम से स्वयं अर्थ रचे। मनुष्य अकेला है, पर यह अकेलापन निराशा नहीं, बल्कि यह सृजन का स्थल है। इसी अकेलेपन में वह स्वयं को रचता है, स्वयं को ऊंचा उठाता है। वह जो चुनता है, वही बनता है और यही उसकी गरिमा है कि बिना किसी गारंटी, बिना किसी अंतिम सत्य के, फिर भी वह अर्थ चुनने का साहस करता है। जीवन का अर्थ दिया नहीं जाता, बल्कि जीवन का अर्थ बनाया जाता है। और यह जिम्मेदारी किसी और की नहीं, केवल हमारी है।
परिस्थितियों का बहाना न बनाएं
मनुष्य स्वतंत्रता के साथ नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की जिम्मेदारी के साथ जन्म लेता है। हर निर्णय, हर मौन, हर कदम उसका खुद का चुनाव है। परिस्थितियां बहाना हो सकती हैं, पर कारण नहीं। अर्थ हमें खोजने नहीं, रचने होते हैं। अकेलापन अभिशाप नहीं, बल्कि आत्म-सृजन का अवसर है। जो हम चुनते हैं, वही बनते हैं।