{"_id":"69bd1be48a3d22525e03c462","slug":"west-bengal-assembly-election-2026-trinamool-congress-infighting-latest-news-2026-03-20","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: सड़कों पर विकराल रूप में नजर आ रही है टीएमसी की अंतर्कलह","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: सड़कों पर विकराल रूप में नजर आ रही है टीएमसी की अंतर्कलह
विज्ञापन
सार
2016 और 2021 में टीएमसी की टिकट से वंचित होने वाले उम्मीदवारों की संख्या कम थी इसलिए विरोध व विद्रोह विकराल रूप धारण नहीं किया था। जबकि 2026 में स्थिति भिन्न है, इस दफे 4 मंत्री सहित 74 विधायकों (33%) का टिकट कटा है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
- फोटो : ANI
विज्ञापन
विस्तार
10 साल पहले अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी ने जब बंगाल विधानसभा चुनाव 2016 के उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की थीं और जिन लोगों को टिकट नहीं मिला था तब उन्होंने कहा था कि चुनाव के बाद विधान परिषद की गठन करूंगी। जिन्हें टिकट नहीं मिला है उन्हें दुखी और चिंतित होने की जरूरत नहीं है, यह लोग विधान परिषद के जरिये सदन में जाएंगे।
Trending Videos
गौरतलब है कि राज्य में 1952 में आधिकारिक तौर पर विधान परिषद का गठन किया गया था। पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 21 मार्च 1969 को संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत परिषद को समाप्त करने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। भारतीय संसद ने अनुरोध को मंजूरी दे दी और परिषद को 1 अगस्त 1969 को भंग कर दिया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
हालांकि 2021 में ममता सरकार ने इसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रस्ताव पारित किया था लेकिन संसद में स्वीकृति के लिए लंबित है।
2016 और 2021 में टीएमसी की टिकट से वंचित होने वाले उम्मीदवारों की संख्या कम थी इसलिए विरोध व विद्रोह विकराल रूप धारण नहीं किया था। जबकि 2026 में स्थिति भिन्न है, इस दफे 4 मंत्री सहित 74 विधायकों (33%) का टिकट कटा है।
15 विधायकों (7%) का विधानसभा सीट बदला गया है। मौजूदा 135 विधायकों (60%) को टिकट मिला है जबकि 141 नये चेहरे (47.95%) को टिकट मिला है। लगभग आधे उम्मीदवार नए हैं, लिहाजा पुराने व कुछ नए जिन्हें नहीं मिला है, जमकर गदर काट रहे हैं।
राज्य का शायद ही ऐसा कोई जिला नहीं बचा है, जहां से सड़कों पर खुलेआम विरोध प्रदर्शन की खबरें नहीं आ रही हों। जहां जिस उम्मीदवार को टिकट मिला है, उसके समर्थक और विरोधी आपस में ही भिड़ने को तैयार दिख रहे हैं, कई जगहों पर तो दंगे जैसी स्थिति दिखने लगी है।
कई नामचीनों को इस बार नहीं मिला टिकट
भाजपा में मंत्री नहीं बनाए जाने पर नाराज बाबुल सुप्रियो पार्टी बदलकर टीएमसी का दामन थाम ममता सरकार में मंत्री बन गए थे। बाबुल सुप्रियो को मंत्रिमंडल और विधानसभा से बाहर का रास्ता दिखाकर राज्यसभा भेज दिया गया है। साथ ही तीन अन्य मंत्रियों को भी टिकट से हाथ धोना पड़ा है।
जिन 74 विधायकों को इस दफे टिकट नहीं मिला है उनमें नामचीन लोगों में पार्थो चट्टोपाध्याय, डॉ सुदीप्तो रॉय, माणिक भट्टाचार्य, जीवन कृष्ण साहा, डॉ रत्ना दे नाग, असित मजूमदार, मनोज तिवारी, विवेक गुप्ता, कृष्णेन्दू नारायण चौधरी, परेश पाल, तपन दास गुप्ता, मनोरंजन व्यापारी, कल्याण घोष, साबित्री मित्रा, कंचन मल्लिक और चिरंजीत चक्रवर्ती शामिल हैं।
टीएमसी टिकट से वंचित फेहरिस्त में चर्चित शोवन चटर्जी और वैशाखी बनर्जी का भी नाम शामिल है। जिनके नामों को लेकर चर्चा व उत्सुकता दोनों ही थी। इसके अलावा सीपीएम से टीएमसी में आये प्रतिकुर रहमान, बीजेपी से टीएमसी में आई पर्णो मित्रा, पार्टी प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती, ऋज्जु दत्तो, सुदीप्ता बख्शी, श्रावन्ति चटर्जी, इमन चक्रवर्ती और परमब्रत चट्टोपाध्याय का नाम शामिल है जिन्हें टिकट मिलने की पूरी संभावना थी।
15 विधायकों का जिनका चुनाव क्षेत्र बदला गया है उनमें रत्ना चटोपाध्याय को बेहला पूर्व से बेहला पश्चिम भेजा गया है। यह शोवन चटर्जी की विवाहिता हैं और पति पत्नी में दूरी व अलगाव की वजह वैशाखी बनर्जी ही हैं। शोभन देव चट्टोपाध्याय को खरदह से बालीगंज, पूर्व आईपीएस हुमायूं कबीर को डेबरा से डोमकल और शौकत मोल्ला को कैनिंग से भांगर भेजा गया है।
टीएमसी समर्थक और इनका विरोध
कैनिंग और भांगर दोनों ही जगह विरोध प्रदर्शन बेकाबू है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक रैली में कहा था कि ममता बनर्जी जब चुनाव में जेल गए नेताओं को उम्मीदवार नहीं बनाएंगी तब माना जायेगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं। जबकि, राशन घोटाला में जेल गए ज्योतिप्रिय मल्लिक को हाबरा और अनिसुर रहमान को देगंगा से पार्टी उम्मीदवार बनाई है।
बहरहाल, ऐसा नहीं है कि किसी सियासी दल में टिकट काटे जाने का यह पहला मामला है। टिकट हमेशा बंटते-कटते रहते हैं और हर दल में होता रहा है। कुछ मामलों में जिसका टिकट काटा जाता है उनके समर्थक मौखिक या प्रतीकात्मक विरोध करते हैं। हालांकि टीएमसी के समर्थकों का विरोध कभी भी मौखिक नहीं रहा है, वो सीधे तौर पर हिंसा पर उतारू होते हुए दिखते हैं।
वैसे ये विरोध पहले बीजेपी, कम्युनिस्ट या कांग्रेस के खिलाफ होता था। पर इस बार टीएमसी कार्यकर्ता और समर्थक ही आपस में जुझारू तौर पर लड़ते-भिड़ते दिख रहे हैं।
चौतरफा लड़ाई लड़ रहीं ममता बनर्जी के लिए ये शुभ संकेत तो नहीं ही कहा जा सकता लेकिन यह भी सच है कि ममता बनर्जी ने ही अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को अराजक विचारधारा में संपोषित किया है, हिंसा के लिए उकसाया है और इन्हीं अराजक व्यवस्था के नाम पर सत्तासीन होती रहीं हैं।
अब वही अराजकता इनके लिए इस बार के चुनाव से पहले ही सरदर्द बनती हुई दिख रही है। इस बार के चुनाव में असहज महसूस कर रही ममता बनर्जी के लोग ही ममता बनर्जी के खिलाफत में दिख रहे हैं और बगावती तेवर भी दिखा रहे हैं।
---------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।