पश्चिम बंगाल सियासी ड्रामा: आखिर क्यों खंड-खंड हो रही टीएमसी?
Bengal TMC Crisis: तृणमूल कांग्रेस 15 वर्षों तक सत्ता में रही। यही सत्ता उसके संगठनात्मक अंतर्विरोधों को ढकने का सबसे बड़ा कारण थी। सत्ता का आकर्षण और सत्ता का भय दोनों ने नेताओं को पार्टी में बनाए रखा। जो नेता पार्टी छोड़कर गए, उनके साथ प्रशासन और पुलिस का व्यवहार कैसा रहा, यह किसी से छिपा नहीं है
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Bengal TMC Crisis: तृणमूल कांग्रेस का पूरा नाम ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस है, लेकिन चुनाव आयोग से उसे क्षेत्रीय दल की मान्यता प्राप्त है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में एक राजनीतिक दल थी या फिर एक निजी कंपनी की तरह संचालित होने वाला संगठन? आलोचकों का आरोप रहा है कि इसकी चेयरपर्सन ममता बनर्जी थीं, मैनेजिंग डायरेक्टर अभिषेक बनर्जी, जबकि निर्णय प्रक्रिया पर एक सीमित समूह का प्रभाव था।
तृणमूल कांग्रेस 15 वर्षों तक सत्ता में रही। यही सत्ता उसके संगठनात्मक अंतर्विरोधों को ढकने का सबसे बड़ा कारण थी। सत्ता का आकर्षण और सत्ता का भय दोनों ने नेताओं को पार्टी में बनाए रखा। जो नेता पार्टी छोड़कर गए, उनके साथ प्रशासन और पुलिस का व्यवहार कैसा रहा, यह किसी से छिपा नहीं है। शुभेंदु अधिकारी से लेकर अर्जुन सिंह तक अनेक नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें राजनीतिक रूप से निशाना बनाया गया और विभिन्न मामलों में उलझाया गया।
पार्टी से अलग होने वाले प्रमुख नेताओं पर नजर डालें तो 2017 में मुकुल रॉय, 2019 में अर्जुन सिंह, 2020 में शुभेंदु अधिकारी, शिशिर अधिकारी, दिव्येंदु अधिकारी, सब्यसाची दत्ता और जितेंद्र तिवारी, 2021 में दिनेश त्रिवेदी, सोनाली गुहा और राजीव बनर्जी, तथा 2024 में तापस रॉय ने तृणमूल कांग्रेस का साथ छोड़ा। इनमें से कुछ नेता बाद में परिस्थितिवश वापस भी लौटे।
ममता बनर्जी के पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों को लेकर यह शिकायत लंबे समय से रही कि अभिषेक बनर्जी के दौर में उनकी भूमिका सीमित होती चली गई। स्वयं ममता बनर्जी भी सार्वजनिक रूप से यह कह चुकी हैं कि कई लोग उनसे अभिषेक को राजनीति से दूर रखने की सलाह देते थे। दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी की अपनी एक टीम थी, जो संगठन और सत्ता दोनों में प्रभावशाली मानी जाती थी। लेकिन आज वही टीम लगभग अदृश्य दिखाई दे रही है।
डायमंड हार्बर में अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के दौरान और उसके बाद भी उनके कई करीबी नेता सक्रिय नहीं दिखे। इसके पीछे एक कारण यह भी माना जा सकता है कि इन नेताओं ने अपना राजनीतिक भविष्य अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व से जोड़ रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि ममता बनर्जी के बाद वही पार्टी और सरकार का नेतृत्व करेंगे। सत्ता परिवर्तन के साथ यह संभावना भी कमजोर पड़ गई।
यदि इस टूट और बिखराव के लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाए, तो आरोपों का केंद्र अभिषेक बनर्जी बनते हैं। उनकी कार्यशैली को लेकर पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेता सहज नहीं थे। ममता बनर्जी का प्रभाव और प्रशासनिक कार्रवाई का भय असंतोष को दबाए हुए था। सत्ता से बेदखली के साथ ही यह भय समाप्त हो गया और वर्षों से जमा असंतोष बाहर आने लगा।
सत्ता गंवाने के 48 घंटे के भीतर ममता बनर्जी ने अपने आवास पर विधायकों की बैठक बुलाई। बताया जाता है कि 80 विधायकों में से केवल 19 विधायक ही पहुंचे। 2 जून के धरना-प्रदर्शन में भी 120 जनप्रतिनिधियों में से मात्र 14 की उपस्थिति दर्ज हुई। 29 लोकसभा सांसदों में केवल 2 और 13 राज्यसभा सांसदों में केवल 4 सांसद मौजूद थे। यह उपस्थिति स्वयं संगठन की मौजूदा स्थिति का संकेत देती है।
यह घटनाक्रम पहली नजर में महाराष्ट्र की राजनीति जैसा दिखाई देता है, लेकिन दोनों परिस्थितियों में मूलभूत अंतर है। महाराष्ट्र में दल-बदल का उद्देश्य सत्ता में भागीदारी हासिल करना था, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में है। ऐसे में टूटकर अलग होने वाले नेताओं के सामने तत्काल सत्ता प्राप्ति का अवसर नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति की भूमिका है।
ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की नजर में इस घटनाक्रम के प्रमुख सूत्रधार ऋतोब्रत्तो बंदोपाध्याय हो सकते हैं, लेकिन असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है। इतनी बड़ी संख्या में विधायक और नेता क्यों अलग हुए? अल्पसंख्यक समुदाय के विधायक भी इस प्रक्रिया में क्यों शामिल हुए? अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाने वाले नेता भी क्यों दूर हो गए?
इन सवालों का सबसे बड़ा उत्तर शायद यही है कि पार्टी के भीतर संवाद और असहमति की गुंजाइश लगातार कम होती गई। निर्णय प्रक्रिया कुछ व्यक्तियों तक सीमित होती चली गई। जब कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता, तब संगठन धीरे-धीरे राजनीतिक दल से अधिक एक नियंत्रित संरचना में बदल जाता है। और ऐसी संरचनाओं का बिखराव अक्सर अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा असंतोष का परिणाम होता है।
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