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नई पीढ़ी की चुनौतियां: तापसी पन्नू को सुनिए, आभासी कैदखाने से बाहर निकलिए

Girish Upadhyay गिरीश उपाध्याय
Updated Tue, 02 Jun 2026 03:21 PM IST
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सार

आज की पीढ़ी स्वस्थ दिखने की अंधी दौड़ में अपना वास्तविक स्वास्थ्य ही खोती जा रही है। और उनकी इस सनक ने दुनिया में अरबों खरबों रुपये का कारोबार खड़ा कर दिया है।

Taapsee Pannu said donot torture yourself for Instagram-perfect photos
तापसी पन्नू - फोटो : इंस्टाग्राम-@taapsee
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विस्तार

सिनेमा के परदे पर अलग-अलग भूमिकाओं में कमाल की प्रतिभा दिखाने वाली मशहूर अभिनेत्री तापसी पन्नू का एक ताजा बयान खासतौर से युवा पीढ़ी और सोशल मीडिया के एडिक्ट हो गए लोगों को बहुत ध्यान से पढ़ना चाहिए।



वे चेतावनी दे रही हैं कि- ‘’बनावटी रूप से सुंदर दिखने और 'इंस्टाग्राम परफेक्ट' तस्वीरों के लिए अपने शरीर पर अत्याचार करना बंद कीजिए।"
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पन्नू के बयान की लाइन से मेल खाता हुआ एक और बयान पिछले दिनों आया था जिसमें बीते जमाने की शानदार अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि कहती हैं- ‘’आज कई कलाकार वास्तविक काम के बजाय केवल सतही प्रचार और दृश्यता के सहारे 'लाइमलाइट' में बने रहना चाहते हैं।‘’
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ये दोनों बातें केवल फिल्मी दुनिया तक सीमित नहीं हैं। यदि गहराई से देखें तो ये हमारे समय के एक बड़े सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट की ओर संकेत करती हैं। ये बयान उस बहुआयामी अदृश्य कारागार को उजागर करते हैं, जिसमें आज की युवा पीढ़ी स्वेच्छा से कैद हो चुकी है। एक ऐसी संस्कृति, जहां व्यक्ति की वास्तविक पहचान, प्रतिभा और व्यक्तित्व से अधिक महत्व उसकी 'डिजिटल पैकेजिंग' और बाहरी प्रदर्शन को मिलने लगा है।

'फ्लैट मिडरिफ' की सनक और वास्तविकता

फैशन, फिटनेस उद्योग और सोशल मीडिया जगत में नाभि और कमर के आसपास के हिस्से को बिल्कुल समतल, बिना किसी उभार के दिखाने को 'फ्लैट मिडरिफ', 'परफेक्ट टमी' या 'जीरो बेली' कहा जाता है। तापसी पन्नू ने खुलकर स्वीकार किया कि इस आदर्श छवि को पाने के लिए उन्होंने खुद को शारीरिक रूप से अत्यधिक प्रताड़ित किया और घंटों जिम में बिताए।

जबकि पोषण विशेषज्ञों और स्त्री रोग विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं के पेट के निचले हिस्से में थोड़ा उभार होना न केवल सामान्य है, बल्कि उनके जैविक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। यह हल्का उभार केवल फैट का जमा होना नहीं बल्कि नाजुक अंगों की सुरक्षा के लिए प्रकृति द्वारा बनाया गया एक सुरक्षा कवच है। जब युवा अत्यधिक व्यायाम या कम कैलोरी वाले खान-पान से इसे जबरन हटाने का प्रयास करते हैं, तो एक तरह से प्रकृति के विरुद्ध जाकर खुद के ही शरीर को नुकसान पहुंचा रहे होते हैं। 

सुंदरता का नया कारागार 

विडंबना यह है कि आज की पीढ़ी स्वस्थ दिखने की अंधी दौड़ में अपना वास्तविक स्वास्थ्य ही खोती जा रही है। और उनकी इस सनक ने दुनिया में अरबों खरबों रुपये का कारोबार खडा कर दिया है। वैश्विक स्तर पर 'ब्यूटी एंड वेलनेस' का बाजार आज 600 अरब डॉलर से भी अधिक का हो चुका है।

कॉस्मेटिक सर्जरी, स्किन ट्रीटमेंट, वजन घटाने वाले कृत्रिम उत्पाद, एआई-आधारित फिल्टर और फिटनेस ऐप्स का यह विशाल साम्राज्य केवल उत्पाद नहीं बेच रहा, बल्कि यह 'असुरक्षा की भावना' बेच रहा है। बाजार ने एक नया दबाव निर्मित किया है- "हर समय अच्छा दिखो और दुनिया को दिखाते रहो कि तुम अच्छे दिख रहे हो।"

पहले सौंदर्य प्रसाधनों का उद्देश्य त्वचा को साफ और स्वस्थ रखना होता था। लेकिन आज, कैमरे के लिए शरीर को जबरन एक खास सांचे में ढाला जा रहा है। पहले कपड़े शरीर के लिए बनते थे, अब शरीर को कपड़ों के हिसाब से बदला जा रहा है। यह केवल कॉस्मेटिक बदलाव नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त जैविक संरचना के खिलाफ एक अवांछित संघर्ष है।

तुलना का लोकतंत्रीकरण और 'कम्पैरिजन फटीग'

मनोविज्ञान में 'Social Comparison Trap' यह बताता है कि मनुष्य अपने मूल्यांकन के लिए दूसरों से तुलना करता है। पूर्व की पीढ़ियों में यह तुलना मोहल्ले, स्कूल या दफ्तर के सीमित दायरे तक होती थी। परंतु आज, सोशल मीडिया ने तुलना का वैश्वीकरण या लोकतंत्रीकरण कर दिया है।

एक किशोर सुबह उठते ही इंस्टाग्राम पर लॉस एंजेलिस के मॉडल, सियोल के के-पॉप स्टार और मुंबई के इन्फ्लुएंसर्स या बॉलीवुड स्टार्स को एक साथ देखता है। लेकिन वह जिस ‘सौंदर्य’ को देखता है, वह दरअसल फिल्टर, फोटो एडिटिंग, एआई रीटचिंग और विशेष प्रकाश व्यवस्था का परिणाम होती है।

इस छद्म जाल को दर्शक परम सत्य मान लेता है। लगातार ऐसे, कभी हासिल न किए जा सकने वाले मानकों से तुलना करते रहने के कारण, युवाओं का मस्तिष्क 'Comparison Fatigue' (तुलना की थकान) का शिकार हो जाता है, जो अंततः आत्म-अस्वीकृति और गहरे अवसाद में बदल जाता है।

नई पीढ़ी का संकट: जब प्रतिभा हार मान ले

इस आत्म-अस्वीकृति के भाव से ही इस विषय का सबसे डरावना और संवेदनशील पहलू शुरू होता है, जो युवा मनोविज्ञान और अवसाद के गहरे कारणों की ओर इशारा करता है। कुछ वर्ष पहले पत्रकारिता के विद्यार्थियों के साथ चर्चा के दौरान मुझे एक ही ऐसा अनुभव हुआ था जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था।

टेलीविजन पत्रकारिता और एंकरिंग के व्यावहारिक पक्षों पर बातचीत चल रही थी, तभी एक होनहार छात्रा ने बेहद सहज लेकिन गहरे दर्द के साथ कहा-"सर, टीवी एंकर के लिए मेरा सिलेक्शन तो कभी होगा ही नहीं, क्योंकि मेरा रंग काला है और मैं सुंदर भी नहीं हूँ।" एक पल के लिए तो इस कथन पर सन्नाटा छा गया। कुछ सूझा ही नहीं कि उस छात्रा को क्या जवाब दिया जाए। 

उस छात्रा ने अपनी भाषा, ज्ञान, अभिव्यक्ति, क्षमता या मेहनत के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी त्वचा के रंग के आधार पर अपने भविष्य का फैसला पहले ही कर लिया था। वह अपनी योग्यता साबित करने की दौड़ में उतरने से पहले ही मानसिक रूप से हार मान चुकी थी। यह केवल एक छात्रा की कहानी नहीं है।

यह नई पीढ़ी की उस मूक विवशता और अंतर्द्वंद्व की अभिव्यक्ति है, जो विज्ञापन उद्योग, मनोरंजन जगत और सोशल मीडिया के रूढ़ सौंदर्य मानकों के कारण उनके अवसाद का कारण बन रही है। 

जब कोई युवा अपने सपनों को अपने चेहरे और रंग-रूप के हिसाब से तौलने लगे, तो यह तय मानिये कि सौंदर्य के बाजार का भ्रम उसके आत्मविश्वास को भीतर से खोखला कर चुका है। यही कारण है कि तापसी पन्नू की बात केवल पेट के एक हिस्से तक सीमित नहीं है, वह उस पूरी व्यवस्था को चुनौती देती है जो युवाओं को यह विश्वास दिलाती है कि आगे बढ़ने के लिए आंतरिक क्षमता से पहले बाहरी सांचे में फिट होना जरूरी है।

'स्नैपचैट डिस्मॉर्फिया' और डॉपामिन इकॉनमी

यह मामला केवल संचार या मीडिया जैसे प्रदर्शनमुखी कॅरियर से ही नहीं जुड़ा है। ग्लोबल डिजिटल संस्कृति ने चेहरों के प्रति भी एक नया मानसिक विकार पैदा किया है, जिसे 'स्नैपचैट डिस्मॉर्फिया' कहा जाता है। यह 'बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर' (BDD) का ही एक आधुनिक रूप है। इसमें व्यक्ति अपने वास्तविक चेहरे से नफरत करने लगता है और प्लास्टिक सर्जनों के पास मोबाइल ऐप के फिल्टर द्वारा बनाई गई अपनी कृत्रिम तस्वीर लेकर जाता है कि मुझे ऐसा चेहरा चाहिए।

दक्षिण कोरिया में किशोरावस्था पूरी होने पर प्लास्टिक सर्जरी को एक सामान्य पारिवारिक उपहार माना जाता है। चीन में 'A4 वेस्ट चैलेंज' और 'कॉलरबोन चैलेंज' जैसी अस्वस्थ प्रतिस्पर्धाओं ने युवाओं को अस्वस्थ और दुबलेपन की ओर धकेला है।

हमारे भारत के महानगरों में त्वचा गोरी करने, चेहरे की बनावट बदलने और 'कैमरा फ्रेंडली' बनने के कॉस्मेटिक उपचारों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है।यह संकट अब केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। युवाओं में 'सिक्स पैक एब्स' और उभरी मांसपेशियों की चाह का दबाव इस कदर बढ़ चुका है कि वे जिम में अनियंत्रित सप्लीमेंट्स और हानिकारक स्टेरॉयड का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स मूलतः 'अटेंशन इकोनॉमी' पर काम करते हैं। हर एक 'लाइक' मस्तिष्क में जुए की लत की तरह 'डॉपामिन' प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। जब हमारे आत्मसम्मान की चाबी लाइक्स की संख्या पर निर्भर हो जाती है, तब व्यक्ति यह सोचना बंद कर देता है कि "मैं कौन हूँ?" इसके बजाय वह इस प्रश्न पर जीने लगता है कि "लोग मुझे क्या समझते हैं?" 

यहीं से मीनाक्षी शेषाद्रि की चेतावनी का असली अर्थ सामने आता है। जब समाज का ध्यान कला और कौशल से हटकर केवल प्रदर्शन पर टिक जाता है, तो व्यक्ति की बहुआयामी पहचान सिमटकर 'फ्लैट आइडेंटिटी' (एकआयामी छवि) में बदल जाती है।

Taapsee Pannu said donot torture yourself for Instagram-perfect photos
तापसी पन्नू - फोटो : इंस्टाग्राम @taapsee

चुनौतियां और अनुत्तरित प्रश्न

इस डिजिटल चक्रव्यूह ने हमारे सामने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब ढूंढना होगा। भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यदि हमारी युवा पीढ़ी अपनी ऊर्जा और बुद्धिमत्ता को विज्ञान, नवाचार, साहित्य और उद्यमशीलता में लगाने के बजाय केवल अपनी डिजिटल छवि चमकाने में खर्च करेगी, तो इस राष्ट्रीय क्षति की भरपाई कैसे होगी?

यह मानसिक महामारी का मौन आमंत्रण है। विश्वभर के अध्ययनों में पाया गया है कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने वाले युवाओं में चिंता, अवसाद, अकेलापन और आत्मसम्मान की कमी जैसी गंभीर मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। 

एक मामला पहचान के संकट का भी है। जब कोई युवा सौंदर्य के रूढ़ मानकों के दबाव में आकर अपने सपनों का गला घोंटने लगे, तो इस व्यवस्था का दोषी किसे माना जाए- खुद को कमतर आंकने वाले युवा को या उस समाज को जो लगातार यह नैरेटिव गढ़ रहा है?

डिजिटल वेलनेस और आत्मस्वीकृति 

इस आभासी मरुस्थल से बाहर निकलने का रास्ता तकनीक को छोड़ देने में नहीं, बल्कि तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग और 'डिजिटल वेलनेस' को अपनाने में है। इसके लिए सार्थक कदम यही होगा कि शरीर से संवाद करें और वह जैसा भी है आपका है यह मानते हुए उसका सम्मान करें। व्यायाम स्वास्थ्य और आंतरिक स्फूर्ति के लिए करें, न कि किसी सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर की अंधी नकल के लिए। शरीर को प्रकृति का सहयोगी समझें, कोई अधूरी 'प्रोजेक्ट फाइल' नहीं।

इसके अलावा फिल्टर मुक्त ऑफलाइन जीवन बिताने की कला सीखें। अपनी वास्तविक दुनिया में ऑफलाइन मित्रता, पढ़ाई, खेल, कला और रचनात्मक विधाओं को समय दें। तुलना का पैमाना बदलें। अपनी तुलना दूसरों के 'संपादित जीवन' से करने के बजाय अपने स्वयं के बीते हुए कल से करें।

इसीके समानांतर यह जानना भी जरूरी है कि युवा क्या न करें।  वे लाइक्स को आत्ममूल्य न बनने दें। सोशल मीडिया के लाइक्स या कमेंट्स आपके आत्मसम्मान के निर्णायक नहीं हो सकते और न ही आपकी प्रतिभा अथवा योग्यता का कोई पैमाना बन सकते हैं। ट्रेंड के दबाव से बचना होगा। सोशल मीडिया पर चलने वाले अस्वस्थ और खतरनाक बॉडी चैलेंजेस या डाइटिंग ट्रेंड्स का हिस्सा न बनें।

दुनिया को आज इंटरनेट पर वायरल हुए हजारों क्षणभंगुर चेहरों के नाम याद नहीं होंगे, लेकिन उसे आज भी अपने महान वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, विचारकों और कलाकारों के नाम याद हैं, जिन्होंने अपनी पहचान बाहरी पैकेजिंग से नहीं, बल्कि आंतरिक योग्यता और सृजन से बनाई थी। तापसी पन्नू का संदेश शरीर के प्रति करुणा और वैज्ञानिक समझ का संदेश है, जबकि मीनाक्षी शेषाद्रि की टिप्पणी हमें याद दिलाती है कि स्थायी पहचान काम और प्रतिभा से बनती है, केवल दृश्यता से नहीं। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंस्टाग्राम या और किसी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दिखने वाली तसवीरें फिल्टर, फोटो एडिटिंग, एआई आधारित रीटचिंग, कैमरा एंगल, विशेष प्रकाश व्यवस्था, मेकअप तकनीक आदि से होती हुई हमारे सामने आती हैं। ऐसी तस्वीरें अक्सर वास्तविक व्यक्ति से काफी अलग होती है। फिर भी देखने वाला उसे वास्तविक मान लेता है। यहीं से असंतोष शुरू होता है।

ब्रिटेन की संस्था रॉयल सोसाइटी फॉर पब्लिक हेल्थ के एक अध्ययन में पाया गया कि इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे मंच युवाओं में शरीर के प्रति असंतोष और चिंता को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं। दूसरी ओर अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ के अनेक अध्ययनों में पाया गया कि सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों से तुलना करने वाले युवाओं में अवसाद और आत्मसम्मान की समस्या अधिक देखी जाती है।

एक समय था जब माता-पिता बच्चों से कहते थे- "अच्छा पढ़ो, अच्छा काम करो, अच्छा इंसान बनो।" आज की डिजिटल दुनिया में एक नया दबाव पैदा हो गया है- "अच्छा दिखो, हर समय अच्छा दिखो और दुनिया को दिखाते रहो कि तुम अच्छे दिख रहे हो।"

सोशल मीडिया के इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि युवा अपने चेहरे बदलना चाहते हैं; सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वे अपने सपनों को भी चेहरे के हिसाब से तौलने लगे हैं।" हमने खुद ही अपने लिए सुंदरता का एक नया कैदखाना तैयार कर लिया है जहां आईना नहीं, एल्गोरिद्म हमारी पहचान तय करने लगा है। 

सोशल मीडिया जीवन का एक संपादित संस्करण हो सकता है, पर वह संपूर्ण जीवन या अंतिम सत्य नहीं है। आज की पीढ़ी के लिए सबसे जरूरी सीख यही है कि जिस दुनिया में हर तस्वीर संपादित हो सकती है, वहां स्वयं को वास्तविक बनाए रखना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।

जो व्यक्ति कैमरे के पीछे भी सहजता के साथ स्वयं को स्वीकार करना सीख लेता है, वही वास्तव में सबसे सुंदर और सशक्त है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य एक 'परफेक्ट फोटो' बनना नहीं, बल्कि एक संतुलित और सार्थक व्यक्तित्व का निर्माण करना है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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