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विभाजन की त्रासदी: इतिहास के कटघरे में नेहरू की भूमिका!
सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य विभाजन के दौरान पीड़ित लोगों की पीड़ा को याद करना और आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना है कि सामाजिक विभाजन और नफरत कितनी बड़ी कीमत वसूल सकती है, लेकिन इस स्मृति का अर्थ तभी पूरा होगा, जब हम इतिहास को राजनीतिक सुविधा के अनुसार नहीं, बल्कि उसके कठिन सवालों के साथ देखने का साहस करें।
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भारत-पाकिस्तान में विभाजन (प्रतीकात्मक तस्वीर)।
- फोटो : AI Generated
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विस्तार
भारत का विभाजन केवल नक्शे पर खींची गई एक सीमा नहीं थी। वह करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ा ऐसा घाव था, जिसकी पीड़ा आज भी परिवारों की स्मृतियों, विस्थापन की कहानियों और पीढ़ियों से चली आ रही यादों में दिखाई देती है। घर छूटे, रिश्ते टूटे, गांव और शहर बदल गए और लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई।
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इसलिए 14 अगस्त को मनाया जाने वाला ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन भी है कि आखिर वह परिस्थिति बनी कैसे और उस समय के राजनीतिक नेतृत्व ने कौन-कौन से निर्णय लिए?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य विभाजन के दौरान पीड़ित लोगों की पीड़ा को याद करना और आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना है कि सामाजिक विभाजन और नफरत कितनी बड़ी कीमत वसूल सकती है, लेकिन इस स्मृति का अर्थ तभी पूरा होगा, जब हम इतिहास को राजनीतिक सुविधा के अनुसार नहीं, बल्कि उसके कठिन सवालों के साथ देखने का साहस करें।
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हालांकि, विभाजन के लिए किसी एक व्यक्ति या एक संगठन को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा। मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग, मोहम्मद अली जिन्ना की राजनीति, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लगातार बढ़ता अविश्वास, ब्रिटिश सरकार की नीतियां, सांप्रदायिक तनाव और 1946-47 में लिए गए कई निर्णायक राजनीतिक फैसले, इन सबने मिलकर परिस्थितियां तैयार कीं, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू, की भूमिका पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।
दरअसल, नेहरू स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेता थे। लोकतांत्रिक संस्थाओं, आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और नियोजित विकास की उनकी सोच ने नए भारत को दिशा दी, लेकिन किसी नेता की उपलब्धियां उसके हर राजनीतिक निर्णय को सही नहीं बना देतीं। 1946-47 का दौर ऐसा ही एक उदाहरण है।
सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव कैबिनेट मिशन योजना थी। यह योजना एक ऐसे भारत की संभावना बचाए हुए थी, जिसमें देश एकजुट रह सकता था, लेकिन प्रांतों को काफी स्वायत्तता मिलती और केंद्र के पास सीमित विषय होते। कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ने अलग-अलग स्तर पर इस योजना को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।
यही वह क्षण था, जब विभाजन के बजाय एक कमजोर केंद्र वाले संघीय भारत की संभावना मौजूद थी, लेकिन यह समझौता ज्यादा समय तक नहीं टिक सका।
जुलाई 1946 में नेहरू ने स्पष्ट किया कि संविधान सभा में जाने के बाद कांग्रेस किसी पूर्व समझौते से अपने हाथ बंधे हुए नहीं मानेगी। कांग्रेस का यह रुख मुस्लिम लीग के लिए गंभीर संकेत था। मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना से समर्थन वापस लिया और इसके बाद ‘डायरेक्ट एक्शन’ का आह्वान किया।
16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में भड़की हिंसा ने पूरे देश को सांप्रदायिक तनाव की खतरनाक दिशा में धकेल दिया। यह कहना गलत होगा कि नेहरू ने अकेले विभाजन कराया, लेकिन यह सवाल पूरी तरह जायज है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व कैबिनेट मिशन की जटिल, लेकिन संभव संघीय व्यवस्था को कुछ और समय देकर संयुक्त भारत की संभावना बचा सकता था? इतिहास का निश्चित उत्तर शायद कभी नहीं मिलेगा, लेकिन इस प्रश्न को दबाया भी नहीं जाना चाहिए।
नेहरू एक मजबूत केंद्र के पक्षधर थे। उनके सामने एक ऐसा भारत था, जो गरीबी, अशिक्षा और प्रशासनिक कमजोरी से जूझ रहा था। उन्हें लगता था कि अत्यधिक शक्तिशाली प्रांतों और कमजोर केंद्र वाला संघ देश को लंबे समय तक एकजुट नहीं रख पाएगा। इस दृष्टि से उनकी चिंता को समझा जा सकता है, लेकिन समस्या यह थी कि मुस्लिम लीग की सबसे बड़ी राजनीतिक चिंता भी यही थी कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम बहुल प्रांतों की राजनीतिक शक्ति कमजोर न हो जाए।
यहां दोनों पक्षों के बीच समझौते की जरूरत थी। राजनीति में कई बार पूर्ण समाधान नहीं मिलता, बल्कि कम नुकसान वाला रास्ता चुनना पड़ता है। सवाल यह है कि क्या उस समय कांग्रेस ने समझौते की गुंजाइश पर्याप्त रूप से तलाश की? नेहरू की आलोचना यहीं से शुरू होती है।
नेहरू की आधुनिक राष्ट्र-राज्य की कल्पना मजबूत केंद्र चाहती थी, जबकि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियां शायद अधिक लचीले संघीय ढांचे की मांग कर रही थीं। यदि 1946 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच कोई टिकाऊ समझौता हो जाता तो संभव है कि भारत का नक्शा आज अलग होता। यह निश्चित दावा नहीं है, लेकिन इतिहास के सबसे गंभीर ‘क्या होता अगर’ सवालों में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
नेहरू की भूमिका पर सवाल उठाने का अर्थ जिन्ना और मुस्लिम लीग की जिम्मेदारी को कम करना नहीं है। 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद अलग मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था की मांग तेजी से मजबूत हुई। जिन्ना ने मुस्लिम लीग को एक शक्तिशाली राजनीतिक संगठन में बदल दिया। 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन’ का निर्णय और उसके बाद फैली हिंसा ने राजनीतिक संघर्ष को भयावह सामाजिक संघर्ष में बदल दिया।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि मुस्लिम लीग की राजनीति और भारत के हर मुस्लिम नागरिक को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। विभाजन की राजनीति के समर्थक और विरोधी, दोनों समुदायों के भीतर मौजूद थे। इसी तरह हिंसा के शिकार भी हिंदू, मुस्लिम और सिख, तीनों समुदायों के लोग बने। इसलिए विभाजन की जिम्मेदारी का विश्लेषण करते समय किसी पूरे समुदाय को दोषी ठहराना न इतिहास है, न न्याय।
ब्रिटिश सरकार भी इस पूरी त्रासदी से अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। लॉर्ड माउंटबेटन के नेतृत्व में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को जिस तेजी से आगे बढ़ाया गया, उसने प्रशासन को पर्याप्त तैयारी का समय नहीं दिया। पंजाब और बंगाल का विभाजन, सीमा निर्धारण और उसके बाद शुरू हुआ जनसंख्या का विशाल पलायन ऐसी परिस्थितियों में हुआ, जब प्रशासनिक व्यवस्था पहले ही कमजोर हो चुकी थी।
सीमाएं स्पष्ट होने से पहले ही लोगों में भय फैल चुका था। लाखों लोग यह नहीं जानते थे कि उनका गांव किस देश में आएगा। हथियारबंद समूह सक्रिय थे। पुलिस और प्रशासन पर भरोसा टूट रहा था। ऐसी स्थिति में हिंसा को रोकना बेहद कठिन था। फिर भी सवाल उठता है कि क्या ब्रिटिश प्रशासन ने पर्याप्त तैयारी की? जवाब संतोषजनक नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाजन टल सकता था? संभवतः हां। कम से कम 1946 तक इसकी संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। कैबिनेट मिशन योजना एक संयुक्त भारत का रास्ता खोल सकती थी, लेकिन इसके लिए कांग्रेस को केंद्र की शक्ति पर कुछ समझौता करना पड़ता और मुस्लिम लीग को भी अपने अधिकतम राजनीतिक दावों से पीछे हटना पड़ता।
दोनों पक्षों के बीच अविश्वास इतना गहरा था कि यह समझौता टिक नहीं पाया। यहीं नेहरू की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में होने के कारण उनके शब्दों और फैसलों का व्यापक प्रभाव था। इसलिए इतिहास में यह दर्ज किया जाना चाहिए कि उनकी राजनीतिक कठोरता ने उस समय उपलब्ध समझौते की गुंजाइश को कमजोर किया, लेकिन उसी ईमानदारी से यह भी दर्ज होना चाहिए कि जिन्ना की राजनीति, मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग, ‘डायरेक्ट एक्शन’, ब्रिटिश नीति और सांप्रदायिक हिंसा ने भी संयुक्त भारत की संभावना को लगातार कमजोर किया।
हालांकि, नेहरू को विभाजन का अकेला दोषी कहना गलत है, लेकिन उन्हें पूरी तरह निर्दोष मान लेना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
आज जब हम 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद करते हैं तो हमारा उद्देश्य किसी समुदाय के विरुद्ध नफरत पैदा करना नहीं होना चाहिए।
इतिहास का उद्देश्य बदला लेना नहीं, भविष्य को बचाना है। विभाजन हमें बताता है कि जब राजनीतिक असहमति संवाद की जगह अविश्वास ले लेती है, जब पहचान की राजनीति भय में बदल जाती है और जब नेतृत्व समझौते को कमजोरी मानने लगता है, तब परिणाम बहुत भयानक हो सकते हैं।
इसलिए नेहरू की भूमिका पर सवाल उठाना इतिहास-विरोधी नहीं है। उसी तरह जिन्ना, मुस्लिम लीग, ब्रिटिश शासन और उस दौर के अन्य राजनीतिक निर्णयों की आलोचना करना भी जरूरी है। इतिहास किसी एक चेहरे से नहीं बनता, लेकिन इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर लिए गए फैसलों का मूल्यांकन होना चाहिए, बिना पूजा के और बिना घृणा के।
विभाजन की त्रासदी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि देश केवल सीमाओं से नहीं बनता। देश विश्वास, संवाद और साझी जिम्मेदारी से बनता है। 14 अगस्त को हमें उन लाखों लोगों को याद करना चाहिए, जिन्होंने बिना किसी गलती के अपना घर, परिवार, संपत्ति और कभी-कभी जीवन तक खो दिया।
साथ ही यह संकल्प भी लेना चाहिए कि राजनीति चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, संवाद का रास्ता कभी बंद नहीं होना चाहिए, क्योंकि 1947 ने हमें एक बहुत महंगा सबक दिया था, एक बार समाज के बीच खिंची विभाजन की रेखा खून से भर जाए तो उसे मिटाने में पीढ़ियां लग जाती हैं।
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