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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: भयावह फिल्में, हम और अनुशासन
सार
2017 के नोबेल पुरस्कार विजेता कजुओ इशिगुरो ने 2005 में एक डिस्टोपियन साइंस फिक्शन रचा। इसमें सरकार द्वारा संचालित एक संस्था द्वारा बच्चों को अंगदान के लिए पाला-पोसा जाता है।
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सिनेमा की दुनिया
- फोटो : istock
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विस्तार
अनुशासन एवं आज्ञापालन बचपन से हमें घुट्टी में दिया जाता है। परिवार एवं स्कूल की इसमें सबसे बड़ी भूमिका होती है। यह कितनी खतरनाक बात है, हम बच्चों को जो कहते हैं, वे उस पर विश्वास कर लेते हैं। वयस्क होने पर भी इन विश्वासों से निकल नहीं पाते हैं। माता-पिता और शिक्षक जो कहते हैं, वह बच्चों के व्यक्तित्व का अंग बन जाता है। आगे चल कर जनता दूसरों के कहे पर विश्वास कर लेती है, वह स्वयं अपना विनाश कर लेने को राजी हो जाती है।
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यह सब बच्चों-वयस्कों को सदा उनकी भलाई के नाम पर आत्मसात कराया जाता है। अनुशासन पर जरूरत से ज्यादा जोर, कभी उलट कर प्रश्न नहीं पूछना, खतरा पैदा करता है। चाहे वह परिवार में हो अथवा देश में।
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अनुशासन व्यक्ति के भीतर से आना चाहिए, ऊपर से थोपा हुआ या ओढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए। इसका परिणाम कितना भयानक हो सकता है, इस पर आज साहित्य और सिनेमा में काफी सामग्री उपलब्ध है। विद्वान इस पर विचार-विमर्श करते हैं। मगर यह जारी है। इसी से जुड़े सिनेमा तथा साहित्य की एक बानगी।
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2017 के नोबेल पुरस्कार विजेता कजुओ इशिगुरो ने 2005 में एक डिस्टोपियन साइंस फिक्शन रचा। इसमें सरकार द्वारा संचालित एक संस्था द्वारा बच्चों को अंगदान के लिए पाला-पोसा जाता है। कुछ अंगदान बाद जब उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है, तो या तो वे खुद ही तब तक मर जाते हैं, अथवा उन्हें समाप्त कर दिया जाता है।
ये लोग यह बात जानते हैं, लेकिन विद्रोह या प्रतिवाद नहीं करते हैं। अंगदान केलिए आदमी का पालन-पोषण और जानते हुए भी गलत बात का विरोध न करना दोनों बातें अपने आप में बहुत भयावह हैं। यह काल्पनिक है, मगर ‘जोन ऑफ इंटरेस्ट’ मार्टिन अमीस का बेस्ट सेलर उपन्यास सच्चाई पर आधारित है।
चालीस यातना शिविरों में सबसे बड़े यातना शिविर ऑश्वित्ज का कमांडर रुडोल्फ हौस ठीक यातना शिविर के बगल में एक दुमंजिले घर में अपने परिवार के साथ रह रहा है। एक ओर वह यहूदी कैदियों केलिए यातनाओं की योजना बनाता है, दूसरी ओर अपने परिवार के साथ मौज मस्ती करता है। उसकी पत्नी वहां अपने बागीचे को लेकर मगन है। उनकी जिंदगी कैदियों की यातना से निर्लिप्त चल रही है।
लगता है, हम अधिक अमानुष होते जा रहे हैं। हमारी संवेदनशीलता भोथरी होती जा रही है। किताब एवं 8 पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘नेवर लेट मी गो’ में प्राइमरी क्लास से कॉलेज तक साथ रहे तीन दोस्त बहुत बाद में जीवन के यथार्थ का सामना करते हैं। इसमें यथार्थ और दु:स्वप्न का मिश्रण प्राप्त होता है। ‘नेवर लेट मी गो’ में आदमी का खुद को इस तरह समर्पित कर देना बड़ा खतरनाक और डरावना है। बच्चों को कम्प्यूटर की तरह फीड किया जाता है।
उपन्यास के करीब रहती फिल्म में स्कूल में एक टीचर मिस लूसी आती है, वह बच्चों को वास्तविकता बताती है, उनके भीतर स्वप्न रोपना चाहती है। मैनेजमेंट को यह नहीं रुचता है। लूसी को प्रिंसीपल मिस एमिली स्कूल से हटा देती है। यह हमारे समय की एक सच्चाई है। कोई संस्थान नहीं चाहता है, उसका कोई कर्मचारी लोगों को सच्चाई बताए। आये दिन हम अपने आसपास ऐसा होते देखते हैं। कितना खतरनाक है, यह सब। क्या हम प्रतिवाद करते हैं?
उपन्यास और 2010 में निर्देशक मार्क रोमानेक की फिल्म प्रश्न उठाती है, विज्ञान और उन्नति के द्वारा हम आगे बढ़ रहे हैं अथवा अधिक असंवेदनशील होते जा रहे हैं।
कजुओ इशिगुरो के अनुसार, विभिन्न स्तरों पर चलता यह इंग्लिश बोर्डिंग स्कूल की पैरोडी है। यह मेडिकल तकनीकि पर तंज है, साथ ही हम कैसे जीते हैं, यह उसका रूपक भी है। तीन पात्रों – कैथी (कैसी मुलिगन), टॉमी (एंड्रू गारफील्ड) तथा रुथ (कैरा नाइटली) अभिनीत (अभिनय हेतु कैरी मुलिगन तथा एंड्रू गारफील्ड को पुरस्कार मिला), तद्नुभूति से जुड़ी फिल्म का स्क्रीनप्ले एलेक्स गारलैंड ने तैयार किया है।
पूरी कहानी कैथी द्वारा सुनाई गई है। वह रुथ तथा टॉमी को डोनर के रूप में समाप्त होते हुए देखती है, अब उसकी बारी है। टॉमी और कैथी एक दूसरे को प्यार करते हैं, सोचते हैं, उन्हें जीने का कुछ और समय मिल सकेगा। ऐसा होता नहीं है। सच्चाई जान कर टॉमी टूट जाता है, उसका फ्रस्ट्रेशन देखते बनता है।
खुद 80-100 साल जीने के लिए कुछ दूसरों को 20-30 साल में समाप्त कर देना कहां का, कैसा औचित्य है? हम (पाठक/दर्शक) यह बात जानते हैं, ये जल्द मर जाने वाले हैं, हमें उनका जीवन सामान्य, स्वस्थ और स्वतंत्र अस्तित्व की क्रूर पैरोडी लगता है। इशिगुरो पूछते हैं, ‘क्या हमारा अपना जीवन भी वास्तविक स्वतंत्रता की पैरोडी नहीं कही जा सकती है?’
2003 की फिल्म ‘जोन ऑफ इंटरेस्ट’
जोनाथन ग्लेजर निर्देशित ‘जोन ऑफ इंटरेस्ट’ (2023) फिल्म कहीं भी यातना शिविर के भीतर नहीं जाती है। हां, वहां से आती आवाजे, चिमनी से निकलता धूंआ दर्शकों को बेचैन करता है। कुछ समय बाद हौस (क्रिश्चियन फ्राइडेल) का तबादला होना है, उसकी पत्नी हेडविग (शैन्ड्रा हुलर) वहां से जाना नहीं चाहती है, उसे लगता है, यहां सब कुछ आसानी से मिल रहा है।
हौस को मृत्युदंड उसी शानदार बगीचे में दिया गया, जहां बस कुछ ही बरस पहले उसकी पत्नी रानी एवं वह ख़ुद राज कर रहे थे, मस्ती कर रहे थे। अंत की ओर दर्शक हौस को एक के बाद एक सीढ़ियां उतरते, धीरे-धीरे बढ़ते अंधेरे में गुम होते देखते हैं। वह बीच-बीच में उलटी-सी भी कर रहा है..खून की? अपनी अंतरात्मा की? नहीं कह सकते। लेकिन इतना साफ है, उन सीढ़ियों का उतार गहन अंधेरे में ही है।
हौस ने यह सब अमानवीय कार्य किए क्योंकि वह अनुशासन से बंधा था और मात्र आज्ञा पालन कर रहा था। नाजियों के मुकदमें में अधिकतर ऑफीसर ने यही कहा। जॉर्ज मौस ने रुडौल्फ हौस को अपनी किताब ‘दि क्राइसिस ऑफ जर्मन आइडियॉलॉजी’ में कहा, ‘बेशक इतिहास ने सर्वाधिक नर संहारक के रूप में जाना है।’ 2 ऑस्कर प्राप्त ‘जोन ऑफ इंटरेस्ट’ में नायक हौस दस्तावेजों-पत्रों के अनुसार अपने अंत में गलती का अहसास करता है, अपने बच्चों को ऐसी गलती न करने की सलाह देता है।
‘नेवर लेट मी गो’ एवं ‘जोन ऑफ इंटरेस्ट’ फिल्में देखते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं। किताबें न भी पढ़ें, फिल्में एक बार अवश्य देखें। फिल्में हमारे समय की सच्चाई हैं।
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