आजादी अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी: प्रशासन में ईमानदारी, सेवा-भाव से ही भारत का लोकतंत्र अजेय रहेगा; सहमति अहम
देश आजादी की 79वीं वर्षगांठ मना रहा है। करीब आठ दशकों की इस यात्रा के मौके पर जानिए उन पूर्वजों के विचार, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सर्वोच्च बलिदान दिए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, सरोजिनी नायडू और उपराष्ट्रपति रहे डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसी विभूतियों के अनमोल वचन, इस विशेष आलेख में
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सत्ता जनता की सेवा के लिए: डॉ. राजेंद्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति)
जब शासन में गांवों की आवाज को प्राथमिकता मिलेगी और प्रशासन में ईमानदारी एवं सेवा-भाव बना रहेगा, तभी भारत का लोकतंत्र अजेय रहेगा।
जब हम भारत जैसे कृषि-प्रधान और गांवों के देश में लोकतंत्र की बात करते हैं, तो हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वास्तविक भारत हमारे गांवों में बसता है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से ही पूज्य बापू (महात्मा गांधी) ने हमें यह सिखाया था कि जब तक सत्ता का वास्तविक विकेंद्रीकरण नहीं होगा और गांव आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे, तब तक सच्चा प्रजातंत्र स्थापित नहीं हो सकता। संविधान निर्माण के समय और उसके पश्चात भी मेरा यह दृढ़ विश्वास रहा कि यदि हम लोकतंत्र को निचले स्तर तक मजबूत करना चाहते हैं, तो हमें अपनी पंचायती राज व्यवस्था को पुनर्जीवित और सशक्त करना ही होगा। लोकतंत्र की सफलता का दूसरा सबसे बड़ा आधार प्रशासनिक शुचिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन है। यदि शासन में बैठे लोग या प्रशासनिक अधिकारी अपने व्यक्तिगत हितों को राष्ट्रहित से ऊपर रखने लगेंगे, तो जनता का प्रजातांत्रिक संस्थाओं से विश्वास उठने लगेगा। सत्ता कोई अधिकार या उपभोग की वस्तु नहीं है, बल्कि वह तो जनता की सेवा के लिए मिला हुआ एक पवित्र न्यास है। जब शासन व्यवस्था में गांवों की आवाज को प्राथमिकता मिलेगी और प्रशासन में ईमानदारी एवं सेवा-भाव बना रहेगा, तभी भारत का लोकतंत्र अजेय रहेगा। एक लोककल्याणकारी राज्य का दायित्व केवल भौतिक प्रगति ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की नैतिक आत्मा को भी जागृत करना है।
सिर्फ श्लोक नहीं है वंदे मातरम: बाल गंगाधर तिलक (स्वतंत्रता सेनानी)
वंदे मातरम केवल श्लोक मात्र नहीं, बल्कि वह महामंत्र है, जिसने सदियों से बिखरी हुई जनता को एकता के सुदृढ़ और अभेद्य सूत्र में बांधा।
वंदे मातरम केवल छह अक्षरों या दो शब्दों का साधारण ध्वनि-समूह अथवा गीतिमय श्लोक मात्र नहीं, अपितु समस्त भारतवर्ष की आत्मा, उसकी सुप्त राष्ट्रीय चेतना व हमारी अस्मिता को जगाने वाला दिव्य महामंत्र है, जिसकी गूंज से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल उठी। जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने अमर उपन्यास आनंदमठ में इस पावन श्लोक की रचना की थी, तब शायद किसी ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन यही शब्द भारत माता के करोड़ों बंदियों और पददलित पुत्रों के कंठ का एकमात्र स्वर तथा स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान शक्ति बन जाएंगे। जब हम पूर्ण भक्तिभाव से 'वंदे मातरम' का उच्चारण करते हैं, तब केवल अपनी इस मिट्टी को नमन ही नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी पौराणिक संस्कृति, भव्य इतिहास, गौरवशाली परंपराओं और उस भारत माता का प्रत्यक्ष आह्वान कर रहे होते हैं, जो अपनी संतानों से धर्म, सत्य और स्वतंत्रता की रक्षा हेतु सर्वस्व न्योछावर कर देने का संकल्प मांगती है। स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा का हमारा यह संपूर्ण त्रिमुखी आंदोलन वास्तव में वंदे मातरम के इसी महान और पावन दर्शन पर पूरी तरह आधारित है, क्योंकि यदि मन में मातृभूमि के प्रति ऐसा अगाध और निःस्वार्थ प्रेम न हो, तो राष्ट्रहित के लिए अपनी स्वार्थ भावनाओं का त्याग कर पाना कभी संभव ही नहीं हो सकता। इस पवित्र महामंत्र ने देश के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक फैली भाषा, धर्म और जातियों की तमाम कृत्रिम सीमाओं को एक झटके में ध्वस्त कर दिया है तथा सदियों से बिखरी हुई जनता को एकता के सुदृढ़ और अभेद्य सूत्र में पिरो दिया है।
स्वतंत्रता अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी: सरोजिनी नायडू
स्वतंत्रता अपने साथ केवल अधिकार नहीं, बल्कि उतने ही बड़े उत्तरदायित्व भी लेकर आती है। भारत की स्वतंत्रता केवल एक राष्ट्र की मुक्ति नहीं दुनियाभर के उत्पीड़ित और वंचित लोगों के लिए आशा का प्रतीक है। लेकिन, हमारा काम अभी समाप्त नहीं हुआ है. यह तो केवल शुरुआत है। क्योंकि, किसी राष्ट्र की वास्तविक परीक्षा केवल उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता या बड़ी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सामान्य नागरिक को कितना सम्मान, न्याय, शांति और समृद्धि दे पाता है। भारत की प्रगति का सही अर्थ भी तभी सामने आएगा, जय समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति अपने जीवन में स्वतंत्रता के लाभ को महसूस कर सके। हमें देखना होगा कि आम भारतीय बौद्धिक, राजनीतिक, साहित्यिक और कलात्मक जीवन में कितना आगे बढ़ रहा है। किसी देश का भविष्य उसके करोड़ों सामान्य नागरिकों के विचारों, कर्मों और सपनों से ही निर्मित होता है।
मन का स्वतंत्र होना जरूरी: डॉ. बी आर आंबेडकर
जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक कोई भी स्वतंत्रता किसी काम की नहीं है। मन की स्वतंत्रता हो वास्तविक स्वतंत्रता है। एक व्यक्ति, जिसका मन स्वतंत्र नहीं है, भले ही वह जंजीरों में न जकड़ा हो, फिर भी वह एक गुलाम है। यदि समाज में भेदभाव बना रहता है, तो केवल राजनीतिक रूप से आजाद होना देश के आम नागरिक के लिए बेमानी साबित होगा।
आपसी सहमति ही विकल्प: सर्वपल्ली राधाकृष्णन
आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध और संघर्ष मानव सभ्यता के सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़े हैं। ऐसे समय में हमारे सामने दो ही विकल्प हैं। पहला, युद्ध को और व्यापक होने दिया जाए और उसके विनाशकारी परिणामों को स्वीकार कर लिया जाए। दूसरा, बातचीत, समझदारी और आपसी सहमति के माध्यम से समाधान का रास्ता तलाशा जाए।