फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   pm narendra modi speech on independence day in red fort talks maoism use term brain naxalite

‘अर्बन नक्सल’ के बाद ‘दिमागी नक्सली’: प्रधानमंत्री के लालकिले की प्राचीर से संबोधन के गहरे हैं मायने

Sat, 15 Aug 2026 11:17 AM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sat, 15 Aug 2026 11:17 AM IST
सार

वर्ष 2024 के लालकिले संबोधन में उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘राष्ट्र प्रथम’ को सर्वोच्च संकल्प बताया और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक शक्ति से विकसित भारत बनाने का आह्वान किया। वर्ष 2025 के संबोधन में और व्यापक दिखाई दिया।

विज्ञापन
pm narendra modi speech on independence day in red fort talks maoism use term brain naxalite
पीएम नरेंद्र मोदी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

80वें स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं, अपितु भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विकसित भारत के संकल्प से जुड़ा विमर्श है। भारत के राष्ट्र जीवन में कुछ शब्द केवल शब्द नहीं रहते, वे एक व्यापक विचार को जन्म देते हैं।

विज्ञापन


राष्ट्र प्रथम, भारत माता, आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक गौरव, विकसित भारत और राष्ट्रीय एकता, ऐसे ही शब्द हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लालकिले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस के संबोधनों को इसी व्यापक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
विज्ञापन


प्रधानमंत्री के संबोधनों में पिछले वर्षों में एक बात लगातार दिखाई देती है। भारत को केवल आर्थिक रूप से मजबूत राष्ट्र नहीं, अपितु अपनी सभ्यता, संस्कृति, सुरक्षा और राष्ट्रीय आत्मविश्वास के आधार पर विश्व में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाला देश बनाना। वर्ष 2014 में लालकिले से उन्होंने स्वयं को ‘प्रधान सेवक’ बताते हुए राष्ट्र के लिए काम करने का संकल्प रखा था।
विज्ञापन
विज्ञापन


साथ ही कहा था कि भारत की नियति विश्व कल्याण की है। समय के साथ इस विचार का विस्तार हुआ। कभी उन्होंने जनभागीदारी को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया, कभी स्वच्छता और जनधन जैसी पहलों को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा, कभी ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात की और बाद के वर्षों में विकसित भारत 2047 को राष्ट्रीय संकल्प के रूप में सामने रखा। 

वर्ष 2024 के लालकिले संबोधन में उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘राष्ट्र प्रथम’ को सर्वोच्च संकल्प बताया और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक शक्ति से विकसित भारत बनाने का आह्वान किया। वर्ष 2025 के संबोधन में और व्यापक दिखाई दिया।

प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता, नवाचार, युवाशक्ति और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को एक दूसरे से जोड़ते हुए भारत को अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करने वाला राष्ट्र बनाने की बात कही। आज उन्होंने ‘दिमागी नक्सलियों’ का जिक्र किया। इसी संदर्भ में ‘दिमागी नक्सलियों’ की चर्चा को समझना जरूरी है।

दरअसल, नक्सलवाद ने दशकों तक भारत के आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में हिंसा का वातावरण बनाया। बंदूक, बारूदी सुरंग और हिंसा के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली इस विचारधारा ने सबसे अधिक नुकसान उन्हीं गरीब और आदिवासी परिवारों को पहुंचाया, जिनके अधिकारों और विकास के नाम पर वह संघर्ष का दावा करती रही।

वर्ष 2025 के लालकिले संबोधन में प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में विस्तार से बात की थी। उन्होंने कहा था कि नक्सलवाद से सबसे अधिक नुकसान आदिवासी परिवारों को हुआ है, लेकिन नक्सलवाद का प्रश्न केवल जंगल में मौजूद हथियारबंद दस्तों तक सीमित नहीं है।

प्रधानमंत्री ने इससे पहले भी ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए उस वैचारिक नेटवर्क के प्रति सावधान किया है, जिसे वे भारत के विकास और विरासत के विरोध से जोड़ते हैं। मार्च 2025 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि जंगलों से नक्सलवाद कम होने के बाद शहरी केंद्रों में उसकी वैचारिक मौजूदगी के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। हर सरकार विरोधी व्यक्ति, हर वामपंथी, हर सामाजिक कार्यकर्ता, हर पत्रकार या हर आलोचक को ‘दिमागी नक्सली’ कह देना न तो उचित है और न ही लोकतांत्रिक विमर्श के लिए उपयोगी। लोकतंत्र में असहमति का अपना सम्मान है।

सरकार की नीतियों की आलोचना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन प्रश्न वहां उठता है, जहां लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक या राष्ट्र विरोधी विचारधारा के समर्थन के बीच की सीमा जानबूझकर धुंधली की जाए। यही वह बिंदु है, जहां प्रधानमंत्री की चेतावनी को गंभीरता से समझने की जरूरत है।

अब थोड़ा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को समझते हैं, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आते हैं। संघ में राष्ट्र केवल राजनीतिक सत्ता या प्रशासनिक सीमा का नाम नहीं है। संघ के लिए राष्ट्र एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत निरंतरता है। भारत की पहचान केवल 1947 में बने राजनीतिक गणराज्य से शुरू नहीं होती। उसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति, तीर्थ परंपरा, भाषाई विविधता, लोकाचार, ज्ञान परंपराएं और साझा राष्ट्रीय अनुभव मौजूद हैं। 

इसी दृष्टि में राष्ट्रवाद का अर्थ किसी दूसरे समुदाय के प्रति विरोध नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि के प्रति गहरा दायित्व है। संघ की दृष्टि में समाज को टुकड़ों में देखने के बजाय एकात्मता के भाव से देखना महत्वपूर्ण है। अलग अलग जाति, भाषा, क्षेत्र और पंथ के बावजूद एक व्यापक राष्ट्रीय पहचान का निर्माण ही सामाजिक समरसता का आधार बन सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति में भी ‘राष्ट्र प्रथम’ का विचार लगातार दिखाई देता है। वर्ष 2014 के उनके पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में उन्होंने ‘साथ चलने, साथ सोचने और साथ आगे बढ़ने’ की भारतीय परंपरा का उल्लेख किया था।

इसलिए मोदी के राष्ट्रवाद को केवल चुनावी नारे के रूप में देखना उसके व्यापक राजनीतिक दर्शन को समझने में बाधा पैदा करता है। उनके लिए राष्ट्रवाद का एक पक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा है, दूसरा आर्थिक आत्मनिर्भरता, तीसरा सांस्कृतिक आत्मविश्वास और चौथा नागरिक भागीदारी।

आज युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते। सूचना, तकनीक, अर्थव्यवस्था और विचार भी शक्ति के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुके हैं। एक राष्ट्र की कमजोरी केवल तब नहीं होती, जब उसकी सीमा पर हमला हो। कमजोरी तब भी पैदा होती है, जब उसकी युवा पीढ़ी को अपने ही देश, इतिहास, संस्कृति और संस्थाओं के प्रति लगातार अविश्वास सिखाया जाए, जब विकास को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाए, जब हर राष्ट्रीय उपलब्धि को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत बन जाए।

यहीं ‘दिमागी नक्सलियों’ जैसी अवधारणा का राजनीतिक महत्व सामने आता है। हालांकि, इस शब्द का उपयोग सावधानी से होना चाहिए। विचारों से लड़ाई तथ्यों और तर्कों से होनी चाहिए, लेबल लगाकर नहीं।

किसी व्यक्ति को केवल उसके विचारों, राजनीतिक झुकाव या सरकार की आलोचना के कारण इस श्रेणी में डालना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं होगा, लेकिन यदि कोई संगठित विचारधारा हिंसा को वैध ठहराती है, संवैधानिक लोकतंत्र को समाप्त करने की वकालत करती है या भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ हिंसक राजनीति को समर्थन देती है तो उससे वैचारिक संघर्ष आवश्यक है। राष्ट्रवाद का अर्थ विचारों से डरना नहीं, बल्कि अपने विचारों पर विश्वास रखना है।

प्रधानमंत्री के लालकिले के भाषणों को अलग अलग वर्षों में अलग अलग घोषणाओं की सूची के रूप में पढ़ने के बजाय एक लंबी यात्रा के रूप में पढ़ा जाए तो एक निरंतर सूत्र दिखाई देता है। वर्ष 2014 में उन्होंने नागरिकों को राष्ट्र निर्माण का सहभागी बनाने और शासन में नई ऊर्जा लाने की बात की।

वर्ष 2015 में उन्होंने ‘टीम इंडिया’ की भावना, एकता और भाईचारे को राष्ट्र की शक्ति बताया और जातिवाद तथा सांप्रदायिकता को देश की प्रगति में बाधा कहा। वर्ष 2018 में उन्होंने आत्मविश्वास से आगे बढ़ते भारत की तस्वीर रखी। वर्ष 2021 में आजादी के 75वें वर्ष पर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नायकों का स्मरण करते हुए राष्ट्र निर्माण को अगले चरण से जोड़ा।

वर्ष 2022 के बाद ‘अमृतकाल’, ‘पंच प्रण’ और 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य इस यात्रा का केंद्रीय सूत्र बना। वर्ष 2024 में ‘राष्ट्र प्रथम’ और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक शक्ति पर जोर दिया गया। वर्ष 2025 तक आते आते यह दृष्टि सुरक्षा, आत्मनिर्भरता, तकनीक और रणनीतिक स्वावलंबन तक फैल गई।

प्रधानमंत्री के संबोधन में सेमीकंडक्टर से लेकर रक्षा उत्पादन और ऊर्जा क्षमता तक भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने का स्पष्ट आग्रह दिखाई दिया। इस पूरी यात्रा में एक बात स्थिर रही, भारत को अपनी क्षमता पर विश्वास करना चाहिए।

वैसे, आज की राजनीति में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। किसी नीति का विरोध करने के लिए कभी कभी पूरे राष्ट्र की उपलब्धियों को नकार दिया जाता है। दूसरी ओर, राष्ट्रवाद के नाम पर हर आलोचना को देश विरोध मान लेने का खतरा भी मौजूद है। दोनों अतियां लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं हैं।

राष्ट्रवाद का स्वस्थ रूप वह है, जिसमें सरकार से सवाल पूछे जा सकते हैं, लेकिन देश की संस्थाओं पर विश्वास बना रहता है। जहां नीति की आलोचना हो सकती है, लेकिन हिंसा का समर्थन नहीं। जहां सत्ता बदली जा सकती है, लेकिन राष्ट्र के प्रति निष्ठा नहीं बदलती।

यही अंतर देशभक्ति और राजनीतिक निष्ठा के बीच भी है। किसी सरकार का समर्थक होना राष्ट्रवादी होने की अनिवार्य शर्त नहीं और सरकार का आलोचक होना राष्ट्रविरोधी होने का प्रमाण नहीं, लेकिन राष्ट्र के मूल हितों, उसकी संप्रभुता और उसकी अखंडता के विरुद्ध हिंसक विचारधारा को लोकतांत्रिक असहमति का नाम देकर बचाने का प्रयास भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

वर्ष 2047 का विकसित भारत केवल बड़ा जीडीपी, आधुनिक सड़कें, सेमीकंडक्टर या अंतरिक्ष मिशन से नहीं बनेगा। वह तब बनेगा, जब भारत आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के साथ साथ मानसिक रूप से भी आत्मविश्वासी राष्ट्र बनेगा।

जिस युवा को अपने इतिहास पर गर्व हो, लेकिन वह भविष्य की तकनीक अपनाने से न डरे। जो अपनी संस्कृति से जुड़ा हो, लेकिन दुनिया से संवाद करने में संकोच न करे। जो लोकतंत्र में विश्वास रखता हो, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता के प्रति भी सजग हो। वही विकसित भारत की वास्तविक शक्ति होगा।

प्रधानमंत्री के 2025 के लालकिले संबोधन में आत्मनिर्भरता, नवाचार, नागरिक सशक्तीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता को विकसित भारत की यात्रा से जोड़ा गया था। यही वह वैचारिक धरातल है, जिस पर ‘राष्ट्र प्रथम’ की अवधारणा को समझना चाहिए।

भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां उसे अपनी सीमाओं की रक्षा के साथ अपनी राष्ट्रीय चेतना की भी रक्षा करनी होगी। यह रक्षा किसी एक विचारधारा के विरुद्ध नफरत पैदा करके नहीं, बल्कि अपने विचार को मजबूत करके होगी। संघ की राष्ट्रवादी दृष्टि का मूल आग्रह यही है कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर हीनभावना से मुक्त हो।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लालकिले के भाषणों में भी यही आत्मविश्वास बार बार उभरता है। भारत अपनी शक्ति पहचान सकता है। अपनी विरासत पर गर्व कर सकता है। आधुनिकता के साथ आगे बढ़ सकता है। इसलिए ‘दिमागी नक्सलियों’ पर बहस को केवल एक राजनीतिक आरोप के रूप में देखना पर्याप्त नहीं, इसे इस बड़े प्रश्न के रूप में देखना होगा कि क्या भारत अपने लोकतंत्र, विकास, संस्कृति और राष्ट्रीय हित के बारे में स्वयं निर्णय लेने वाला आत्मविश्वासी राष्ट्र बनेगा?

उत्तर स्पष्ट होना चाहिए, भारत को अपने विचारों से डरने की जरूरत नहीं है। उसे हिंसा की विचारधारा का मुकाबला लोकतांत्रिक शक्ति से करना है। उसे विघटनकारी सोच का उत्तर विकास से देना है। उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों का उत्तर आधुनिकता से नहीं, बल्कि आधुनिकता और परंपरा के संतुलन से देना है। सबसे बढ़कर, उसे यह विश्वास बनाए रखना है कि राष्ट्र सबसे ऊपर है।

लालकिले की प्राचीर से वर्षों से प्रधानमंत्री का संदेश अलग अलग शब्दों में इसी राष्ट्रीय संकल्प को आगे बढ़ाता रहा है, भारत रुकेगा नहीं, झुकेगा नहीं और अपनी सामर्थ्य के बल पर आगे बढ़ेगा। यही राष्ट्रवाद का सकारात्मक रूप है। यही राष्ट्रीय चेतना की शक्ति है। यही विकसित भारत की वैचारिक नींव भी बन सकती है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed